
- BJP की रणनीति पर उठे सवाल, PDA को जगह नहीं
- स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के प्रत्याशियों की सूची ने छेड़ी नई राजनीतिक बहस
- विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरण साधने की कवायद या संगठन को मजबूत करने की रणनीति?
दीपांशु यादव
Lucknow: उत्तर प्रदेश में विधान परिषद (MLC) की छह सीटों के लिए घोषित प्रत्याशियों की सूची ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से सामने आए नामों में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा है कि क्या पार्टी ने एक बार फिर सवर्ण समीकरण को प्राथमिकता दी है, जबकि पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के मामले में तस्वीर अलग नजर आ रही है।

MLC की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की छह सीटों के लिए जारी सूची में वाराणसी स्नातक से केदारनाथ सिंह, मेरठ स्नातक से दिनेश गोयल, इलाहाबाद-झांसी स्नातक से अशोक कुमार राठौर, वाराणसी शिक्षक से डॉ. प्रमोद मिश्रा, आगरा शिक्षक से इंजीनियर हरि किशोर तिवारी और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक क्षेत्र से ध्रुव त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया गया है।

ये भी पढें
विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरण साधने की कवायद में BJP
इस सूची को लेकर राजनीतिक हलकों में तीन ब्राह्मण, दो क्षत्रिय और एक वैश्य प्रत्याशी के समीकरण की चर्चा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा की रणनीति में सामाजिक संतुलन की जगह किसी खास वर्ग को साधने पर अधिक जोर दिया जा रहा है? हालांकि, इन निर्वाचन क्षेत्रों की प्रकृति और मतदाता संरचना को देखते हुए पार्टी की रणनीति का आकलन केवल जातीय समीकरण के आधार पर करना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी।

PDA के सियासी समीकरण से कितना अलग है भाजपा का दांव?
विपक्षी समाजवादी पार्टी (SP) की PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति के बीच BJP की इस सूची को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। छह सीटों पर घोषित प्रत्याशियों में पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व नजर नहीं आने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों को साधना सभी राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में भाजपा के प्रत्याशियों की सूची को पार्टी की व्यापक चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

राज्यसभा की खाली सीटों पर भी नजर?
विधान परिषद की इस सूची के बीच राज्यसभा की आगामी रिक्तियों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल यह है कि क्या भाजपा इन समीकरणों को राज्यसभा के संभावित प्रत्याशियों के चयन में भी ध्यान में रखेगी? फिलहाल इसे लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में संभावित नामों और सामाजिक संतुलन पर चर्चा जारी है।

पंचायत चुनाव से पहले संगठन की परीक्षा
विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामने केवल जातीय समीकरण साधने की चुनौती नहीं है, बल्कि पंचायत चुनावों में भी संगठन की मजबूती साबित करनी होगी। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य (BDC), ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव पार्टी के लिए ग्रामीण स्तर पर जनाधार परखने का बड़ा अवसर होंगे। हालांकि पंचायत चुनावों को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में पार्टी के सामने स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने, सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने और संगठनात्मक तैयारियों को मजबूत करने की चुनौती बनी हुई है।
ये भी पढें
सीतारमण ने की नेपाल, सऊदी अरब के वित्त मंत्रियों से खास वार्ता
योगी के नेतृत्व में चुनावी तैयारी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आगामी चुनाव BJP के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। प्रदेश की राजनीति में योगी एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं। ऐसे में टिकट वितरण और संगठनात्मक फैसलों का असर केवल संबंधित चुनावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टिकट वितरण में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष बढ़ता है तो इसका असर स्थानीय स्तर पर पार्टी के संगठन और चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।

खासकर पंचायत चुनावों में स्थानीय कार्यकर्ताओं और विभिन्न सामाजिक समूहों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा आगामी चुनावों में अपने मौजूदा सामाजिक समीकरणों को ही आगे बढ़ाएगी या पंचायत और विधानसभा चुनाव से पहले प्रतिनिधित्व का नया संतुलन तैयार करेगी? फिलहाल विधान परिषद की छह सीटों की सूची ने इस बहस को और तेज कर दिया है।
नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews
महिलाओं को घर में कैद करना नहीं, अपराधियों पर कार्रवाई है जरूरी: राहुल गांधी
पूर्व IAS दिव्या मित्तल की राजनीति में एंट्री
सीतारमण ने की नेपाल, सऊदी अरब के वित्त मंत्रियों से खास वार्ता

