
फूल-घास से धनुष-बाण और बंगला तक, जब चुनाव आयोग ने फ्रीज किए बड़े दलों के चुनाव चिन्ह
New Delhi : भारतीय राजनीति में पार्टी के भीतर वर्चस्व की लड़ाई कई बार ऐसी स्थिति पैदा कर देती है, जब विवाद सिर्फ नेतृत्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी पहुंच जाता है। ऐसा ही मामला अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) में सामने आया है। पार्टी के दो गुटों के बीच जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने 17 सितंबर 2026 को अंतरिम आदेश जारी करते हुए TMC के आधिकारिक नाम और उसके पारंपरिक ‘Flowers & Grass’ यानी जोड़ा फूल-घास चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी।
TMC को क्यों नहीं मिलेगा पुराना चुनाव चिन्ह?
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले TMC के दोनों गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अपना दावा कर रहे थे। आयोग के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल दोनों पक्ष आधिकारिक ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।
आयोग ने दोनों गुटों से नए नामों और फ्री चुनाव चिन्हों के विकल्प देने को कहा है। यह व्यवस्था अंतिम निर्णय होने तक लागू रहेगी।
चुनाव चिन्ह फ्रीज करने की जरूरत क्यों पड़ती है?
चुनाव चिन्ह किसी राजनीतिक दल की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। जब किसी मान्यता प्राप्त पार्टी में विभाजन हो जाता है और दोनों पक्ष खुद को असली पार्टी बताते हैं, तो चुनाव आयोग के सामने यह तय करने की चुनौती होती है कि नाम और आरक्षित चिन्ह किसे दिया जाए।
ऐसे मामलों में Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 का पैरा 15 महत्वपूर्ण होता है। आयोग संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों से जुड़े दावों समेत उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विवाद का निपटारा करता है। जब तत्काल तौर पर किसी एक गुट को चिन्ह देना संभव न हो, तो अंतरिम व्यवस्था के तहत पुराने नाम और प्रतीक को रोकने का विकल्प अपनाया जा सकता है। ECI के आधिकारिक रिकॉर्ड में ऐसे पुराने मामलों का उल्लेख भी मिलता है।
शिवसेना का ‘धनुष-बाण’ भी हुआ था फ्रीज
2022 में महाराष्ट्र की शिवसेना में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद हुआ था। उस समय चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया था। इसके बाद दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए गए। बाद में आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना नाम और धनुष-बाण चिन्ह आवंटित किया।
LJP के ‘बंगला’ चिन्ह पर भी लगी थी रोक
2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के गुटों के बीच विवाद सामने आया। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ नाम और उसके आरक्षित ‘बंगला’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया था। बाद में दोनों गुटों को अलग-अलग राजनीतिक पहचान और चुनाव चिन्ह के साथ आगे बढ़ना पड़ा।
चुनाव चिन्ह सिर्फ प्रतीक नहीं, राजनीतिक पहचान भी
किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह मतदाताओं के बीच उसकी पहचान का अहम माध्यम होता है। इसलिए किसी बड़े दल में विभाजन होने पर नाम और चिन्ह को लेकर विवाद का चुनावी असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
TMC के मामले में फिलहाल चुनाव आयोग का आदेश अंतरिम है। अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों को अलग पहचान के साथ चुनावी मैदान में उतरना होगा। इस मामले ने एक बार फिर यह दिखाया है कि पार्टी के अंदर नेतृत्व और संगठन को लेकर विवाद होने पर चुनाव चिन्ह का सवाल किस तरह सीधे चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है।
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