नागपंचमी पर उज्जैन में बेकाबू हुई भीड़, नागचंद्रेश्वर मंदिर में तीन श्रद्धालु घायल

Nagchandreshwar Temple

Nagchandreshwar Temple, Ujjain: नागपंचमी के अवसर पर उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर परिसर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने से हालात बिगड़ गए। नागचंद्रेश्वर मंदिर के साथ हरसिद्धि मंदिर और बड़े गणेश मंदिर के आसपास अचानक भीड़ का दबाव बढ़ गया, जिसके चलते श्रद्धालुओं के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। देखते ही देखते मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। इस दौरान तीन श्रद्धालु भीड़ के दबाव में दबने से घायल हो गए।

भीड़ बढ़ने से बिगड़ी व्यवस्था

घटना के दौरान मंदिर मार्ग पर श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ गई। भीड़ को नियंत्रित करने में प्रशासन और पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। अफरा-तफरी की सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। घायल तीनों श्रद्धालुओं को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया है, जहां उनका उपचार जारी है। घटना के बाद प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है।

साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट

नागचंद्रेश्वर मंदिर महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके कपाट साल में केवल एक बार नागपंचमी के दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। कपाट खुलने के बाद लगातार 24 घंटे तक भक्त भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर सकते हैं। साल में केवल एक दिन दर्शन का अवसर मिलने के कारण नागपंचमी पर उज्जैन में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसी वजह से मंदिर परिसर और आसपास के मार्गों पर भारी भीड़ देखने को मिलती है।

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भगवान शिव का अनोखा स्वरूप

नागचंद्रेश्वर मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव और माता पार्वती की एक प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा में भगवान शिव और माता पार्वती शेषनाग के फनों की छत्रछाया में विराजमान हैं। उनके साथ भगवान गणेश भी दिखाई देते हैं। यह प्रतिमा धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और कलात्मक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव का यह स्वरूप अत्यंत दुर्लभ है।

राजा भोज के काल से जुड़ा इतिहास

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार नागचंद्रेश्वर मंदिर में स्थापित प्रतिमा का संबंध 11वीं शताब्दी से माना जाता है। कहा जाता है कि परमार वंश के राजा भोज के शासनकाल के दौरान लगभग 1050 ईस्वी में इस प्रतिमा की स्थापना हुई थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार नागों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इसी स्थान पर कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव की कृपा से उन्हें अमरत्व का वरदान मिला और इसके बाद तक्षक ने भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा व्यक्त की। इसी मान्यता से नागचंद्रेश्वर मंदिर की धार्मिक महत्ता जुड़ी हुई है।

नागपंचमी पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट साल में केवल एक दिन खुलने के कारण नागपंचमी पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से भक्त भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि नागपंचमी के दिन भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन और पूजा करने से कालसर्प दोष, सर्प दोष और ग्रहों से जुड़ी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इसी आस्था के चलते हर साल नागपंचमी पर मंदिर में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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