
Singham and the Circus : बॉलीवुड में कई बार फिल्म की सफलता सिर्फ बड़े सितारों और शानदार बजट से तय नहीं होती। कहानी को पर्दे पर किस तरह पेश किया गया है और कलाकार अपने किरदार को कितना महसूस कर पा रहे हैं, इसका भी बड़ा असर पड़ता है। रोहित शेट्टी की फिल्म ‘सिंघम’ और रणवीर सिंह स्टारर ‘सर्कस’ इसका दिलचस्प उदाहरण हैं। खास बात यह है कि जिस पहलू को ‘सिंघम’ के दौरान समय रहते संभाल लिया गया, वही ‘सर्कस’ की कमजोर कड़ी बन गया।
साल 2022 में रिलीज हुई ‘सर्कस’ में रणवीर सिंह के साथ जैकलीन फर्नांडिस, पूजा हेगड़े, संजय मिश्रा और जॉनी लीवर जैसे कलाकार नजर आए थे। फिल्म से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। करीब 150 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म की वर्ल्डवाइड कमाई लगभग 61 करोड़ रुपये बताई जाती है।
आखिर ‘सर्कस’ से कहां चूक हुई?
फिल्म के संवाद लेखक फरहाद शामजी ने एक इंटरव्यू में फिल्म की शूटिंग प्रक्रिया से जुड़ी एक अहम बात साझा की थी। उनके मुताबिक, कई बार स्क्रिप्ट पढ़ते समय कहानी और सीन काफी प्रभावशाली लगते हैं, लेकिन जब शूटिंग शुरू होती है तो परिस्थितियों और शेड्यूल के कारण कहानी की वही लय बरकरार रखना मुश्किल हो जाता है।
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फरहाद ने बताया था कि कलाकारों को केवल अपने सीन की जानकारी होने से काम नहीं चलता। उन्हें यह भी समझना जरूरी है कि कहानी में उनका किरदार किस परिस्थिति से गुजर रहा है और वह संवाद उस खास मौके पर क्यों बोल रहा है।
‘सिंघम’ की शूटिंग में हुआ था बड़ा बदलाव
फरहाद शामजी ने ‘सिंघम’ का उदाहरण देते हुए बताया था कि फिल्म की शूटिंग की शुरुआत ही एक बेहद महत्वपूर्ण दृश्य से हुई थी। यह दृश्य कहानी के क्लाइमैक्स से जुड़ा था, जिसमें अजय देवगन और प्रकाश राज के किरदार आमने-सामने नजर आते हैं। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी वाला यह सीन फिल्म के सबसे अहम हिस्सों में से एक था। शूटिंग शुरू होने के समय कलाकारों को कहानी के उस मुकाम तक पहुंचने का पूरा संदर्भ मालूम नहीं था। ऐसे में किरदारों के संवाद और भावनाओं को सही तरीके से पकड़ना मुश्किल हो सकता था।
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रोहित शेट्टी ने तुरंत संभाली स्थिति
इस समस्या को महसूस करते हुए निर्देशक रोहित शेट्टी ने शूटिंग आगे बढ़ाने के बजाय पूरी टीम को कहानी दोबारा समझाने का फैसला किया। फरहाद के मुताबिक, करीब तीन घंटे तक पूरी टीम को फिल्म की कहानी का विस्तार से नरेशन दिया गया। इसके बाद कलाकारों ने अपने किरदारों और दृश्यों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझकर शूटिंग शुरू की।
फरहाद के अनुसार, फिल्म का ‘सुर’ यानी कहानी की भावनात्मक लय बेहद जरूरी होती है। अगर कलाकार किसी दृश्य की स्थिति को अंदर से महसूस नहीं कर पाता, तो दमदार संवाद भी दर्शकों पर वैसा प्रभाव नहीं छोड़ता।
‘सर्कस’ में क्यों नहीं बन पाया वही असर?
फरहाद शामजी के मुताबिक, ‘सर्कस’ में संभवतः यही भावनात्मक लय कमजोर रही। फिल्म में कलाकारों की बड़ी टीम और कॉमेडी का मजबूत आधार होने के बावजूद कहानी का असर दर्शकों तक उस तरह नहीं पहुंच सका, जिसकी उम्मीद की जा रही थी।
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