विकास की नींव या भ्रष्टाचार की बुनियाद?

Corruption
अजय कुमार
अजय कुमार

Corruption लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन 13 जुलाई 2026 को हुआ था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फीता काटा था और उस वक्त इस 63 किलोमीटर लंबे छह लेन के एलिवेटेड कॉरिडोर की तुलना जर्मनी की सड़कों से की गई थी। 4,200 करोड़ रुपये की इस परियोजना का सपना बड़ा था, लेकिन हकीकत उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक निकली। उद्घाटन के महज तेरह दिन बाद उन्नाव जिले के कोरारी के पास सड़क का एक बड़ा हिस्सा कई मीटर तक धंस गया। NHAI ने इसे ‘स्लिपेज की समस्या’ और नियमित रखरखाव का हिस्सा बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की, मगर चार दिन बाद ही यही सड़क दोबारा धंस गई। जुलाई खत्म होते-होते यह सिलसिला कम से कम पांच बार दोहराया जा चुका था। जिस सड़क को देश के सबसे महंगे टोल वाले एक्सप्रेसवे के रूप में पेश किया गया, वह हल्की बारिश भी नहीं झेल पाई। सवाल यह नहीं कि बारिश कितनी हुई, सवाल यह है कि जो सड़क सामान्य मानसून के पहले ही झटके में उखड़ जाए, उसकी नींव में आखिर डाला क्या गया था।

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यह अकेला उदाहरण नहीं है। इसी साल मई के आखिरी हफ्ते में उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एक निर्माणाधीन पुल का हिस्सा तेज तूफान के दौरान ढह गया था, जिसमें कम से कम छह मजदूरों की जान चली गई थी। जुलाई के मध्य में देहरादून-पांवटा साहिब मार्ग पर टौंस नदी पर बना सोलह करोड़ रुपये का पुल, जिस पर वाहनों की आवाजाही शुरू हुए मुश्किल से एक दिन बीता था, पहली बड़ी बारिश में ही जगह-जगह धंस गया। स्थानीय लोगों का कहना था कि यह पुल पहले भी एक बार बह चुकी अस्थायी पुलिया की जगह जल्दबाजी में बनाया गया था। जून के आखिर में असम में एक पुल पूरी तरह बह गया, और गांव वालों ने बताया कि उन्होंने निर्माण के समय लोहे के बजाय पक्के कंक्रीट के पुल की मांग की थी, जिसे अनसुना कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि नदी पार स्कूल जाने वाले बच्चों और खेतों तक पहुंचने वाले किसानों का रास्ता ही बंद हो गया।

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यह पैटर्न किसी एक राज्य या किसी एक ठेकेदार तक सीमित नहीं है, यह पूरे देश के निर्माण तंत्र की बीमारी बन चुका है। संसद में हाल ही में केंद्र सरकार ने खुद स्वीकार किया कि इस समय देश भर में 1,191 नेशनल हाईवे परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं, जिनमें से 629 यानी करीब आधी परियोजनाएं तय समय-सीमा के भीतर पूरी नहीं हो सकीं। इतना ही नहीं, वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच घटिया गुणवत्ता के काम को लेकर 103 ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। यह आंकड़ा खुद बताता है कि निर्माण में गड़बड़ी कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। इसी दौर में हुए दुर्घटना विश्लेषण के आधार पर देश भर में 6,358 ऐसे सड़क हिस्सों को ‘ब्लैक कॉरिडोर’ के रूप में चिह्नित किया गया है, जहां बार-बार हादसे होते हैं।

यानी जिन सड़कों को सुरक्षित और टिकाऊ बताकर जनता के पैसे से बनाया गया, उनमें से हजारों हिस्से खुद खतरे की निशानी बन चुके हैं। सवाल यह भी उठता है कि जब गुणवत्ता की जांच और ठेकेदारों पर कार्रवाई का तंत्र मौजूद है, तो फिर हर मानसून में यही कहानी क्यों दोहराई जाती है। जवाब निर्माण से जुड़े हर व्यक्ति को पता है, मगर खुलकर कोई नहीं बोलता। जहां भी सरकारी निर्माण होता है, वहां कमीशनखोरी एक अघोषित लेकिन तयशुदा नियम बन चुकी है। ठेका मिलने से पहले ही तय हो जाता है कि किस स्तर पर कितना प्रतिशत ‘व्यवस्था’ में जाएगा, और जब असली निर्माण सामग्री और मजदूरी में से इतना हिस्सा पहले ही निकाल लिया जाता है, तो बाकी बचे बजट में मजबूत सड़क या पुल बनना लगभग असंभव हो जाता है। यही वजह है कि लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे जैसी परियोजना, जिसे देश के सबसे आधुनिक कॉरिडोर के रूप में प्रचारित किया गया, दो हफ्ते में मरम्मत का मोहताज बन गई।

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निलंबन और ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्रवाइयां देखने में सख्त लगती हैं, लेकिन असर में बेहद कमजोर साबित होती हैं। जांच पूरी होने तक तीन इंजीनियरों को काम से हटाना एक रस्म भर है, क्योंकि आगे चलकर वही अधिकारी किसी और परियोजना में लौट आते हैं। घटिया निर्माण के दोषी ठेकेदार भी काली सूची में डाले जाने के बाद नाम और कंपनी का ढांचा बदलकर नए सिरे से टेंडर भरने लगते हैं। यह खेल इतना पुराना और इतना संगठित हो चुका है कि अब इसे रोकने वाला कोई डर बाकी नहीं बचा। दिलचस्प यह भी है कि अंग्रेजों के जमाने में बने पुल, रेलवे पुल और सड़कें आज भी सौ-सौ साल बाद मजबूती से खड़ी हैं, जबकि आजादी के बाद और खासकर हाल के वर्षों में बनी कई परियोजनाएं उद्घाटन के हफ्तों के भीतर बिखरने लगती हैं। यह फर्क तकनीक की कमी से नहीं, नीयत की कमी से पैदा होता है। देश ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है, और इस सपने की नींव सड़कों, पुलों, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों जैसे बुनियादी ढांचे पर ही टिकी है।

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लेकिन जब हर मानसून में करोड़ों की परियोजनाएं धंसती, बहती और ढहती नजर आती हैं, तो यह सवाल लाजमी हो जाता है कि क्या रफ्तार और गुणवत्ता एक साथ चल भी पा रहे हैं या नहीं। जब तक कमीशन की संस्कृति निर्माण की नींव से नहीं हटाई जाएगी, तब तक हर नया एक्सप्रेसवे, हर नया पुल केवल एक नई सुर्खी बनकर रह जाएगा, जो पहली बारिश में ही उस भ्रष्टाचार की गवाही देने लगेगा, जिस पर वह खड़ा किया गया है।

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