
बड़े लोग तरकारी नहीं बोलते, तरकारी बोलने से पोजीशन डाऊन हो जाता है

भूलेटन- एकदम भोरे-भोरे खट-खट खट-खट शुरु कर देती हो ।
भिनसरिया- तो का करें ? गाय माता भाँय-भाँय करने लगती हैं नऽ ।
भुलेटन- अरे, तो करने दो ।
भिनसरिया- अजी महराज, एकदम टुकुर-टुकुर ताकते रहतीं हैं, हमसे नहीं नऽ रहा जाता है ।
भुलेटन- तो देख-दिखा के चली आतीं ।
भिनसरिया– पानी-सानी भी तो करना होता है ।
भुलेटन- समझ गए, इसीलिए ढकर-ढकर बजा रही थी ।
भिनसरिया- अजी, ऊ हैण्डपम्पवा खराब हो गया है, इसीलिए ढकर-ढकर आवाज़ करता है ।सुनिए ना, मुखौटा जी से कह के ठीक करा दीजिए ना ।
भुलेटन- का बात करती हो ? मुखौटा जी अभी थोड़े नऽ मिलेंगे, अभी भोट का टाइम थोड़े है !
भिनसरिया – तुलसी जी आ बर्हम बाबा को निहुर-निहुर के जल देना होता है।हमारे बाबा जी बचपने में ये सब सिखाए थे कि सब जीव का ध्यान रखना चाहिए । हैण्डपम्पवा ठीक हो जाता तो थोड़ा कम जोर लगाना पड़ता ।
भुलेटन – ठीक है, ट्राई करते हैं लेकिन पहले ही बता देते हैं कि मिलने की कोई गारंटी नहीं है ।
भिनसरिया – कोशिश कोई खराब बात थोड़े नऽ है, कोशिश कर लीजिए ।
भुलेटन – कोशिशऽऽऽ ! तिहत्तर बार चक्कर लगाने पर गलती से एकाध बार मिल जाते हैं, चक्कर लगा-लगा के दिमाग़ एकदम से नरभसाये रहता है , ऊपर से तड़के भुनुर-भुनुर मन्तर पढ़ने लग जाती हो, नीन्द भी खराब कर देती हो । का होगा ? आदमी का दिमाग़ भुच्च नहीं हो जाएगा ?
भिनसरिया – ई का फजिरे-फजिरे चिकिर-पिकिर शुरु हो जाते हैं ? अपना संस्कार भूला दें का ? जल्दी जागना बहुत अच्छा होता है, भोरवे में देखते हैं, हवा कितनी ताजी रहती है ? जाग के ताजा हवा-बेयार लेने से तबीयत ठीक रहती है ।
भुलेटन – पुष्ट खाना खाने से तबीयत ठीक रहेगी कि हवा-बेयार लेने से ! बात करती हो !
भिनसरिया – तो पुष्ट खान-पान कहाँ से मिलेगा ? खेत में मेहनत करने से ही तो उगेगा आकि खाली किताब के बात में फसल उग जाएगा ? अपने गाय-गोरु के सेवा से ही न दूध-दही मिलेगा ! बताइए खाली लपर-चपर से दूध टपकेगा क्या ?
भुलेटन – जब देखो, फटर-फटर शुरू कर देती हो। हमसे बेसी ज्ञान है तुमको ? विदेश का भौकाली भाषा सीख रहे हैं, समझीऽऽऽ !
भिनसरिया – ठीक है, सीखिए, तो अपनी बोली-भाषा थोड़े न छोड़ देंगे ! माता जी मरीं थीं तो भोकार पार के रो रहे थे, तो अपनी बोलिए में ही न रो रहे थे आकि भौकाली में रोए थे, बताइए-बताइए ! हम देखे थे , ऊ दिन राम-खेलावन बाबा के नाती के तिलक में आप लोगन के हित-यार का जुटान हुआ था , सब खूब ठठा के हँस रहे थे, सब तो अपनी ही बोली में नऽ हो रहा था, क्यों ? बोलिए कुछ । दूसरी भाषा में मन की भीतरी बात कैसे बतायेंगे ? जरा कर के दिखाइये ना !
भुलेटन – का बात करती हो ? जब देखो हमारे सीखने के ही पीछे पड़ जाती हो, खाली हम ही अकेले थोड़े न सीख रहे हैं, बहुत लोग वहाँ सीखने जाते हैं ।
भिनसरिया- जो कर रहे हैं वो करिए लेकिन सीखने-सिखाने की तो बात ही मत करिए । सिखाते हैं कि अपनी तिजारत चलाते हैं ? सिखाते तो खाली भौंकाल थोड़े न सिखाते ? घर-संसार कैसे चले, ये पहले सिखाते ।
भुलेटन – तो कहो तो छोड़ देते हैं, हमको लोग लफन्डर कहेंगे तो लोगों से लडना मत, कोई हमको बोलता है तो पहले तो तुम ही नऽ लड़ जाती हो ।
भिनसरिया- खैर, छोड़िए ये सब बतकही , पहले ये बताइए कि गए कहाँ थे ?
भुलेटन – नहरिया के बाजार पर भेजी टेबुल ख़रीदने चले गए थे, दाम बेशी माँग रहा था, जईसे बोले न कि भाव ठीक लगाओ नहीं तो तुम्हारे दुकान से आई एम गो तो एकदम से हड़बड़ा गया और गप्प से भाव कम कर दिया, भौकाली भाषा का भौकाल चट-पट दिख गया, एकदम से कमाले नु हो गया, पूरा बाजार के लोग अँखिया फाड़-फाड़ के हमको ताकने लगे । ऊ का कहते हैं ! सबका टेन्सने टाईट हो गया ।
भिनसरिया – हम भेजा माने तो जानते ही हैं, आरे वही न जो कभी-कभार खराब हो जाता है ! आप भेजा को भेजी कहेंगे तो हमको थोड़े न समझ आएगा, पता नहीं, कहाँ से क्या-क्या सीखते रहते हैं, भेजा को भेजी कहते हैं और उल्टा हमको ही बकलोल समझते हैं ! लिंग का कुछ ध्यान थोड़े न रहता है आपको ? ए जी, सुनिए ना, हम टेबुल माने जानते हैं, हाँऽऽऽऽऽ, अरे वही नऽ जिसपर रामदेव बाबा का जबरुआ किताब रख देता है और नीचे कुर्सी लगा के बगुला की तरह ताक-ताक के पढ़ता है ?
अब हमको दिक़्क़त खाली ये है कि आप भेजा का अन्ट-शन्ट करके भेजी बना दिए हैं और उसपर भी आपका मन नहीं भरा तो भेजा और टेबुल का ऐसम तैसम करके दुनूँ एक ही में मिला दिए । हमको एतना तो पता ही है कि भेजा सजीव है और टेबुल बेजीव। अब आप ही बताइए कि सजीव और बेजीव एक साथ कैसे मिलेगा ? दुनूँ एक ही में मिला के कह रहे हैं तो हमको कहाँ से माने समझ में आ पायेगा ? का-का उल्टा-पुल्टा बोलते रहते हैं !
भुलेटन – आरे देवी, भेजी टेबुल माने तरकारी होता है , कहाँ बात का बतंगड़ बना दे रही हो ! बड़े लोग तरकारी नहीं बोलते, तरकारी बोलने से पोजीसन डाऊन हो जाता है ।
भिनसरिया- ई का बोल दिए जी ! पटसन को पोजीशन कह के काहे नाम बिगाड़ रहे हैं ?
भुलेटन – हम पटसन कब बोले ? कहते हैं आँय तो सुनती हो बाँय ! पोजीसन बोले हैं, पोजीसन ! समझींऽऽऽ ! माने हुआ भौकाल का लेबल !
भिनसरिया – फिर से लिपल को बिगाड़ के लेबल बोल दे रहे हैं । नाऊन को डाऊन बिगाड़े तो हम बोलने ही वाले थे तब-तक एक और बात बिगाड़ के बोल दिए । हमको तो कुछ समझे में नहीं आ रहा कि आप कहाँ से सब बिगाड़ रहे हैं । साँय-साँय हवा में जाते हैं, तह-तह अन्हरिया में घुमते हैं,
झम-झम बरसात में निकल जाते हैं, लहकत घाम से नही डरते हैं, बताइये कभी सुस्ताने का नाम हम लेते हैं का ? खेती-बारी कभी छोड़े हैं का ? किसके लिए करते हैं ? पेट काट-काट के घी बचाए थे , बेंच के आपको पैसा दिए कि टिऊसन करके कुछ काबिल हो जाइए,
कुछ अच्छा – भला सीख लीजिए । आप हैं कि सीखने की जगह हर बतिये को बिगाड़ के बोल रहे हैं। बताइए, इसी सब के लिए आपको पैसा दिए थे ? काहे को ये भौकाली सीखने के चक्कर में पड़ गए ? बताइए वहाँ जाने से क्या फायदा है ?
भुलेटन – बताते हैं, बताते हैं नऽ, जानती हो, एक दिन अपने नहरिया पर एक बड़ा हाकिम आया था । अपने गँउआ का वो जो छोटका वाला अफसर है नऽ, उसको तो जानती ही हो , अरे वही जो हम लोगों पर रौब गाँठते रहने का हरदमे मौका ढूँढ़ता रहता है। उसको तो तुम देखी हो नऽ, कैसे-कैसे अपना भौकाल टाईट रखता है !
एक दिन हम अपने आँख से देखे कि जो बड़ा वाला हाकिम होता है नऽ, अरे वही जो दुज के चाँद की तरह कभी-कभार दीख जाता है, वो अपने नहरिया पर जाँच करने आ गया , सब लोग उचक-उचक के उसको ऐसे निहार रहे थे जैसे सरकस का कोई शेर आ गया हो, जानती हो, इतने में देखे कि ऊ बड़का वाला सबके सामने ही छोटन हाकिम का भौकाल पंचर कर दिया ।
जब ऊ किट-किट-किट-किट-कटाक करके बोला नऽ तो छोटकन तो एकदम से सटक ही गया , लगा कि एकदम से सूख गया, एकदम से ऊपर का साँस ऊपर ! का बोला, हमको कुछ भी समझ नहीं आया लेकिन हमको मजा बहुत आया,
समझ में इतना जरुर आ गया कि सब कुछ बोली का भौकाल है, माने खाली बोल देने से आदमी सटक सकता है ये हमारे मग़ज़ में बैठ गया, उसी दिन हम सोच लिए कि हम भी एक दिन वही भौकाली बोली जरुर सीखेंगे, समझींऽऽऽ।
भिनसरिया – तो कितना सीखे ? कुछ फायदा हुआ कि नहीं ?
भुलेटन- फायदा पूछती हो ! आँयऽऽऽऽ ! अभी बताते हैं नऽ । पहली बात तो हमारा नाम बी.के. हो गया, आगे जीन्स का ड्रेस हो गया, काला चश्मा चढ़ गया और पाकेट में इस्टाईल वाला पेन भी मिल गया , समझींऽऽऽऽ !
भिनसरिया – बिकेऽऽऽ ! आँयऽऽऽ ! कौन ख़रीद लिया है आपको ?
भुलेटन – आरे, वो वाला बिके नहीं देवी जी , बी.के. माने भुलेटन कुमार, हमारा नाम स्टैन्डर हो गया, समझींऽऽऽ !
भिनसरिया – हम तो एकदम से घबड़ा ही गए थे , हाँ अभी याद पड़ गया, आपके पास जब पहले से ही एक पेन था तो ये दूसरा काहे ले लिए ? बताइए-बताइए । खैर, लाइए देखते हैं कि दोनों में कौन अच्छा लिखता है। आँयऽऽऽ ये नया वाला तो लिख ही नहीं रहा है, काहे को ले लिए ?
भुलेटन – ये लिखनेवाला पेन थोड़े न है, ये तो पाकेट में लगाकर खाली फोकस जमाने के लिए है ।
भिनसरिया – ये फोकट में मिला है क्या ?
भुलेटन – नहीं-नहीं । पैसा लगा है , बड़े लोग लगाते हैं ।
भिनसरिया – तो पैसा लगाकर बिना काम का सामान ले लिए हैं ! आँयऽऽऽ ! का जरुरत पड़ा था ? एतना मेहनत से हम पैसा जुटाते हैं और आप खाली दिखाने और दूसरों को जलाने में खर्च करते रहते हैं ! आँयऽऽऽ !
भुलेटन – तुम कुछ नहीं समझेगी । समाज में रहने के लिए सब करना पड़ता है । नहीं दिखाया जाएगा नऽ तो लोग लम्पटे समझ लेंगे , समझीं कि नहीं ?
भिनसरिया – जी, हम कहाँ से समझ पायेंगे ? दिन रात घर-गृहस्थी में लगे रहते हैं, गाय-गोरु देखते रहते हैं, खेत-खलिहान का हाल लेते रहते हैं तो हमको कैसे समझ आयेगा ?
भुलेटन – आरे, काहे को नाराज़ हो गई ? हम आपके काम को कम थोड़े नऽ समझते हैं ! हम तो खाली दुनियादारी बता रहे थे ।
भिनसरिया – आप भौकाली भाषा सीख रहे हैं तो कभी आपको मना किए क्या ? लेकिन ये तो हम कह के रहेंगे कि पूरी जिन्दगी खाली भौकाल टाईट करने में लगाने से कुछ नहीं मिलता । भौकाल की उमर ही कितनी होती है ? असल के सामने आते ही भौकाल गायब ! बस इतनी भर है !
भुलेटन – क्या बात करती हो ? इतने लोग सीख रहे हैं तो सब बेकार है का ?
भिनसरिया – हम बेकार कब बोले ? आप ही बताइए, कश्मीर का केसर आपके गाँव में होता है क्या ? केसर नहीं होने का मतलब थोड़े है कि आपके गाँव की जमीन खराब है ! मतलब तो खाली एतने है कि केसर के खेती के लायक ना होके
आम -अमरुद-लीची-कटहल-धान-गेहूँ के लायक है। समझेऽऽऽ ! कोस-कोस पर पानी बदले, सात कोस पर बानी, सुने हैं कि नहीं ? तो का चाहते हैं कि पूरी ताकत सतहत्तर कोसवाली बानी सीखने में लगा दी जाये ?
भुलेटन – कैसे कैसे तर्क देती हो ? कहीं की कहावत कहीं फिट्ट कर देती हो !
भिनसरिया – कोई तर्क नहीं दे रहे , सही बात कह रहे हैं। ये भौकाल वाली भाषा आपके गाँव-गिराम के लिए थोड़े नऽ बनी है, खाली झूठी वाह-वाही के लिए पैसा और टाइम लगाए जा रहे हैं ! जीवन में और कुछ काम-धाम नहीं होता है का ?
आपकी बात जब कोई समझेगा ही नहीं तो आप ही का न घाटा होगा, जिन्दगी लगा के पूरा भौकाल-मास्टर हो ही गए तो क्या कर लीजिएगा ? बताइए , दिन भर चले अढ़ाई कोस । बात करते हैंऽऽऽ !
भुलेटन- तो का करें ?
भिनसरिया – हमारे बाबा जी कहते रहते थे कि आदमी को अन्दर से मजबूत होना चाहिए, बाहर के दिखावे से कोई फायदा नहीं होता है, ये सब टिकाऊ थोड़े न होता है, पुदीना के गाछ पर चढ़ के ऊँचे थोड़े नऽ हो जायेंगे ? बाबा जी के वही बात हम भी गाँठ बाँध लिए । आपको भी हम वही बोल रहे हैं । समझेऽऽऽ !
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