Petrol Diesel Price : देश में बढ़ती पेट्रोल और डीजल की कीमतें अब आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाल रही हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से लोगों का मासिक बजट बिगड़ता जा रहा है। खासतौर पर मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों के लिए यह चिंता का बड़ा कारण बन चुका है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने के लिए पेट्रोल-डीजल का कम इस्तेमाल करने की अपील की थी। इसके बाद सरकार ने कई बड़े कदम भी उठाए हैं, जिनका असर सीधे आम लोगों पर दिखाई दे रहा है। सरकार ने जहां सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई है, वहीं पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी इजाफा किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक सामान्य भारतीय अपनी मासिक कमाई का कितना हिस्सा सिर्फ पेट्रोल और डीजल खरीदने में खर्च कर देता है।
भारतीय कितना खर्च करते हैं पेट्रोल-डीजल पर?
हाल ही में जारी “Gasoline Affordability” रिपोर्ट में दुनिया के कई देशों की तुलना की गई है। यह रिपोर्ट globalpetrolprices.com द्वारा तैयार की गई है। रिपोर्ट में यह बताया गया है कि अलग-अलग देशों के लोग अपनी मासिक आय का कितना हिस्सा पेट्रोल और डीजल खरीदने में खर्च करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय हर महीने अपनी सैलरी का लगभग 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा पेट्रोल-डीजल पर खर्च करता है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए विश्व बैंक के प्रति व्यक्ति आय और जीडीपी के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। ग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज के मुताबिक, एक व्यक्ति औसतन हर महीने करीब 40 लीटर ईंधन की खपत करता है। इसी आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि भारत में ईंधन खर्च आम आदमी की आय पर कितना प्रभाव डालता है।
पाकिस्तान और नेपाल की हालत ज्यादा खराब
रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात भारत के पड़ोसी देशों की स्थिति को लेकर सामने आई। पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार जैसे देशों में लोग अपनी मासिक आय का लगभग 47 से 52 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पेट्रोल और डीजल खरीदने में खर्च कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि इन देशों में एक व्यक्ति अपनी कमाई का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ ईंधन पर खर्च कर देता है। यही वजह है कि वहां आम लोगों की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। वहीं दूसरी तरफ कतर और कुवैत जैसे तेल उत्पादक देशों में स्थिति बिल्कुल अलग है। वहां लोग अपनी सैलरी का सिर्फ 1 से 2 प्रतिशत हिस्सा ही पेट्रोल और डीजल खरीदने में खर्च करते हैं। इसका मुख्य कारण वहां ईंधन की कम कीमत और लोगों की ज्यादा आय है।
क्यों बढ़ रही हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें?
विशेषज्ञों के अनुसार, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर भी दबाव बढ़ा है। बताया जा रहा है कि तेल कंपनियों को रोजाना करीब 1000 से 1200 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा था। इसी नुकसान को कम करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3-3 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की गई। देश में पिछले चार वर्षों में पहली बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इस तरह बढ़ोतरी देखने को मिली है। इसके अलावा CNG और विमान ईंधन (ATF) की कीमतों में भी बदलाव किया गया है।
सरकार ने उठाए बड़े कदम
सरकार ने बढ़ती ईंधन खपत को नियंत्रित करने के लिए कई आर्थिक कदम उठाए हैं। पेट्रोल के निर्यात पर विंडफॉल प्रॉफिट टैक्स लगाया गया है, जबकि डीजल और ATF पर टैक्स में कटौती की गई है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की मौजूदा टैक्स दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। सरकार का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बचाना और तेल कंपनियों पर बढ़ते दबाव को कम करना है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने का असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर ट्रांसपोर्टेशन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि ईंधन महंगा होने पर महंगाई तेजी से बढ़ने लगती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और इजाफा देखने को मिल सकता है।
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