BJP की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ क्यों कोई ‘जेपी-अन्ना’ सामने नहीं आता

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संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

भारत की पवित्र भूमि सदैव संतों, साधुओं और महानायकों की धरोहर रही है। हर कोने में ऐसे पराक्रमी पुरुष और नारियां जन्म लेती रही हैं जिन्होंने देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया। अंग्रेजी राज के विरुद्ध महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे वीरों ने प्राणों की बाजी लगा दी। आजादी के बाद भी जब सत्ता के नशे में कोई सरकार तानाशाही का रंग दिखाने लगी, तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ‘जेपी’ जैसे योद्धाओं ने सत्ता की नींव हिला दी। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने न्यायालय के एक निर्णय के विरुद्ध पूरे देश पर आपातकाल थोप दिया, तो जयप्रकाश नारायण ने ऐसा प्रलयंकारी आंदोलन खड़ा किया कि कांग्रेस की सत्ता जड़ से उखड़ गई। इस आंदोलन में कांग्रेस छोड़कर आए विपक्ष के अनेक प्रमुख नेता शामिल हुए। इनमें आचार्य जे.बी. कृपलानी, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल   कृष्ण आडवाणी, चरण सिंह, जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये, राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर, शरद जोशी, दीनदयाल उपाध्याय के अनुयायी और भी कई दिग्गज थे। इन सबने जयप्रकाश के नेतृत्व में एकजुट होकर तानाशाही के विरुद्ध जनसैलाब खड़ा कर दिया। यह घटना भले ही पचास वर्ष पुरानी हो, किंतु इसके समान अनेक आंदोलनों ने देश की राजनीति को नई दिशा दी है। लेकिन सवाल यह है कि आज जब कांग्रेस और विपक्ष के अन्य नेता लगातार भारतीय जनता पार्टी पर वोट चोरी से सत्ता हथियाने का आरोप लगा रहा है, तब BJP विरोधी नेता मीडिया में शोर मचाने की बजाय जनता को संगठित कर आंदोलन क्यों नहीं खड़ा कर रहे हैं? क्या विपक्ष में जयप्रकाश जैसा कोई नायक नहीं है? या फिर भारतीय जनता पार्टी को देष की जनता उसकी विचारधारा के चलते हाथों हाथ ले रही है। इसी का परिणाम है पश्चिम बंगाल में पहली बार BJP की सरकार का आना और असम में BJP का हैट्रिक लगाना। BJP की इस जीत को विपक्ष BJP की वोट चोरी बता रहा है।

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जयप्रकाश का ऐतिहासिक विद्रोह

भारत माता की गोद में एक कायस्थ परिवार में जन्मे जयप्रकाश नारायण, जिन्हें सब लोकनायक कहते थे, स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सिपाही रहे। बिहार भूमि के इस सपूत ने गांधीजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजी हुकूमत को ललकारा। आजादी मिलने के बाद वे समाजवादी धारा के प्रखर नेता बने। 1971 के चुनावों में कांग्रेस की प्रचंड विजय के बाद भ्रष्टाचार और कुशासन चरम पर पहुंच गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अमान्य घोषित कर दिया। इससे घबराई इंदिरा ने 25 जून को पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। प्रेस पर ताले लग गए, विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। संपूर्ण अधिकार निलंबित हो गए। इसी अंधेरे में जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान से विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उनका नारा था, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। इस आंदोलन ने राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया। बिहार से शुरू होकर गुजरात, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक तक फैल गया। छात्र, किसान, मजदूर, बुद्धिजीवी सब सड़कों पर उतर आए। जयप्रकाश ने सम्पूर्ण क्रांति का मंत्र दिया, जिसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षिक सभी क्षेत्रों में परिवर्तन की बात थी। कांग्रेस के कई नेताओं ने इस आंदोलन से प्रभावित होकर दलबदल लिया। मोरारजी देसाई जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी ने त्यागपत्र दे दिया। आचार्य कृपलानी ने भारतीय लोक दल बनाया। चरण सिंह किसान नेता के रूप में आगे आए। जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने इस आंदोलन में पूरे जोश से भाग लिया। समाजवादी धड़े से जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये ने भूमिगत रहकर आंदोलन चलाया। राज नारायण ने इंदिरा को हराकर लोकसभा पहुंचे। इन सबने मिलकर 1977 के चुनावों में कांग्रेस को धूल चटा दी। जनता पार्टी बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री। जयप्रकाश का आंदोलन सिद्ध करता है कि जनशक्ति सत्ता को घुटनों पर ला सकती है।

अन्य ऐतिहासिक आंदोलन

जयप्रकाश का आंदोलन अकेला नहीं था। भारत ने अनेक बार जन आक्रोश देखा है जो सत्ताधारियों को झुकने पर मजबूर कर गया। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के विरुद्ध वी.पी. सिंह सरकार के विरुद्ध लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। यह राम जन्मभूमि आंदोलन का रूप ले लिया। लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंचे। इससे भाजपा मजबूत हुई और सरकार गिरी। 2011 में अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध रामलीला मैदान में अनशन किया। लाखों लोग दिल्ली की सड़कों पर उतरे। संसद में लोकपाल विधेयक पर बहस छिड़ गई। यूपीए सरकार को घुटने टेकने पड़े। अन्ना को जनता का दूसरा जयप्रकाश कहा गया। 1974 के गुजरात नवनिर्माण आंदोलन में छात्रों ने मोरारजी देसाई के नेतृत्व में चिमनभाई पटेल सरकार गिराई। यह जयप्रकाश आंदोलन का पूर्व संकेत था। 1980 के दशक में किसान आंदोलनों ने महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश में सरकारों को हिलाया। शरद जोशी के शेतकारी संगठन ने महाराष्ट्र में खाद्य नीति बदली। 1992 के बाद भी बाबरी विध्वंस के बाद कई राज्य सरकारें बदलीं। 2019-2020 में नागरिकता संशोधन विधेयक के विरुद्ध शाहीन बाग में महिलाओं ने महीनों धरना दिया। इससे भाजपा को कई सीटें गंवानी पड़ीं। 2020-2021 के किसान आंदोलन ने तीन कृषि कानूनों को रद्द करा दिया। राकेश टिकैत जैसे नेता उभरे। दिल्ली की सीमाओं पर लाखों किसान डटे रहे। मोदी सरकार को कानून वापस लेने पड़े। ये उदाहरण सिद्ध करते हैं कि संगठित जनआंदोलन किसी भी सत्ता को डिगमगा सकता है। मीडिया शोर से कुछ नहीं होता, सड़क पर जनता उतरे तो परिवर्तन होता है।

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विपक्ष का BJP पर वोट चोरी आरोप

आजादी के 79 वर्ष बाद भी राजनीति में वही पुरानी बीमारियां हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष ने भाजपा पर मतों की चोरी का आरोप लगाया। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर संदेह जताया। कई स्थानों पर मतगणना में विसंगतियां बताईं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल, द्रमुक जैसे दल सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। किंतु कोर्ट ने याचिकाएं खारिज कर दीं। विपक्ष मीडिया स्टूडियो में चीखता-चिल्लाता रहता है। टेलीविजन बहसों में आरोप लगाता है, किंतु सड़क पर कोई बड़ा आंदोलन नहीं। क्या कारण है? जयप्रकाश जैसा नायक क्यों नहीं उभर रहा? क्या विपक्ष में एकजुटता की कमी है? क्या नेता स्वार्थी हो गए हैं? जयप्रकाश के समय विपक्ष के नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा त्याग कर एकजुट हुए थे। आज प्रत्येक दल अपनी कुर्सी बचाने में लगा है। राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, स्टालिन जैसे नेता अलग-अलग बयानबाजी करते हैं। कोई राष्ट्रीय नेता आगे नहीं आ रहा जो सभी को एक सूत्र में बांधे। वोट चोरी के प्रमाण जुटाने के बजाय सोशल मीडिया पर मीम्स और वीडियो चल रहे हैं। जयप्रकाश ने गांव-गांव जाकर जनता को जगाया था। आज विपक्ष शहरों तक सीमित है। किसान आंदोलन में विपक्ष शामिल नहीं हुआ, नागरिकता विरोध में भी फूट पड़ी। भाजपा मजबूत संगठन के साथ खड़ी है। विपक्ष के पास जनाधार कमजोर पड़ गया है। युवा वर्ग बेरोजगारी से त्रस्त है, किंतु विपक्ष उसे संगठित नहीं कर पा रहा। क्या यह विपक्ष की थोथी चीखें हैं? जयप्रकाश न होने का प्रमाण तो यही है कि आरोप लगाने वाले खुद आंदोलन से डरते हैं।

आंदोलन की शक्ति और सबक

बहरहाल, इतिहास गवाह है कि सच्चा परिवर्तन सड़क से आता है। जयप्रकाश ने साबित किया कि बिना हिंसा के भी सत्ता हिलाई जा सकती है। अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनलहर खड़ी की। किसानों ने दिल्ली को घेरा। इनमें सफलता का रहस्य था- स्पष्ट मुद्दा, नैतिक नेतृत्व, जनभागीदारी। वोट चोरी के विरुद्ध अगर विपक्ष आंदोलन चलाए, तो ईवीएम की पारदर्शिता पर बहस छिड़ सकती है। प्रत्येक बूथ में लाखों कार्यकर्ता सड़कों पर उतरें। वीआईपी सत्यापन बढ़े। कागजी मतपत्रों की मांग हो। किंतु इसके लिए जयप्रकाश जैसा त्यागी नेता चाहिए जो सत्ता की लालच न करे।  इसके बजाये विपक्ष को जयप्रकाश मॉडल अपनाना चाहिए। पहले आंतरिक एकजुटता। फिर ग्रामीण स्तर पर जागृति। छात्रों, किसानों, मजदूरों को जोड़ें। मीडिया शोर छोड़ें, जनसभाएं करें। यदि ऐसा न हुआ, तो आरोप थोथे सिद्ध होंगे। भाजपा पर वोट चोरी का इल्जाम लगाना आसान है, किंतु साबित करने के लिए जेपी जैसा आंदोलन चाहिए। देश की जनता इंतजार कर रही है। क्या विपक्ष में कोई लोकनायक जन्म लेगा? यह प्रश्न समय के गर्भ में है। किंतु इतिहास सिखाता है, जनता जागेगी तो सत्ता झुकेगी। वर्ना विपक्ष थोथे चने की तरह बजता ही रहेगा।


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