धर्मांतरण की आड़ में पनपता नया आतंक, तुषार से “हिजबुल्लाह” बनने की खौफनाक दास्तान

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संजय सक्सेना

धर्म के नाम पर होने वाला परिवर्तन अक्सर एक व्यक्तिगत आस्था का विषय माना जाता है, लेकिन जब यह आस्था किसी के हाथ में बंदूक थमा दे और उसे अपने ही देश के खिलाफ खड़ा कर दे, तो वह आस्था नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राष्ट्रीय खतरा बन जाती है। उत्तर प्रदेश के मेरठ और नोएडा से हाल ही में सामने आई तुषार चौहान उर्फ हिजबुल्लाह अली खान की कहानी महज एक धर्मांतरण का मामला नहीं है, बल्कि यह उस हाइब्रिड टेरर मॉडल का जीता-जागता सबूत है जिसे सीमा पार बैठी ताकतें अब भारत में ‘आउटसोर्स’ कर रही हैं। जिस लड़के की रगों में एक स्वतंत्रता सेनानी का खून दौड़ रहा था, जिसका परिवार पीढ़ियों से भारतीय सेना में रहकर देश की सीमाओं की रक्षा करता आया, उसी परिवार का बेटा कट्टरपंथ के इस डिजिटल मकड़जाल में फंसकर खुद को ‘अल्लाह की फौज’ यानी हिजबुल्लाह का सिपाही समझने लगा। यह घटना न केवल सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ाने वाली है, बल्कि समाज के उस हिस्से के लिए भी खतरे की घंटी है जो सोशल मीडिया की चकाचौंध में अपने बच्चों के बदलते व्यवहार को भांप नहीं पा रहे हैं।

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आतंकवाद का यह नया मॉडल बेहद शातिर और घातक है। इसमें अब सीधे तौर पर हथियारबंद घुसपैठ की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस काम को शहजाद भट्टी जैसे गैंगस्टरों और कट्टरपंथी यूट्यूबर्स को सौंप दिया है। ये लोग सोशल मीडिया को एक भर्ती केंद्र की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इनका शिकार वे युवा बन रहे हैं जो मानसिक रूप से थोड़े कमजोर हैं या जिन्हें धार्मिक कट्टरपंथ के नाम पर आसानी से बरगलाया जा सकता है। तुषार के मामले में भी यही हुआ। उसे पहले सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तानी हैंडलर्स के संपर्क में लाया गया, फिर धीरे-धीरे उसके मन में मौजूदा व्यवस्था और अपने ही मूल धर्म के खिलाफ जहर भरा गया। धर्मांतरण तो सिर्फ एक औपचारिकता थी, असली मकसद तो उसका ब्रेनवॉश करके उसे एक ‘किलिंग मशीन’ में तब्दील करना था। तुषार का तुषार से हिजबुल्लाह बनना यह दर्शाता है कि कट्टरपंथ की खुराक उसे इस कदर दी गई कि वह अपनी गौरवशाली पारिवारिक विरासत को भूलकर उन लोगों की जान लेने पर उतारू हो गया जो उसकी हिटलिस्ट में थे।

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सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात इस आतंकी मॉडल की ‘हिटलिस्ट’ है। आमतौर पर आतंकी संगठनों के निशाने पर सुरक्षा बल या राजनेता होते हैं, लेकिन हिजबुल्लाह बने तुषार को जो काम सौंपा गया था, वह समाज को अंदर से खोखला करने वाला था। उसकी सूची में वे ‘एक्स-मुस्लिम’ शामिल थे जिन्होंने अपनी स्वतंत्र सोच से इस्लाम छोड़ दिया था। यह कट्टरपंथ का वह चरम है जहां व्यक्तिगत पसंद और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए कोई जगह नहीं बचती। अगर कोई अपनी मर्जी से जीवन जीना चाहे, तो उसे दुश्मन मान लिया जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो सामरिक रूप से दिल्ली के बेहद करीब है और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, अब इस खतरनाक प्रयोग की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में बिजनौर, गाजियाबाद, मेरठ और हापुड़ से हुई गिरफ्तारियां बताती हैं कि आईएसआई का स्लीपर सेल नेटवर्क अब डिजिटल माध्यमों से जमीनी स्तर पर अपनी जड़ें फैला चुका है।

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इस पूरे प्रकरण में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हमारा सामाजिक ताना-बाना इतना कमजोर हो गया है कि कोई बाहरी ताकत चंद वीडियो और तकरीरों के जरिए हमारे युवाओं को देशद्रोही बना सकती है? तुषार के पिता और उसकी मां का रोना इस बात की गवाही है कि उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनका बेटा कब उनके हाथों से फिसलकर अंधेरी गलियों में जा पहुंचा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका, जहां की कृषि और सेना में भागीदारी की कहानियां प्रसिद्ध रही हैं, वहां सोलर सीसीटीवी कैमरों के जरिए जासूसी करना और संवेदनशील ठिकानों की रेकी करना एक नए तरह के युद्ध का संकेत है। यह युद्ध सीमाओं पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन और बंद कमरों में लड़ा जा रहा है।

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धर्मांतरण और आतंक के इस गठजोड़ को समझने के लिए हमें उस मानसिकता की गहराई में जाना होगा जो धर्म को एकता के बजाय विभाजन का औजार बनाती है। जहां एक ओर मणिपुर और मिजोरम के बनेई मेनाशे समुदाय के लोग हजारों सालों तक भारत में रहने के बावजूद अपनी परंपराओं को सहेजते हुए आज अपने मूल देश इजरायल लौ ऐसे आतंकी मॉडल के पीछे भाग रहे हैं जिसका भारत से कोई लेना-देना नहीं है। यहट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तुषार जैसे लोग हैं जो अपनी मिट्टी और परंपरा से कटकर एक वैचारिक कमजोरी और अपनी जड़ों से कटने का परिणाम है। सुरक्षा एजेंसियां तो अपना काम करेंगी ही, लेकिन अब वक्त आ गया है कि समाज और परिवार भी अपने बच्चों की डिजिटल गतिविधियों और अचानक आने वाले व्यवहारिक बदलावों को लेकर सतर्क हों। तुषार का हिजबुल्लाह बनना महज एक गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह हमारी उस सामूहिक विफलता का आईना है जिसे अगर वक्त रहते नहीं सुधारा गया, तो धर्मांतरण की यह आड़ आने वाले समय में और भी कई परिवारों को उजाड़ देगी। आतंक का यह आउटसोर्स मॉडल जितना अदृश्य है, उससे कहीं ज्यादा यह हमारे भविष्य के लिए घातक है।


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