राजेन्द्र गुप्ता, ज्योतिषी और हस्तरेखाविद (मो. 9116089175)
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामखी जयंती मनाई जाती है। मां बगलामुखी भय और शत्रुओं से मुक्ति देती हैं। इनकी पूजा अर्चना और कृपा से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में बगलामुखी जयंती का बड़ा महत्व है. बगलामुखी जयंती हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती हैं, क्योंकि इसी दिन मां बगलामुखी प्रकट हुई थी. इसलिए अष्टमी तिथि पर माता रानी की पूजा अर्चना के साथ ही उनके प्रिय भोग लगाते हैं. माता रानी की पूजा अर्चना से व्यक्ति को आरोग्य में वृद्धि और शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 23 अप्रैल को रात 8 बजकर 50 मिनट पर होगी. वहीं इसका समापन अगले दिन 24 अप्रैल को शाम 7 बजकर 22 मिनट पर होगा. इसके बाद नवमी तिथि की शुरुआत होगी. वहीं उदया तिथि को देखते हुए बगलामुखी जयंती 24 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी।
बगलामुखी जयंती का शुभ मुहूर्त
इस बार बगलामुखी जयंती का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 24 मिनट से लेकर 9 बजकर 2 मिनट तक रहेगा. वहीं अमृत काल का शुभ मुहूर्त सुबह 9 बजकर 3 मिनट से लेकर 10 बजकर 42 मिनट तक रहेगा. वहीं शुभ चौघड़ियां मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से लेकर 1 बजकर 58 मिनट तक रहेगा. प्रदोष काल शाम को 6 बजकर 6 मिनट से लेकर 7 बजकर 38 मिनट तक रहेगा।
बगलामुखी जयंती का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां बगलामुखी की पूजा करने से भय, शत्रु और बाधाओं का अंत होत होता है. इसके साथ ही इस दिन पूजा, हवन और मंत्रोच्चार से घर की नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं. बुरी नजर से छुटकारा मिलता है. मां बगलागुखी की पूजा अर्चना करेन से आरोग्य की समाप्ति और माता रानी की कृपा प्राप्त होती है।
माँ बगलामुखी पौराणिक कथा
एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए। इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे, तब भगवान शिव ने कहा: शक्ति रूप के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया। मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में देवी शक्ति का देवी बगलामुखी के रूप में प्रादुर्भाव हुआ था। त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसीलिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं।
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दसमहाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या है देवी बगलामुखी। इनकी उपासना इनके भक्त शत्रु नाश, वाकसिद्ध और वाद- विवाद में विजय के लिए करते है। इनमें सारे ब्रह्मांड की शक्ति का समावेश है, इनकी उपासना से भक्त के जीवन की हर बाधा दूर होती है और शत्रुओं का नाश के साथ साथ बुरी शक्तियों का भी नाश करती है। देवी को बगलामुखी, पीताम्बरा, बगला, वल्गामुखी, वगलामुखी, ब्रह्मास्त्र विद्या आदि नामों से भी जाना जाता है।
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