- कारागार विभाग में चल रहा कमीशन का खेल
- सुरक्षाकर्मियों पर निगरानी रखने के लिए लगाए जा रहे ‘सेंसर उपकरण’
- फरारी की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए नया प्रयोग
राकेश कुमार
लखनऊ। जेल में निरुद्ध बंदियों की फरारी रोकने के लिए सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ाए जाने के बजाए आधुनिक उपकरणों की खरीद पर जोर दिया जा रहा है। यह बात सुनने और पढ़ने में भले ही अटपटी लगे लेकिन विभाग के आला अफसरों की खरीद फरोख्त इस सच की पुष्टि करती नज़र आ रही है। मोटे कमीशन की खातिर मुख्यालय के अधिकारियों ने जेलों में सुरक्षाकर्मियों पर निगरानी रखने के लिए जेलों में सेंसर उपकरण लगाए जाने का निर्णय लिया है। यह मामला विभागीय अधिकारियों और कर्मियों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसको लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे है। चर्चा है कि जेलों में सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ाने के बजाए उपकरणों की खरीद में जुटे है। इससे पहले भी करोड़ों रुपए के अत्याधुनिक उपकरण लगाए जा चुके है। दिलचस्प बात यह है कि घटना के समय करोड़ों के उपकरण खराब ही मिलते है। बीते जनवरी माह में कन्नौज और अयोध्या जेल से एक पखवारे के अंदर चार बंदियों की फरारी से जेल महकमे के अधिकारियों की नींद उड़ गई। जेल की चहारदीवारी दिवारी फांदकर भागने में सफल हुए बंदियों ने जेलों की सुरक्षा व्यवस्था पर तमाम सवाल खड़े कर दिए। सूत्रों का कहना है कि घटना के समय जेल में लगे अधिकांश सीसीटीवी खराब पड़े हुए थे। जेल प्रशासन के अधिकारियों का तर्क था कि जेल में सुरक्षाकर्मियों की संख्या कम होने के कारण बंदी घटना को अंजाम देने में सफल हो गए।
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सूत्रों का कहना है कि फरारी के बाद हरकत में आए विभाग के आला अफसरों ने जेलों से फरारी की घटनाओं पर अंकुश लगाने और सुरक्षाकर्मियों पर निगरानी रखने के लिए एक सेंसर उपकरण लगाने का निर्णय लिया। जेलो में लगाए जा रहे यह सेंसर उपकरण अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों में चर्चा का विषय बने हुए है। चर्चा है कि प्रदेश की जेलों में बंदियों के अनुपात में सुरक्षाकर्मियों की संख्या काफी कम है। मसलन जिस जेल में 100 सुरक्षाकर्मियों की जरूरत है वहां सिर्फ 30 से 35 वार्डर से काम चलाया जा रहा है। जब जेलों में पर्याप्त सुरक्षाकर्मी मौजूद ही नहीं होंगे तो सेंसर उपकरण निगरानी किसकी करेंगे। यह बड़ा सवाल है। तर्क दिया जा रहा है कि उपकरणों की खरीद फरोख्त कमीशन का मोटा खेल है। करोड़ों रुपए की लागत से पूर्व में भी तमाम अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए किंतु घट के समय विभाग को इन उपकरणों का कोई लाभ नहीं मिल पाया है। उधर इस संबंध में आधुनिक उपकरणों की खरीद फरोख्त के प्रभारी एआईजी जेल प्रशासन धर्मेंद्र सिंह से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो कई प्रयासों के बाद भी उनका फोन नहीं उठा। मैसेज का भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
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घटनाओं के समय काम नहीं आते आधुनिक उपकरण
विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेश की समस्त जेलों की गतिविधियों पर निगरानी रखने के कारागार मुख्यालय में वीडियो वॉल बनवाई गई है। इसके साथ ही जेलों में बंदियों और सुरक्षाकर्मियों पर नजर रखने के लिए करोड़ों रुपए सीसीटीवी, वाकी टाकी, मेटल डिटेक्टर, बॉडी स्कैनर सरीखे अत्याधुनिक उपकरण लगाए गए। इन उपकरणों के बाद भी घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कन्नौज और अयोध्या जेल में हुई बंदियों की फरारी के बाद हुई जांच इसकी पुष्टि करती नज़र आ रही है। हकीकत यह है को घटनाओं के समय यह आधुनिक उपकरण काम नहीं आते हैं।
