पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश कुमार लेखक की गिरफ्तारी से नेपाल में पसरा सन्नाटा

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दहशत में हैं भ्रष्टाचारी नेता और अफसर

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

काठमांडू।  नेपाल में सत्ता परिवर्तन की अनुभूति का आगाज आगजनी और प्रदर्शनों से होगा, नेपाल की जनता ने ऐसा नहीं सोचा था। ठीक है राजनीति में “बदले की भावना” भी एक अध्याय है लेकिन इसके लिए थोड़ा इंतजार ठीक था। माना कि पूर्व पीएम और कम्युनिस्ट विचारधारा के वरिष्ठ नेता केपी शर्मा ओली के खिलाफ की गई कार्रवाई कानून का हिस्सा है लेकिन इसकी जो टाइमिंग है वह बालेन सरकार पर सवाल खड़ा करती है। अब इसे कोई नेपाल में कम्युनिस्ट विचारधारा पर प्रहार मान रहा है तो कोई हिन्दू राष्ट्र का आगाज। सच क्या है, यह जानने के लिए कयासबाजी और शंका आशंका से बचना होगा। बालेन शाह को जनता ने अटूट विश्वास के साथ सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाया है। उन्हें जनता के हित को वरियता देनी चाहिए थी। कानून तो अपना काम देर सबेर करता ही। पूर्व सांसद महेश बस्नेत और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दीपक खड़का को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। जिस तरह गिरफ्तारी अभियान चल रहा है उससे ऐसा लगता है अभी और बड़े नेताओं की गिरफ्तारी मुमकिन है।

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शपथग्रहण के बाद जनता के हित के लिए कुछ निर्णय लिया गया होता तो परिवर्तन की अनुभूति का यह अच्छा संकेत होता। ओली अथवा उनकी सरकार में गृह मंत्री रहे रमेश लेखक तथा पूर्व आईजी चंद्र कुबेर खापुंग के खिलाफ कार्रवाई तय थी क्योंकि पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की की अध्यक्षता में जेन जी आंदोलन के समय हुई जनहानि और सरकारी संपत्तियों के नुकसान के कारणों की जांच हेतु गठित आयोग ने इन तीनों को जिम्मेदार ठहराया है। सवाल केवल आंदोलन के समय नुकसान और जनहानि का ही नहीं है, ओली और उनके तत्कालीन सरकार के तमाम मंत्री और बड़े अफसरों के हाथ भ्रष्टाचार से सने हुए हैं। बड़े बड़े धन्ना सेठों के करोड़ों करोड़ बिजली बिल को भारी धनराशि वसूल कर रफा-दफा किया गया है। एक तरह से यह सरकारी खजाने की लूट है जिसमें सत्ता दल के नेता और अफसरों ने जमकर लूट की। नकली भूटानी नागरिकता मामले में विभिन्न दलों के तमाम बड़े नेता और मंत्रियों पर आरोप लगे हैं। इनमें कई तो अभी भी जेल में हैं, जबकि कुछ जमानत पर बाहर आ गए। नेपाली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी आरज़ू राणा के भी इस लूट में शामिल होने की चर्चा है। पूर्व गृह मंत्री रवि लामिछाने ने ऐसे तमाम भ्रष्टाचार की जांच की पहल की थी। लेकिन ओली सरकार ने ऐसा नहीं होने दिया। नतीजा रवि लामिछाने को गृहमंत्री

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पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था। इस तरह देखें तो नेपाल में लोकतंत्र बहाली के बाद जिसके भी नेतृत्व में सरकारों का गठन हुआ, सब के सब सिर्फ अपनी जेबें भरते रहे, अपने बेटी बेटों और रिश्तेदारों का ख्याल करते रहे। कहना न होगा कि पूर्व की लोकतांत्रिक सरकारें जनता की सरकार न रहकर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रहीं थीं, बेशर्मी की हद पार करते हुए। जिन आरोपों में पूर्व पीएम ओली और उनके गृहमंत्री रमेश लेखक के खिलाफ कार्रवाई हुई है, देखें तो उसकी जद में पूर्व पीएम और माओवादी केंद्र के अध्यक्ष प्रचंड भी आ सकते हैं। राजशाही के खिलाफ लंबे समय तक चले जनयुद्ध में हजारों लोग मारे गए थे। प्रचंड ने कुछेक मौकों पर इस नरसंहार की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर ली थी। सार्वजनिक मंच से प्रचंड के इस कबूलनामें को अपराध स्वीकार करना मानते हुए ओली ने ही जांच आयोग गठित करने की बात कही थी। यदि बालेन सरकार ने ऐसा कर दिया तो प्रचंड की भी मुश्किलें बढ़ सकती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए गए बालेन सरकार के इस जंग में अच्छे अच्छों की मुसीबतें बढ़नी तय है और तब ऐसा हो सकता है कि अभी जो सारे दल अलग-अलग हैं वे एक साथ मिलकर बालेन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने को एक जुट हो जाएं। बालेन सरकार की कार्रवाई यदि ओली, रमेश लेखक की गिरफ्तारी तक ही रही तो उन पर दुर्भावना का आरोप लग सकता है। इस तोहमत से बचने के लिए एक एक करके सभी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई मुमकिन है। इस बीच ओली की गिरफ्तारी के बाद उपजे आंदोलन और प्रदर्शन को लेकर नेपाली कांग्रेस में अलग-अलग मत उभर कर सामने आया है। बालेन सरकार को सोचना होगा कि आंदोलन और प्रदर्शनों की दशा में उनके समक्ष जनता से किए गए वादों को पूरा कर पाना मुश्किल होगा क्योंकि फिर उन्हें कानून व्यवस्था से निपटने में ही वक्त जाया करना पड़ेगा। ओली की गिरफ्तारी के खिलाफ काठमांडू में जिस तरह की स्थिति उत्पन्न हुई, जाहिर है नवनियुक्त सरकार उससे असहज हुई है। हजारों की संख्या में एमाले कार्यकर्ता राजधानी की सड़कों पर उतर कर कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन गए।

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काठमांडू की मुख्य सड़कों पर मशाल जुलूस निकाल कर बालेन और गृहमंत्री सुदन गुरूंग के इस्तीफे की मांग करते रहे। यह आंदोलन कुछ दिन और चल सकता है। एमाले के पूर्व सांसद मंगल प्रसाद गुप्ता कहते हैं कि जेन जी आंदोलन के उग्र होते ही ओली और गृहमंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ऐसे में सरकारी संपत्तियों के नुकसान और जनहानि की जिम्मेदारी इन पर कैसे हो सकती है। वहीं इस घटना की जांच हेतु गठित आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हामी नेपाल के संचालक सुदन गुरूंग (जो अब गृहमंत्री हैं) ने काठमांडू जिला प्रशासन से शांति पूर्वक आंदोलन की अनुमति ली थी फिर भी ओली सरकार उग्र और हिंसक प्रदर्शन को काबू करने में नाकामयाब रही। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिन्हें आरोपित किया है उनके खिलाफ और गहनता से जांच की आवश्यकता बताई है। हालांकि जांच आयोग ने ओली के खिलाफ तीन साल से दस साल तक कारावास के सजा की संस्तुति की है यह जानते हुए भी कि ओली किडनी रोग के गंभीर मरीज हैं और उनका जीवन डायलिसिस पर निर्भर है। फिलहाल ओली और रमेश लेखक को अभी पांच दिन की पुलिस हिरासत में रखा गया है। ओली की गिरफ्तारी से नेपाल की राजनीति में दहशत भरा सन्नाटा पसरा हुआ है, भ्रष्टाचारी नेता और अफसर किसी कोने में दुबके हुए हैं।

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