विक्रम संवत 2083 का आगाज: आज से चैत्र नवरात्रि शुरू, जानिए घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

आचार्य धर्मेश उपाध्याय

आज 19 मार्च 2026, गुरुवार से हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का शुभारंभ हो गया है। इसी के साथ चैत्र नवरात्रि की शुरुआत भी हो चुकी है। यह पावन पर्व श्रद्धा, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस अवसर पर देशभर में श्रद्धालु जगत जननी माँ भगवती की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना कर रहे हैं।

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घट स्थापना (कलश स्थापना) का शुभ मुहूर्त

  • दिनांक: 19 मार्च 2026, गुरुवार
  • शुभ समय: प्रातः 6:40 बजे के बाद से पूरे दिन
  • पंचांग: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विक्रम संवत 2083 (रौद्र नाम संवत्सर)

कलश स्थापना की विधि (ब्रह्मांड का प्रतीक)

नवरात्रि में कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है।

  • पूजा स्थल पर साफ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।
  • मिट्टी के पात्र में जौ (ज्वारे) बोएं।
  • बीच में जल से भरा कलश रखें और उस पर ‘ॐ’ या ‘स्वास्तिक’ बनाएं।
  • कलश के मुख पर आम के पत्ते रखें और लाल चुनरी में लिपटा नारियल स्थापित करें।

माँ शैलपुत्री का पूजन (नवरात्रि का प्रथम दिन)

नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है।

  • गंगाजल से स्वयं और पूजन सामग्री का शुद्धिकरण करें।
  • हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प लें।
  • धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य और चंदन अर्पित करें।
  • माँ को सफेद कनेर के फूल और गाय के घी का भोग अति प्रिय माना जाता है।

पूजन मंत्र“वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥”

आरती एवं क्षमा प्रार्थना

पूजन के अंत में माता की आरती कर अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा याचना अवश्य करें।

विशेष ज्योतिष उपाय एवं सुझाव

  • व्यापार में उन्नति हेतु राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें।
  • मनोकामना पूर्ति के लिए दुर्गा सप्तशती का सम्पुटित पाठ लाभकारी है।
  • नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाना अत्यंत शुभ माना गया है।
  • घर में सात्विक भोजन और पवित्र वातावरण बनाए रखें।ये भी पढ़ें

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शक्तिशाली मंत्र

“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते॥”

 बाधा मुक्ति एवं समृद्धि हेतु

“सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो, धनधान्यसुतान्वितः।

मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥”

आरोग्य और सौभाग्य हेतु:

“देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥”

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विपत्ति नाश हेतु:

“शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणी नमोऽस्तुते॥”

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