राजेन्द्र गुप्ता
धर्म ग्रंथों के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को गोविंद द्वादशी कहा जाता है। गो का अर्थ है गाय और विन्द का अर्थ है रक्षक, यानी गाय अथवा पृथ्वी के रक्षक। नारदपुराण एवं भविष्यपुराण क अनुसार गोविंद द्वादशी पर भगवान श्रीकृष्ण के गोविन्द स्वरूप का पूजन करना चाहिये। यानी जिस रूप में भगवान श्रीकृष्ण के साथ गायों के साथ दिखाई देते हैं। इस बार गोविंद द्वादशी का व्रत 28 फरवरी, शनिवार को मनाया जाएगा।
गोविंद द्वादशी 2026 पूजा मुहूर्त
सुबह 08:19 से 09:46 तक
दोपहर 12:16 से 01:02 तक (अभिजीत मुहूर्त)
दोपहर 12:39 से 02:05 तक
दोपहर 03:32 से 04:59 तक
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गोविंद द्वादशी व्रत-पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद हाथ में जल, चावल और फूल लेकर व्रत-पूजा का संकल्प लें।
ऊपर बताए गए शुभ मुहूर्त में भगवान गोविंद की पूजा शुरू करें। सबसे पहले भगवान के चित्र के सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
भगवान को फूलों का हार पहनाएं और कुमकुम से तिलक लगाएं। इसके बाद चावल, रोली, अबीर, गुलाल, जनेऊ आदि चीजें भी अर्पित करें।
पूजा करते समय गोविन्दाय नमस्तुभ्यम् मंत्र का जाप निरंतर करते हैं। अपनी इच्छा के अनुसार भोग लगाएं और आरती करें।
पूजा के बाद तिल में घी मिलाकर एक सौ आठ आहुतियों द्वारा हवन करें। दिन भर व्रत के नियमों का पालन करें। रात में सोएं नहीं, भजन-कीर्तन करें।
अगले दिन यानी 1 मार्च, रविवार की सुबह ब्राह्मणों को भोजन, कपड़ों व अनाज आदि का दान करते हुए ये मंत्र बोलें-
नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ।
अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो॥
अर्थ- हे गोविन्द, हे समस्त चराचर जगत के गुरु! मेरे द्वारा किये गये इस धान्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न हों।
इस प्रकार गोविंद द्वादशी के व्रत का विधि-विधान से करने से से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा परेशानियों से मुक्ति भी मिलती है।
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गोविंदा द्वादशी का महत्व: आध्यात्मिक महत्व
गोविंदा द्वादशी का धार्मिक महत्व अग्नि पुराण सहित हिंदू धर्मग्रंथों में गहराई से निहित है। यह महज एक अनुष्ठान नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक निवेश है।
गोविंदा द्वादशी व्रत को पूर्ण श्रद्धा से करने से व्यक्ति को इस नश्वर संसार में सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह व्रत आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त करता है, मोक्ष प्रदान करता है और विष्णु के धाम में स्थान दिलाता है।
यह दिन सच्चे भक्तों को मिलने वाली दैवीय सुरक्षा की याद दिलाता है। जिस प्रकार भगवान नरसिम्हा ने प्रहलाद को बचाने के लिए अवतार लिया था, उसी प्रकार इस दिन का पालन करने से नकारात्मक ऊर्जाओं और पिछले कर्मों के बोझ से सुरक्षा मिलती है।
