फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाला पयोव्रत आज से शुरू हो रहा है। शास्त्रों में इस व्रत को अत्यंत प्रभावशाली और पुण्यदायी माना गया है। विशेष रूप से उत्तम, तेजस्वी एवं गुणवान संतान की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले स्त्री-पुरुषों के लिए इसका विधान बताया गया है। भगवान को प्रसन्न करने वाला यह व्रत “सर्वयज्ञ” और “सर्वव्रत” के नाम से भी प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पयोव्रत का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में मिलता है। मान्यता है कि देवमाता अदिति ने इसी व्रत का पालन किया था, जिसके प्रभाव से भगवान वामन का अवतार हुआ था।
क्या है पयोव्रत
यह व्रत फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर द्वादशी तिथि तक कुल 12 दिनों तक किया जाता है। इस दौरान व्रती संयम और नियमों का पालन करते हुए मुख्य रूप से केवल दूध ग्रहण करता है। व्रत का उद्देश्य भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करना और जीवन की मनोकामनाओं की पूर्ति करना है।
पयोव्रत की विधि-विधान
- व्रत आरम्भ से पहले शुभ मुहूर्त में स्नान एवं शुद्धि की जाती है।
- भगवान विष्णु का पूजन कर संकल्प लिया जाता है।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप विशेष फलदायी माना गया है।
- प्रतिदिन भगवान को दूध से अभिषेक कर पूजा की जाती है।
- व्रती दिन में अल्प मात्रा में केवल दूध ग्रहण करता है।
- द्वादशी तक नियमपूर्वक व्रत करने के बाद त्रयोदशी को विशेष पूजन और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है।
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व्रत के प्रमुख नियम
- व्रत के दौरान दंपत्ति ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- धरती या साधारण बिस्तर पर शयन करें।
- सत्य बोलें और क्रोध, भोग-विलास से दूर रहें।
- किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाएँ।
- भजन, कीर्तन, सत्संग और भगवान के नाम का अधिक से अधिक जप करें।
व्रत समाप्ति का विधान
व्रत पूर्ण होने पर भगवान विष्णु का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है तथा ब्राह्मणों और जरूरतमंद लोगों को सात्त्विक भोजन कराया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि से किया गया पयोव्रत भगवान को प्रसन्न करता है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
