माँ खालिदा की राह पर चले तारिक तो भारत को हो सकता है नुकसान

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अजय कुमार
अजय कुमार

बांग्लादेश की राजनीति में बेगम खालिदा जिया का नाम एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। उनकी सरकार के दौरान भारत के साथ संबंधों में अक्सर तनाव की स्थिति बनी रही, जबकि उनके बेटे तारिक रहमान के नेतृत्व में आने पर ये रिश्ते या तो वैसे ही रह सकते हैं या कुछ बदलाव दिख सकते हैं। बेगम खालिदा जिया ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में 1991 से 1996 तथा 2001 से 2006 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। इस दौरान भारत के साथ उनके संबंधों को कई कारणों से खराब माना जाता है। सबसे पहले तो उन्होंने 1972 की भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि को गुलामी की संधि करार दिया था, जिससे दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक समझौते पर ही सवाल उठ गए। उनकी सरकार ने चीन और पाकिस्तान के साथ गहरे संबंध बढ़ाए, खासकर 2002 में चीन के साथ बड़े रक्षा समझौते हुए, जिससे भारत ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा माना। फरक्का बैराज को लेकर भी उन्होंने भारत की कड़ी आलोचना की और कहा कि इससे बांग्लादेश को गंगा का पानी नहीं मिल पाता।

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ट्रांजिट सुविधा के मुद्दे पर भी उनकी सरकार ने पूर्वोत्तर भारत को बांग्लादेश के रास्ते जाने का विरोध किया, इसे अपनी संप्रभुता से जोड़कर देखा। इसके अलावा, खालिदा जिया के शासनकाल में भारत ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों को शरण दे रहा है, जिससे सीमा पर तनाव बढ़ा। हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों के मामले भी बढ़े, जैसे 1992 के बाबरी मस्जिद विवाद के बाद बांग्लादेश में हिंसा भड़की, जिसमें हजारों हिंदू प्रभावित हुए। 2005 में जमात-उल-मुजाहिदीन के 500 बम धमाकों ने भी स्थिति को और बिगाड़ दिया, क्योंकि भारत ने इसे अपने खिलाफ साजिश माना। इन सबके बावजूद 2012 में खालिदा जिया ने भारत यात्रा की और तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की, जहां उन्होंने संबंध सुधारने की बात कही, लेकिन वापस लौटते ही उनका रुख फिर कड़ा हो गया। कुल मिलाकर, उनकी सरकार में संबंध सुलगते रहे, कोई गर्मजोशी नहीं दिखी।

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इसके विपरीत, शेख हसीना की सरकार ने भारत के साथ संबंधों को मजबूत किया, लेकिन इस बार अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। उन्होंने 1972 की संधि का सम्मान किया और कई समझौते किए। उदाहरण के लिए, 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ढाका यात्रा के दौरान भूमि सीमा समझौता हुआ, जिससे 162 छिटमहल सुलझ गए और हजारों लोगों को नागरिकता मिली। गंगा जल बंटवारे पर 1996 का समझौता हसीना ने मजबूती से लागू किया। ट्रांजिट सुविधा दी गई, जिससे पूर्वोत्तर राज्यों को लाभ हुआ। आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ा, खासकर उग्रवादियों को सौंपने के मामले में। व्यापार बढ़ा, बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना। कोविड महामारी में भारत ने टीके उपलब्ध कराए, जिसे हसीना ने सराहा। बुनियादी ढांचे परियोजनाओं जैसे माहेनगर रेल पुल और कुशियारा नदी पर पुल का निर्माण भारत की मदद से हुआ। सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़ा, जैसे संयुक्त सैन्य अभ्यास और सांस्कृतिक उत्सव।

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इन उदाहरणों से साफ है कि हसीना काल में संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत हुए। अब सवाल है कि खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने से संबंध कैसे होंगे। तारिक बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और मां की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं। 17 साल बाद वे 2025 में बांग्लादेश लौटे, जहां उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। तारिक का रुख भी राष्ट्रवादी है, वे भारत के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं। उन्होंने पूर्वोत्तर उग्रवादियों को शरण देने के आरोपों को खारिज किया, लेकिन पाकिस्तान और चीन के प्रति नरमी दिखाई। हालांकि, हाल के वर्षों में कुछ बदलाव दिखे हैं। खालिदा जिया की हालत खराब होने और उनकी मृत्यु के बाद तारिक ही पार्टी का चेहरा हैं। वे आर्थिक विकास और लोकतंत्र पर जोर देते हैं, जिससे भारत के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखने की जरूरत समझते होंगे। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत पर निर्भर है, निर्यात का बड़ा हिस्सा भारत जाता है। वैश्विक दबाव में भी बदलाव संभव है। लेकिन पार्टी की विचारधारा के कारण संबंध वैसे ही तनावपूर्ण रह सकते हैं, जैसे अल्पसंख्यक सुरक्षा और सीमा विवाद पर। अगर तारिक सत्ता में आए, तो चीन-पाकिस्तान झुकाव बढ़ सकता है, जिससे भारत सतर्क होगा। फिर भी, कूटनीतिक यात्राओं से नरमी आ सकती है, जैसा 2012 में हुआ। कुल मिलाकर, पूरी तरह वैसा ही रहना मुश्किल, कुछ सकारात्मक बदलाव दिख सकते हैं यदि आर्थिक हित प्राथमिक हों।बांग्लादेश की राजनीति हमेशा भारत के लिए महत्वपूर्ण रही है। खालिदा जिया काल की खटास ने सीमा सुरक्षा और व्यापार प्रभावित किया, जबकि हसीना ने सहयोग बढ़ाया। तारिक के नेतृत्व में भविष्य अनिश्चित है, लेकिन पड़ोसी देश होने से संवाद बना रहेगा। दोनों देशों को सीखना होगा कि राजनीतिक बदलाव संबंधों को बिगड़ने न दें। लोकतंत्र की मजबूती ही समृद्धि लाएगी।

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