जनता की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए राघव चड्ढा ने की वेतन बढ़ाने की मांग

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नई दिल्ली। संसद के भीतर महंगाई और वेतन के मुद्दे पर एक अहम बहस देखने को मिली, जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने ‘इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट’ लाने की मांग की। उनका तर्क साफ था—अगर महंगाई लगातार बढ़ रही है तो कर्मचारियों की सैलरी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए, ताकि उनकी वास्तविक आय सुरक्षित रह सके। यूनियन बजट 2026-27 पर चर्चा के दौरान चड्ढा ने कहा कि वित्त वर्ष 2018 से 2026 के बीच वेतनभोगी वर्ग की वास्तविक आय में लगभग 16 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसका मुख्य कारण यह है कि वेतन वृद्धि की दर महंगाई की रफ्तार से पीछे रह गई। नतीजतन, लोगों की क्रय शक्ति कमजोर हुई है। उन्होंने इसे ‘साइलेंट पे कट’ यानी चुपचाप होने वाली तनख्वाह कटौती बताया।

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चड्ढा ने संसद में यह भी रेखांकित किया कि सरकारी कर्मचारियों को महंगाई से आंशिक सुरक्षा मिलती है। उन्हें समय-समय पर डियरनेस अलाउंस (DA) और वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ मिलता है। लेकिन निजी क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 85 प्रतिशत औपचारिक कर्मचारियों के पास ऐसी कोई कानूनी गारंटी नहीं है। उनकी आय कंपनी की नीतियों या व्यक्तिगत बातचीत की क्षमता पर निर्भर रहती है। अपने प्रस्ताव के समर्थन में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी दिए। अमेरिका में कॉस्ट ऑफ लिविंग एडजस्टमेंट (COLA) के जरिए सामाजिक सुरक्षा भुगतान महंगाई से जुड़े होते हैं। जर्मनी और जापान जैसे देशों में नियमित अंतराल पर वेतन समीक्षा की व्यवस्था है, जबकि बेल्जियम में इंडेक्सेशन प्रणाली के तहत वेतन को महंगाई सूचकांक से जोड़ा गया है। चड्ढा का कहना है कि भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में भी कर्मचारियों को ऐसी संरक्षित व्यवस्था मिलनी चाहिए।

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‘इन्फ्लेशन लिंक्ड सैलरी रिवीजन एक्ट’ के तहत न्यूनतम वेतन वृद्धि को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) या किसी मान्यता प्राप्त महंगाई सूचकांक से जोड़ा जा सकता है। इससे वेतन वृद्धि एक पारदर्शी और पूर्वानुमेय प्रक्रिया बनेगी। कर्मचारियों को हर साल यह भरोसा रहेगा कि उनकी आय महंगाई के दबाव से पूरी तरह नहीं तो कम से कम आंशिक रूप से सुरक्षित रहेगी। हालांकि, इस प्रस्ताव पर कई आर्थिक विशेषज्ञ यह भी तर्क दे सकते हैं कि निजी क्षेत्र में अनिवार्य वेतन वृद्धि से कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है, खासकर छोटे और मध्यम उद्योगों पर। ऐसे में कानून बनाते समय संतुलन बनाना जरूरी होगा, ताकि न तो कर्मचारियों का नुकसान हो और न ही उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो। फिलहाल, संसद में उठी यह मांग एक बड़े सामाजिक-आर्थिक विमर्श की शुरुआत है। बढ़ती महंगाई के दौर में वेतनभोगी वर्ग की चिंता वास्तविक है। आने वाले समय में सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

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