बलात्कार और ‘डबल इंजन सरकार’: जिसे तुम नेता कहते हो, उसकी सोच बदबूदार है!

नई दिल्ली। देश में बलात्कार और यौन हिंसा के बढ़ते मामलों के बीच ‘डबल इंजन सरकार’ के दावे अब खोखले प्रतीत होने लगे हैं। सवाल यह नहीं है कि अपराध क्यों हो रहे हैं सवाल यह है कि सत्ता में बैठे लोग इन पर चुप क्यों हैं? भारत की आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा महिलाएं हैं। मतदाता सूची में भी उनकी हिस्सेदारी लगभग आधी है। यानी सत्ता चुनने में महिलाएं बराबर की भागीदार हैं। इसके बावजूद, महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या यौन उत्पीड़न, बलात्कार और उससे जुड़ी हिंसा पर देश का शीर्ष नेतृत्व लगभग मौन है। प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है।

संसद में शोर, सड़कों पर सन्नाटा

संसद के सैकड़ों घंटे कभी ‘वंदे मातरम्’, कभी नेहरू-गांधी परिवार, कभी सोनिया गांधी पर अपमानजनक टिप्पणियों में नष्ट कर दिए जाते हैं। इतिहास बदला जाता है, नाम बदले जाते हैं, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों और नीतियों पर गंभीर बहस शायद ही होती है। हर विधानसभा चुनाव में ‘डबल इंजन सरकार’ का जुमला उछाला जाता है। दावा किया जाता है कि केंद्र और राज्य की एक जैसी सरकारें विकास और सुशासन की गारंटी हैं। लेकिन हकीकत यह है कि कई राज्यों में, जहाँ यह तथाकथित डबल इंजन सरकार है, महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध बढ़े हैं और सत्ता की चुप्पी और गहरी हुई है। बिहार, ओडिशा और उत्तराखंड इसके जीवंत उदाहरण हैं। यह चुप्पी सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि नैतिक पतन है।

पटना गर्ल्स हॉस्टल रेप: एक खबर या एक चेतावनी?

पटना के शम्भू गर्ल्स हॉस्टल में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा के साथ बलात्कार और फिर उसकी हत्या—अख़बारों में यह एक खबर बनकर रह गई। लेकिन असल सवाल यह है कि भारत में स्त्रियों का जीवन इतना सस्ता और असुरक्षित क्यों हो गया है? एक भीड़भाड़ वाले गर्ल्स हॉस्टल में अपराधी कैसे घुसा? उसने बलात्कार और हत्या कैसे कर दी और फरार हो गया? यह एक व्यक्ति था या कई-यह तक साफ़ नहीं। यह सब किसी एक घटना की कहानी नहीं है, बल्कि एक निकम्मी व्यवस्था और चेतना-शून्य सरकार का आईना है। क्या ‘डबल इंजन सरकार’ का मतलब यही है? मणिपुर: जब देश जल रहा था और नेतृत्व मौन था मणिपुर में महीनों तक हिंसा चलती रही। लाशें गिरती रहीं। महिलाओं के साथ अमानवीय यौन अत्याचार होते रहे। लेकिन केंद्र सरकार और उसके मुखिया का व्यवहार ऐसा रहा, मानो वहाँ रामराज्य स्थापित हो गया हो। इतने बड़े देश का नेतृत्व इतनी असंवेदनशीलता कैसे दिखा सकता है?

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अंकिता भंडारी केस: सत्ता से बड़ा अपराधी?

सितंबर 2022 में उत्तराखंड की अंकिता भंडारी के साथ बलात्कार और हत्या हुई। अब फिर से इस केस में बड़े राजनीतिक नाम सामने आ रहे हैं। लेकिन क्या सत्तारूढ़ पार्टी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए आरोपी नेता को पद से हटाया? नहीं। क्योंकि चिंता अंकिता जैसी बेटियों की नहीं, बल्कि सत्ता बचाए रखने की है।

सत्ता की सामूहिक चुप्पी क्या बताती है?

देश और प्रदेश के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की यह चुप्पी साफ संदेश देती है, या तो अपराधी सत्ता के बहुत करीब हैं, या फिर महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या को बड़ा मुद्दा ही नहीं माना जाता।  नेता अपने खिलाफ गाली पड़ने पर रोने लगते हैं, लेकिन बलात्कार पीड़िताओं के लिए उनकी आंखें सूखी रहती हैं। मणिपुर, कठुआ, हाथरस, अलीगढ़, अंकिता भंडारी क्या आपने कभी उन्हें इन बेटियों के लिए रोते देखा है? दुनिया आज एपस्टीन फाइल्स पर चर्चा कर रही है-जहाँ सत्ता, पैसे और यौन अपराधों का खौफनाक गठजोड़ सामने आया। भारत इससे अछूता नहीं है। आसाराम, राम रहीम जैसे नाम इसी समाज की पैदाइश हैं। आस्था की आड़ में बलात्कार और हत्याएं हुईं। सजा भी मिली। लेकिन सत्ता की नज़दीकी के कारण पैरोल और रिहाई का रास्ता बार-बार खोला गया। 2017 में सजा पा चुका राम रहीम अब तक 15 बार पैरोल पर बाहर आ चुका है। क्या प्रधानमंत्री ने कभी इस पर एक शब्द बोला? नहीं। क्योंकि असल चिंता महिलाओं की नहीं, बल्कि वोट बैंक की है।

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महिला सुरक्षा और नेतृत्व का संकट

अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस समय देश में ऐसा नेतृत्व मौजूद नहीं है जिस पर महिलाएं अपनी सुरक्षा को लेकर भरोसा कर सकें। डबल इंजन सरकारें इस कसौटी पर विफल रही हैं। महिलाओं को अब अपनी सुरक्षा के लिए राजनीतिक चेतना विकसित करनी होगी। अगली बार ऐसे किसी भी नेता को नकारना होगा जिसके शासन में बलात्कार होते रहे हों और वह मौन साधे रहा हो-चाहे वह खुद को ‘विकास पुरुष’ कहे, ‘संत’ बने या ‘देश का मसीहा’। जो नेता हर महीने ‘मन की बात’ करता है, लेकिन बेटियों की चीख़ नहीं सुनता वह नेता नहीं,  आख़िरी सवाल : जिसके हाथ में पूरी सत्ता है, पुलिस-प्रशासन है, उसमें संवेदना की इतनी कमी क्यों है? जब उसकी सरकार में एक मासूम बच्ची का बलात्कार होता है और फिर हत्या, तो वह रात को चैन से सो कैसे लेता है? यह सोच बदबूदार है। यह सोच भारत की आधी आबादी को अपमानित करती है। ऐसी सोच और ऐसे लोगों को सत्ता के आसपास भी भटकने नहीं देना चाहिए।

 

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