आज मनाई जा रही विश्वकर्मा पूजा, श्रमिकों से लेकर इंजीनियरों तक ने औजारों को किया नमन

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  • देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की जयंती पर कार्यस्थलों में गूंजा मंत्रोच्चार

राजेन्द्र गुप्ता

देश के कई राज्यों में आज श्रद्धा और आस्था के साथ भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जा रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल समेत अनेक क्षेत्रों में यह पर्व विशेष उत्साह के साथ मनाया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा की जयंती माघ मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ती है, जो वर्ष 2026 में 31 जनवरी, शनिवार को मनाई जा रही है। हालांकि अधिकतर स्थानों पर यह पर्व हर साल 17 सितंबर को कन्या संक्रांति के दिन भी मनाया जाता है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार आज की तिथि को भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

देवताओं के वास्तुकार हैं भगवान विश्वकर्मा

सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रथम वास्तुकार और महान इंजीनियर माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार उन्होंने इंद्रपुरी, स्वर्ण लंका, द्वारका और हस्तिनापुर जैसे भव्य नगरों का निर्माण किया था। मान्यता है कि भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और इंद्र देव का वज्र भी विश्वकर्मा जी की दिव्य रचनाएं हैं। वहीं ओडिशा के पुरी में विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियों के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है।

श्रद्धा से हुई औजारों और मशीनों की पूजा

विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगरों, शिल्पकारों, फैक्ट्री मजदूरों और इंजीनियरों ने अपने-अपने कार्यस्थलों पर मशीनों, औजारों और वाहनों की विधिवत पूजा की। सुबह सबसे पहले कार्यस्थलों की सफाई की गई, फिर चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित कर कलश रखा गया। उपयोग में आने वाले सभी उपकरणों पर तिलक लगाकर फूल चढ़ाए गए और “ॐ विश्वकर्मणे नमः” मंत्र का जाप किया गया। इसके बाद आरती कर फल-मिष्ठान्न का भोग अर्पित किया गया। परंपरा के अनुसार इस दिन मशीनों को विश्राम दिया गया और किसी प्रकार का उत्पादन कार्य नहीं किया गया।

आधुनिक युग में भी बनी हुई है परंपरा की मजबूती

आज विश्वकर्मा पूजा केवल पारंपरिक कारीगरों तक सीमित नहीं रही। आईटी सेक्टर के कर्मचारी अपने लैपटॉप और कंप्यूटर की पूजा करते नजर आए, वहीं ट्रांसपोर्ट और एविएशन क्षेत्र से जुड़े लोग अपने वाहनों और विमानों को नमन करते दिखे। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि जिन साधनों से हम अपनी आजीविका चलाते हैं, उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता भाव बनाए रखना जीवन की सफलता की कुंजी है।

 

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