बेदम दिल्ली, बेबस लखनऊः प्रदूषण से परेशानी इतनी कि….

  • बरसों बाद महबूब से फोन पर बात हुई,
  • उसने पूछा-कैसे हो?
  • हमने कहा…..आंखों में चुभन, दिल में जलन, सांसें भी हैं कुछ थमी-थमी सी, है चारों तरफ धुआं-धुआं,
  • उसने कहा-अभी तक इश्क में हो?
  • मैंने कहा-नहीं, दिल्ली में…

श्वेता शर्मा


लखनऊ। सोशल मीडिया पर मजाक में चल रही यह कविता अपने में गंभीरता भी समेटे हुए है। गंभीरता इसलिए क्योंकि दिल्ली का हर शख्स इस समय धुंध और प्रदूषण से परेशान हैं। अस्पतालों में अस्थमा और दूसरे एलर्जी के मरीजों की लाइन लग गई है। बच्चों के स्कूल बंद हैं, सड़कों पर ट्रैफिक कम है, दुकानदारों का व्यवसाय गिर गया है। ऐसा पिछले साल भी हुआ था। पर व्यवस्था ने उससे कोई सीख नहीं लिया। ठीक यही स्थित लखनऊ की है। यहां सुबह-सुबह धुंध का साम्राज्य छा जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में सूचना मिल रही है कि अस्थमा की पेशेंट सोनिया गांधी दिल्ली छोड़कर कहीं और शिफ्ट होना चाह रही हैं, ताकि वह कुछ दिन प्रदूषणमुक्त माहौल में रह सकें। पर दिल्ली के वे लोग जो दिल्ली छोड़कर जाने की स्थिति में नहीं हैं या जिनका बजट इसकी इजाजत नहीं देता, वे क्या करें। इससे साबित हो रहा है कि मुल्क की राजधानी दिल्ली का हाल इस समय बेहद बेहाल है। यहां की तस्वीर कुछ ऐसी है, जिसे देखना शायद किसी को अच्छा न लगे। धूल और गैस से अटी दिल्ली की हवा प्रदूषित है। निर्माण कार्य, मोटर गाडिय़ों, कूड़े के ढेर और दिल्ली से सटे हरियाणा, पंजाब और यूपी के खेतों में जल रहे ठूंठ ने राजधानी की आबोहवा को इतना प्रदूषित कर दिया है कि अब यहां रहना दूभर हो गया है। आलम यह है कि लोग राजधानी से पलायन करना शुरू कर चुके हैं। दिल्ली के एक मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट जो खुद अस्थमा के पेशेंट हैं, अपने लिए सुरक्षित शहर की तलाश में हैं। पंजाब से आकर दिल्ली में दो पीढिय़ों से रह रहा हरविंदर सिंह का पूरा परिवार अब अपने जिले जालंधर लौट चुका है।

 

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक आंकड़े के मुताबिक दक्षिण दिल्ली के आरकेपुरम इलाके में प्रदूषित पीएम (पर्टिकुलर मैटर्स) 10 की मात्रा 42 गुना अधिक दर्ज की गई। कंट्रोल कमेटी के आंकड़े कहते हैं कि अक्टूबर की तुलना में नवंबर महीने में हवा में मौजूद पीएम 2.5 की मात्रा 2 गुना तक बढ़ चुकी है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की रिपोर्ट बताती हैं कि सितंबर महीने के 23 प्रतिशत दिनों में हवा में प्रदूषण का स्तर खराब स्तर तक व 13 प्रतिशत दिनों में बेहद खराब स्तर तक बढ़ चुका था। अक्टूबर में 27 प्रतिशत दिनों में प्रदूषण का स्तर खराब स्तर तक दर्ज किया गया। वहीं 57.7 प्रतिशत दिनों में प्रदूषण का स्तर बेहद खराब स्तर तक दर्ज किया गया। धुंध की गंध, आंखों का जलना, कुहासे भरी सुबह और धुंधली शाम के बाद घनी अंधियारी रात। यह दिल्ली वालों के लिए एक गहरे रोग का लक्षण है।

हवा में उड़ते कण और सल्फर डाईआक्साइड के बारे में लखनऊ के मशहूर चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. बीपी सिंह कहते हैं कि इससे मृत्यु दर बढ़ती है, फेफड़ों के काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है। वे कहते हैं कि ये महीन कण हमारी श्वास प्रणाली में घुस जाते हैं और हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव ला सकते हैं। वहीं चाइल्ड स्पेशलिस्ट एस. निरंजन कहते हैं कि यह वायु प्रदूषण बच्चों के लिए काफी खतरनाक साबित होता है। सामान्य रूप से 8-10 फीसदी बच्चे एलर्जी की समस्या से ग्रसित रहते हैं। बढ़ता प्रदूषण स्तर उनकी परेशानी को और बढ़ा देता है। यह इरिटेंट्स बच्चों के लिए एक समय काफी खतरनाक हो जाता है। आजकल दुनिया के किसी भी कोने में शुद्ध हवा नहीं मिलती है। जब हम सांस लेते हैं तो आक्सीजन के साथ-साथ कुछ अन्य गैसें और पदार्थ हमारे श्वशन तंत्र में प्रवेश करते हैं। दिल्ली में प्रदूषण का स्तर सामान्य स्तर से 42 गुना तक बढ़ा हुआ रिकॉर्ड किया गया। बच्चों की सेहत पर काफी दिनों से काम कर रहे लखनऊ के जीनियस लेन के डॉ. राहुल भारत कहते हैं कि यह बच्चों के आईक्यू पर जबरदस्त असर डालता है। इससे उनकी एकाग्रता कम हो सकती है। कार्बन मोनो ऑक्साइड के स्तर में इजाफा होने से बच्चों की हृदय धमनियां प्रभावित हो सकती हैं और यह स्नायु तंत्र पर हमला बोल सकता है।

Dr Hemant Kalra in Delhi, Chest Specialist in Delhi,Best Pulmonologist

नई दिल्ली के मशहूर चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. हेमंत कॉलरा कहते हैं कि दिवाली ने दिल्ली के दिल को कमजोर कर दिया है। वह कहते हैं कि डीजल गाडिय़ों के बढ़ते लोड ने राजधानी को रहने लायक नहीं छोड़ा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि बिना सिगरेट पीए ही आपकी बॉडी में 20-25 सिगरेट का प्रदूषण समा रहा है। ऑक्सीडेंट लोड इसी तरह का रहा तो साल 2030 तक हर तीसरा व्यक्ति कैंसर से पीडि़त होगा। बात करते-करते उनकी आवाज कुछ देर के लिए धीमी पड़ जाती है, पूछने पर वह बताते हैं कि अब तो हमारी अगली पीढ़ी ही सुरक्षित नहीं है। मां के पेट में पल रहा गर्भस्थ शिशु भी अब असुरक्षित हो जाता है। मां के श्वास से शिशु को सांस मिलती है, अब जब मां ही प्रदूषित वायु ले रही है तो बच्चे की क्या हालत होगी इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

पिछले दो दशक से सुबह वॉक पर जाने वाले 67 वर्षीय अजय शर्मा कहते हैं कि शरीर पर होने वाला असर कुछ हद तक हवा की पहचान बता देता है। वे कहते हैं कि रोज टहलने के बाद जब मैं थूकता हूं तो काला बलगम निकलता है। अब सामान्य आदमी भी महसूस कर सकता है कि हवा कितनी खराब होती जा रही है। उन्हें अपने पोते की चिंता जरूर सताती रहती है। वह कहते हैं कि अगर उसे चेस्ट की कोई बीमारी हो गई तो क्या होगा? यहां रह रहे परिवार के किसी भी व्यक्ति को यह खतरनाक रोग हो गया तो हम क्या करेंगे?

Dr A K Singh, Chest Specialist in Delhi, Best Pulmonologist in Delhi

नई दिल्ली के प्रसिद्घ चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. अनिल सिंह कहते हैं कि प्रदूषण सबसे कमजोर को अपना शिकार बनाता है। सबसे सीधा और आजीवन असर बच्चों पर होता है जिनकी सेहत के कई पहलू प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा बूढ़ों, गर्भवती औरतों, श्वास सम्बन्धी बीमारी से ग्रस्त लोगों, बाहर काम करने वाले लोगों जैसे ट्रैफिक पुलिस, रेहड़ी लगाने वालों, निर्माण मजदूरों और बेघर लोगों को यह कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। वह कहते हैं कि प्रदूषित हवा कई जहरीले घटकों का मिश्रण होती है, जिसमें ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और महीन कण (दस माईक्रॉन छोटे कण)। वह कहते हैं कि कण जितने छोटे और महीन होंगे, सेहत को उतना ही नुकसान पहुंचाएंगे। वह चिंता भी व्यक्त करते हैं कि आज दिल्ली की हवा में अतिसूक्ष्मदर्शी पीएम 2.5 कणों का उच्चतम स्तर मौजूद है जो फेफड़ो में गहरे जाकर जम जाता है और वहां से रक्त प्रवाह का हिस्सा बन जाता है।

डॉ. सिंह कहते हैं कि तत्काल होने वाले नुकसान जैसे किसी ट्रैफिक के चौराहे पर आंखों में पानी आने या गले की खराश आदि तथा दीर्घकालिक जानलेवा खतरों के बीच फर्र्क बरतते हैं। पल्मनरी चिकित्सा के प्रमुख डॉ. हेमंत कॉलरा कहते हैं कि वायु प्रदूषण गंभीर बीमारियों की रफ्तार को बढ़ा देता है। वह कहते हैं कि इस माहौल में एक्यूट अस्थमिक अटैक का खतरा मंडराने लगा है। इस अटैक से बचने के लिए रोगी को कम से कम एक लाख रुपये खर्च करने पड़ेंगे और उसके बाद दवाइयां करीब ढाई से तीन गुनी तक महंगी हो जाएंगी। वह कहते हैं कि आने वाले दशक में राजधानी के अधिकांश बच्चे दिल, श्वास और एलर्जी की समस्या से घिर जाएंगे। वह इसका जायज कारण भी गिनाते हैं। वह कहते हैं कि शाम के समय बच्चे पार्कों में खेलने निकलते हैं। उस समय रोड पर गाडिय़ों का प्रेशर ज्यादा होता है। खेलते समय बच्चे तेजी से सांस लेते हैं। उस समय ६० फीसदी ज्यादा सांसे अंदर प्रवेश करती हैं, साथ ही वह सीधे लंग्स में गहरे समाती रहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि नब्बे के दशक में भारत में हर साल 40,000 से ज्यादा लोग वायु प्रदूषण के कारण असमय मरते थे। वर्ष 2000 में यह आंकड़ा एक लाख तक पहुंच गया और 2010 तक 6,27,000 हो गया। यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा 50 देशों की 300 संस्थाओं के बीच एक गठजोड़ के तहत किए गए ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज नामक अध्ययन में सामने आया था। कंजर्वेशन ऐक्शन ट्रस्ट और अर्बन एमिशंस नामक स्वतंत्र शोध समूहों का एक ताजा अध्ययन बताता है कि साल 2030 तक कोयला जलाने से प्रदूषण संबंधी मौत दोगुनी से बढ़कर तिगुनी हो सकती है।
ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज का एक अध्ययन 1990 से 2010 के बीच किया गया था, जिसमें मौत के 200 से ज्यादा कारणों की पड़ताल की गई थी। इसने पाया कि भारत में सालाना बाहरी सूक्ष्म कणों से होने वाली असमय मौतें 6,27,000 थीं। ये महीन कण श्वास की नली को बाधित करते हैं और रक्त प्रवाह में घुस जाते हैं। इनसे शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं। डॉ. कॉलरा कहते हैं कि वातावरण का वायु प्रदूषण पुराने किस्म के अवरोधक पल्मोनरी रोग, श्वास की बीमारियों, दिल के रोग, सेरीब्रोवैस्कुलर रोग और ट्रैकिया व फेफड़े का कैंसर पैदा कर सकते हैं। वह बताते हैं कि एक स्वस्थ व्यक्ति औसतन 15 घन मीटर हवा रोजाना सांसों के जरिए लेता है। यह एक कमरे के बराबर हवा है। वायु प्रदूषण का लंबा असर होने से या तो ज्यादा हवा भीतर लेने की फेफड़ोंकी क्षमता कम हो जाती है या फिर फेफड़ों की कोशिकाएं संक्रमण का शिकार हो जाती हैं। इस प्रकार उनमें लचीलापन लगभग खत्म हो जाता है। इसके बाद फेफड़ों की सुरक्षात्मक कोशिकाओं की पहली सतह यानी अल्वियोलर मैक्रोफेज में बदलाव आने लगते हैं और फेफड़ों में कमजोरी बढऩे लगती है। डॉ. कॉलरा कहते हैं कि भारत में प्रदूषक तत्वों के अलग-अलग प्रभाव जानने के लिए हमें और ज्यादा महामारी संबंधी अध्ययनों की जरूरत होगी। वे कहते हैं कि प्रदूषित हवा के खतरों को स्थापित करने के लिए हमारे पास कहीं ज्यादा पर्याप्त साक्ष्य हैं।

Dr. G K Mondal (Chittaranjan National Cancer Institute) in Kalighat,Kolkata - Best Haemato Oncologist Doctors near me in Kolkata - Justdial

साल २०१५ में लखनऊ में हुए एक वर्कशॉप में डॉ. अशोक महासुर ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और कोलकाता के चितरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के 2012 के अध्ययन का हवाला दिया था। उन्होंने बताया था कि दिल्ली के हर तीसरे बच्चे का फेफड़ा सामान्य से कम काम करता है। दिल्ली के बच्चों के थूक में लौह मिश्रित माइक्रोफेज की चार गुना उपस्थिति थी, जो पल्मोनरी हेमरेज का संकेत है। एक अन्य डॉक्टर ने दिल्ली और कोलकाता के निवासियों पर साल 2000 से 2006 के बीच शहरी हवा के सेहत पर असर के संबंध में एक अध्ययन पेश किया था। उनके अनुसार स्कूली बच्चे और ग्रामीण क्षेत्रों से अलग-अलग उम्र और लिंग के लोग भी शामिल थे, जहां वायु प्रदूषण की मात्रा कम है। इसमें पाया गया कि गांवों के 14.6 और 8 फीसदी के मुकाबले दिल्ली के 23 व 17 फीसदी बच्चों में बहती नाक, कफ, लाल आंखें, साइनसाइटिस और पुरानी खांसी, छींक, छाती में दिक्कत, श्वास संबंधी लक्षण मौजूद थे। दिल्ली के मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत के दखल के बाद जब प्रदूषक उद्योगों को शहर के बाहर ले जाया गया था और सार्वजनिक यातायात को सीएनजी पर आश्रित कर दिया गया था तब कुछ समय तक यहां की हवा की गुणवत्ता में सुधार आया था लेकिन वाहनों की बढ़ती संख्या ने दोबारा वही हालात पैदा कर दिए हैं। दिल्ली के अशोक शर्मा कहते हैं कि दिल्ली की आम आदमी सरकार ऑड-ईवन फार्मूले की बदौलत इस समस्या से निजात पाने की कमतर कोशिश कर रही है। आंकड़ें बताते हैं कि भारत में सल्फेट्स को जरा भी नियंत्रित नहीं किया जाता, क्योंकि भारतीय कोयले में सल्फर का अंश कम होता है। वायु प्रदूषण से गंभीरता से निबटने के लिए इसके एक-एक कण को समझने की जरूरत है। वे कहते हैं कि दिल्ली का अध्ययन बहुत ज्यादा है, क्योंकि यहां हवा की गुणवत्ता की माप करने वाले मॉनिटर्स की संख्या अपेक्षाकृत अधिक हैं।

सार्वजनिक परिवहन को और ऊर्जा कुशल इमारतों को प्रोत्साहित करने के माध्यम से मांग के प्रबंधन के अलावा, हवा की गुणवत्ता में सुधार करने के निर्णय के लिए नीतियों की सहज समझ में बदलाव लाने की जरूरत है, ऐसी नीतियों की जो अनुपालन पर केंद्रित हों।वहीं दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल इसे भी पीएम मोदी की चाल बताते हैं। ट्वीटर पर भेजे मैसेज- ‘दिल्ली में बढ़े वायु प्रदूषण के बारे में आपकी क्या राय?Ó के जवाब में आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री कहते हैं कि हमें बदनाम करने की यह मोदी की चाल है।

बीजिंग से आगे दिल्ली

दुनिया में सर्वाधिक प्रदूषित कुल 20 शहरों में 13 भारत में हैं, जिनमें राजधानी दिल्ली को दुनिया की किसी भी राजधानी से ज्यादा प्रदूषित शहर बताया जा रहा है। बीजिंग के अनुभवों से सबक लेने की बजाय दिल्ली उसे पछाड़कर नंबर-1 बन चुकी है। इसके अलावा पटना, ग्वालियर, रायपुर, अहमदाबाद, कोलकाता, मुम्बई, बेंग्लुरू, चैन्नई और यूपी से लखनऊ व आगरा शहर शामिल हैं। वैसे अमेरिका में टेक्सास का लिरेडो शहर और मैक्सिको के कोआहुइला का प्रदूषण स्तर दिल्ली के बराबर है।

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