दो टूक : मादुरो का साथ देकर ट्रंप से यूं ही नहीं टकरा रहे हैं रूस और चीन,जरा समझिये

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राजेश श्रीवास्तव

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो व उनकी पत्नी को उनके बेडरूम से आधी रात उठा लिया तो कई देशों  को तो सांप सूंध गया लेकिन चीन और रूस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ट्रंप को सीधी चुनौती दे डाली कि मादुरों को तुरंत रिहा करो। आखिर इस चुनौती के क्या मायने हैं और अमेरिका से जब कोई टकराने के बारे में सोच नहीं रहा तो चीन क्यों दो-दो हाथ करने पर उतारू हैं, यह हमें समझना होगा। सवाल है कि चीन और रूस वेनेजुएला के साथ क्यों खड़े हैं? क्या दोनों देश अमेरिका से दुश्मनी मोल ले रहे हैं, या इसके पीछे गहरी कूटनीतिक और आर्थिक रणनीतियां काम कर रही हैं?
दरअसल वेनेजुएला बीते कुछ वर्षों से वैश्विक राजनीति का प्रमुख मैदान बना हुआ है। ऐसे में जब भी अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंध या राजनीतिक दबाव के रूप में कोई आक्रामक कदम उठाता है तो रूस और चीन उसकी तीखी आलोचना करते आए हैं। ताजी आलोचना उसी पुराने क्रम को आगे बढ़ाती हुई दिखाई देती है. रूस और चीन दोनों लंबे समय से यह सार्वजनिक रूप से कहते आए हैं कि किसी भी संप्रभु देश की सरकार बदलने का अधिकार केवल उस देश के नागरिकों को है, किसी बाहरी शक्ति को नहीं। अमेरिका ने इराक, लीबिया, अफगानिस्तान, सीरिया और कई लैटिन अमेरिकी देशों में प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप कर सरकारें बदलने की जो परंपरा बनाई, उसे रूस और चीन अपने लिए भी खतरनाक मिसाल मानते हैं। उनकी नज़र में यदि वेनेज़ुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप सफल होता है, तो यह सिद्धांत बन जाएगा कि जब भी किसी सरकार की नीतियां वॉशिगटन को पसंद न आएं, तो आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव के ज़रिए उसे झुका दिया जाए। रूस और चीन दोनों ही खुद को ऐसी किसी भी भविष्य की स्थिति से बचाना चाहते हैं, इसलिए वे सिद्धांत के स्तर पर अमेरिकी हमलों और दखलंदाज़ी की कड़ी आलोचना करते हैं।

अमेरिका का सबसे बड़ा औज़ार आर्थिक प्रतिबंध हैं, जो अक्सर डॉलर और अमेरिकी वित्तीय तंत्र पर दुनिया की निर्भरता के कारण बेहद प्रभावी हैं। रूस और चीन अच्छी तरह समझते हैं कि आज वेनेज़ुएला है, कल वे खुद भी इसी तरह के प्रतिबंधों का और व्यापक पैमाने पर सामना कर सकते हैं। इसीलिए वे दोनों मिलकर ऐसे विकल्प तैयार कर रहे हैं जिनसे किसी देश को पूरी तरह अमेरिकी वित्तीय तंत्र पर निर्भर न रहना पड़े। वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम, दो पक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग, और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के समानांतर नई व्यवस्थाएं, ये सब प्रयास अमेरिका की आर्थिक पकड़ को सीमित करने के लिए हैं।
जब वेनेज़ुएला पर अमेरिकी प्रतिबंध लगते हैं और रूस चीन उनकी आलोचना करते हुए वैकल्पिक व्यापार या कर्ज़ व्यवस्था मुहैया कराते हैं, तो वे सिर्फ वेनेज़ुएला की मदद नहीं करते, बल्कि दुनिया को दिखाते हैं कि अमेरिकी प्रतिबंधों को आंशिक रूप से निष्प्रभावी भी किया जा सकता है। रूस सैन्य सहयोग, सुरक्षा समझौते और रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

अमेरिकी हमले या दबाव के समय वेनेज़ुएला का साथ देना और उस पर हो रही सैन्य या राजनीतिक कार्रवाई की आलोचना करना, इसा व्यापक रणनीति का हिस्सा है। रूस और चीन, दोनों देशों की घरेलू राजनीति में पश्चिम विरोधी या कम से कम अमेरिका संदेहवादी रुझान काफ़ी प्रबल हैं। रूस में नाटो के विस्तार, यूक्रेन संकट और शीत युद्ध के बाद की नीतियों को लेकर अमेरिकी नेतृत्व के प्रति व्यापक अविश्वास है। चीन को अपने चारों ओर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति, ताइवान के सवाल, व्यापार युद्ध और तकनीकी प्रतिबंधों से चुनौती महसूस होती है। ऐसे माहौल में यदि वेनेज़ुएला जैसे देश पर अमेरिका सैन्य हमले की आलोचना करके रूस और चीन अपने घरेलू समर्थकों को यह संदेश देते हैं कि उनकी सरकारें वैश्विक मंच पर अमेरिकी दबंगई के खिलाफ खड़ी हैं। इससे उनकी आंतरिक वैधता मजबूत होती है और वे खुद को स्वतंत्र और मज़बूत राष्ट्रों के रूप में पेश कर पाते हैं, जो किसी भी दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं। पहली नज़र में लग सकता है कि रूस चीन वेनेज़ुएला का साथ सिर्फ इसलिए दे रहे हैं क्योंकि वे अमेरिका के विरोधी हैं। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं ज़्यादा जटिल है। अमेरिका से टकराव उनकी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वेनेज़ुएला रूस और चीन के लिए केवल एक छोटा देश नहीं, बल्कि एक ऐसा मोर्चा है जहाँ वे अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को चुनौती दे सकते हैं और अपने लिए दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित कर सकते हैं।

रूस और चीन अमेरिकी एकाधिकार को तोड़ना चाहते हैं। वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडार और आर्थिक संभावनाओं से उन्हें दीर्घकालिक लाभ दिखता है। डॉलर आधारित प्रतिबंधों के विकल्प खड़े करने की उनकी कोशिशें, वेनेज़ुएला जैसे मामलों से मज़बूत होती हैं। लैटिन अमेरिका में बढ़ते रूसी चीनी प्रभाव के लिए यह एक अहम मंच है। घरेलू स्तर पर वे खुद को अमेरिका के दबाव के सामने झुकने से इनकार करने वाली ताकतों के रूप में दिखा पाते हैं। वेनेज़ुएला जैसे देश का साथ देना इसी रणनीति का हिस्सा है। जब रूस और चीन अमेरिकी हमले या प्रतिबंधों की पुरज़ोर आलोचना करते हैं, तो वे पूरी दुनिया को यह संदेश देते हैं कि अमेरिकी आदेश ही अंतिम नहीं है। वे यह दिखाना चाहते हैं कि कमजोर या घिरे हुए देश अकेले नहीं हैं, उनके पास वैकल्पिक साझेदार और समर्थन प्रणाली मौजूद है। इससे रूस चीन की साख उन देशों में बढ़ती है जो अमेरिका से असंतुष्ट हैं या उसके दबाव में खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। इसके पीछे दूसरा अहम कारण यह भी है कि चीन वेनेजुएला से बड़ी मात्रा में पेट्रोल लेता है और अब वेनेजुएला पर सीधा अमेरिकी नियंत्रण हो जायेगा। ऐसे में चीन का सीधा नुकसान भी होगा।

वेनेज़ुएला दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार वाले देशों में है। भले ही वहां की अर्थव्यवस्था संकट में है, लेकिन लंबी अवधि में उसके तेल संसाधन बेहद महत्वपूर्ण हैं। रूसी तेल और गैस कंपनियों ने वेनेज़ुएला में निवेश किया है। रूस को यह भी लाभ है कि यदि अमेरिका के प्रतिबंधों से वेनेज़ुएला पश्चिमी बाज़ार से कटता है, तो वह रूस और चीन जैसे दोस्त देशों को रियायती दरों पर तेल बिक्री को प्राथमिकता देगा। इससे रूस को ऊर्ज़ा बाज़ार में रणनीतिक साझीदार मिलेगा और पश्चिम के दबाव के बावजूद वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं बनती हैं। चीन विश्व का सबसे बड़ा ऊर्ज़ा आयातक है। वह अपने लिए दीर्घकालिक ऊर्ज़ा सुरक्षा चाहता है और विविध स्रोतों का नेटवर्क बनाता जा रहा है। वेनेज़ुएला के साथ क़र्ज़, निवेश और तेल खरीद के माध्यम से चीन ने एक प्रकार का परस्पर निर्भर संबंध है। अमेरिकी दबाव बढ़ने पर वेनेज़ुएला के लिए चीन और भी अहम साथी बन जाता है, और चीन को लंबे समय तक सस्ते या अनुकूल शर्तों पर तेल मिलता है। इस तरह अमेरिकी हमलों की आलोचना के साथ साथ रूस और चीन वास्तव में अपने आर्थिक और ऊर्ज़ा हितों की भी रक्षा कर रहे हैं।

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