- 2012 पुणे जर्मन बेकरी काण्ड का सह आरोपी बंटी जहांगीरदार ढेर,
- जब न्याय सोता है, तो अज्ञात बंदूकें जागती हैं,
रंजन कुमार सिंह
अहिल्यानगर (पहले अहमदनगर, महाराष्ट्र) में कल यानि बुधवार की दोपहर चिलचिला रही थी, लेकिन श्रीरामपुर के जर्मन हॉस्पिटल के गेट के बाहर कुछ और ही तप रहा था। भीड़-भाड़ वाली सड़क पर अचानक दो बाइकें दिखती हैं, हेलमेट लगाए हुए अज्ञात लोग स्लो मोशन में फ्रेम में आते हैं, कुछ सेकंड, कुछ गोलियाँ, और 2012 पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट का सह-आरोपी बंटी जाहगीरदार ज़मीन पर चारों खाने चित्त ढेर हो चुका होता है।

लब्बोलुआब ये कि बंटी जहागीरदार की अज्ञात शूटर्स ने बुधवार को श्रीरामपूर में हत्या कर दी। वह साल 2023 से बेल पर बाहर था। पुणे बम धमके में 18 बेकसूर लोग मारे गए थे। श्रीरामपुर के राजनीतिक और आपराधिक क्षेत्र में सक्रिय असलम शब्बीर शेख उर्फ बंटी जहागीरदार (53) की अहिल्यानगर के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हुई। बंटी जहागीरदार कब्रिस्तान से लौट रहा था, तभी श्रीरामपुर शहर के जर्मन अस्पताल के सामने मुख्य गेट के पास अज्ञात हमलावरों ने उस पर ताबड़तोड़ गोलियां दागीं और इसे स्थाई तौर पर वापस कब्रिस्तान पहुंचा दिया। घटना को अंजाम देने के बाद हमलावर मौके से निकल गए। इस घटना का CCTV फुटेज वायरल है।
जर्मन बेकरी बम धमाके के मामले में गिरफ्तार हुआ था बंटी
उल्लेखनीय है कि अगस्त 2012 में पुणे में जर्मन बेकरी बम धमाके के मामले में इसे गिरफ्तार किया गया था।वर्ष 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसे इस मामले में जमानत दे दी थी। इसके अलावा श्रीरामपुर में उसके खिलाफ लूट, हत्या, फिरौती, कब्जा आदि के अन्य कई आपराधिक मामले भी दर्ज थे, जिसके चलते उसे कई बार तड़ीपार भी किया गया था।
राजनीति में भी यह सक्रिय रहा है,
बंटी जहागीरदार पहले राजनीति में भी सक्रिय रहा है। साल 2025 में हुई नगर परिषद चुनाव में उसके चचेरे भाई की जीत में पर्दे के पीछे उसकी भूमिका होने की भी चर्चा रही है।
एक आदमी, दर्जनों केस, लेकिन सज़ा शून्य
बंटी उर्फ असलम शब्बीर शेख का नाम सिर्फ 2010 जर्मन बेकरी धमाके तक सीमित नहीं था। 2012 पुणे सीरियल ब्लास्ट, हत्या, मारपीट, धमकी, संगठित अपराध और ऐसे कई आतंकवादी और आपराधिक मामलों में उसका नाम पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज रहा है। लेकिन न्यायिक व्यवस्था की कछुआ चाल और भ्रष्ट तंत्र का कमाल देखिए कि कुछ मामलों में वह बरी, कुछ में ट्रायल सालों से लटका, और बाकी में चार्जशीट तक पूरी तरह नहीं पहुंची। गवाहों की हालत यह कि जो कभी अदालत के बाहर दहशत की कहानियां सुनाते थे, वही अदालत के अंदर आकर या तो चुप हो जाते थे या पूरी तरह पलट जाते थे। कोर्ट के दस्तावेज़ बताते हैं कि उसके खिलाफ 2002 से लेकर 2023 तक कई गंभीर केस दर्ज हुए, कुछ में उसे बरी कर दिया गया, कुछ आज भी लंबित हैं, और प्रशासन ने उसे “खतरनाक प्रवृत्ति” का बताते हुए कई जिलों से तड़ीपार यानि बाहर कर दिया, क्योंकि आम नागरिक और गवाह उसके खिलाफ गवाही देने से डरते थे।
जब सिस्टम सोता है, तो “अज्ञात” जागते हैं,
आधिकारिक बयान आज भी वही है कि दो अज्ञात बाइक सवारों ने हमला किया, स्पेशल टीमें गठित, जांच जारी, मकसद स्पष्ट नहीं। लेकिन ज़मीन पर रहने वाली जनता की ज़ुबान कुछ और कह रही है। जब कोर्ट नहीं कर पाया, तो “अज्ञात” ने कर दिया। इतने सालों से केस लटके थे, अब फाइनल हो गया। यह लाइन क़ानूनी तौर पर भले गलत हो, लेकिन यह जनता के अविश्वास की खतरनाक सच्चाई है। जब अदालतें तारीख़ पर तारीख़ देती हैं, एजेंसियाँ चार्जशीट के साथ राजनीति खेलती हैं और गवाह डर के मारे पलटते रहते हैं, तब समाज के एक हिस्से में यह धारणा बनती है कि “अज्ञात लोग” ही असली कोर्ट हैं, जो बिना अपील, बिना दलील, सीधे फ़ैसला सुना देते हैं।
