- विराट नगर के होटल में नेपाल पुलिस द्वारा पकड़े गए रंगे हाथ,
- खुद को बिहार का जज बताने पर छोड़ दिया था नेपाल पुलिस ने,
- नेपाली मीडिया ने कर दिया भंडाफोड़, खबर छा गई इंटरनेट पर,
रंजन कुमार सिंह
बिहार सरकार ने सोमवार को निचली अदालत के तीन न्यायाधीशों को अनैतिक आचरण का दोषी पाते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। यह तीनों न्यायाधीश जनवरी 2013 में नेपाल के विराटनगर में होटल के कमरे में लड़कियों के साथ रंगरेलियां मनाते हुए पकड़े गए थे। इसी घटना को लेकर तीनों न्यायाधीशों को बिहार सरकार ने सेवा से बर्खास्त कर दिया है। जिन न्यायाधीशों को बिहार सरकार ने बर्खास्त किया है उसमें समस्तीपुर के फैमिली कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश हरी निवास गुप्ता, अररिया के चीफ ज्यूडिशल मजिस्ट्रेट कोमल राम और अररिया के तदर्थ तत्कालीन अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जितेंद्र नाथ सिंह शामिल हैं। इन तीनों की सेवा से बर्खास्तगी फरवरी 12, 2014 से लागू होगी जब राज्य सरकार ने पहली बार पटना हाई कोर्ट की अनुशंसा पर बिना अनुशासनात्मक जांच के सेवा से बर्खास्त किया था। राज्य सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन में साफ किया गया है कि तीनों न्यायाधीशों को सेवा से बर्खास्त करने के बाद सभी किसी भी प्रकार की सुविधा के हकदार नहीं होंगे। पटना हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच का निर्देश दिया था। इसमें तीनों दोषी पाए गए थे। जांच के बाद फरवरी 12, 2014 को हाई कोर्ट ने बिहार सरकार को अनुशंसा की थी कि तीनों न्यायाधीशों को सेवा से बर्खास्त किया जाए।
उस वक्त तीनों न्यायाधीशों ने सेवा से बर्खास्तगी के फैसले को चुनौती दी थी और आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ बिना किसी प्रकार की जांच के ही सेवा से बर्खास्तगी की गई थी। इसके बाद पटना हाई कोर्ट ने 5 जजों की एक समिति बनाकर फिर से इन तीन न्यायाधीशों को बर्खास्त करने का आदेश जारी किया। इस फैसले को तीनों न्यायाधीशों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और उस समय हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। नवंबर 8, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के अपने फैसले को वापस लिया जिसके बाद बिहार सरकार ने सोमवार को इन तीनों को सेवा से बर्खास्त करने के लिए अधिसूचना जारी कर दी।
पटना हाईकोर्ट ने जिन तीन तीन जजों की बर्खास्तगी की सिफारिश की है, उनमें से एक का कहना है कि वह इसके खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। जितेंद्र नाथ सिंह ने एक अखबार को बताया कि उनका परिवार सदमे में है। उन्होंने कहा, ‘हालांकि मुझे हाई कोर्ट की फुल कमेटी के फैसले के बारे में औपचारिक तौर से कोई जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन मैंने इस बारे में सुना है। अब जब हमें हमारी बात कहने तक का मौका नहीं दिया गया तो क्या कहा जाए? मेरे 24 साल के कॅरिअर में मेरे चरित्र पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता। पर, अब एक झटके में मेरा चरित्र दागदार हो गया।’ उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि, उनके पास विकल्प सीमित हैं, लेकिन वह कानूनी विकल्पों पर विचार करेंगे। एक अन्य न्यायिक अधिकारी, कोमल राम का कहना है कि जिस दिन की घटना बताई जा रही है, उस दिन वह पूर्णिया में थे। तीसरे न्यायिक अधिकारी की प्रतिक्रिया अब तक सामने नहीं आई है।
पहले डिमोट किए गए थे
शुरुआती जांच के आधार पर तीनों न्यायिक अधिकारियों को डिमोट कर दिया गया था। पूर्णिया के जिला जज संजय कुमार ने मामले की जांच की थी तो 26-27 जनवरी, 2013 को आरोपी जजों के मोबाइल फोन की लोकेशन भारत-नेपाल सीमा के पास फारबिसगंज (अररिया) में पाई गई थी। कोमल राम का कहना है कि वह 26-27 जनवरी, 2013 को परिवार के साथ पूर्णिया में थे, जबकि दो अन्य जजों ने उन दिनों में नेपाल में मौजूद होने की बात मानी है। बिहार पुलिस का भी कहना है कि उसने भी इन जजों के मोबाइल फोन को 26 जनवरी, 2013 की दोपहर ढाई बजे से 27 जनवरी को 11 बजे दिन तक साइलेंट मोड में पाया था। 27 जनवरी को 11 बजे दिन के बाद उनके मोबाइल फोन भारत में चालू हुए थे। मामले में 5 फरवरी को चीफ जस्टिस दोषित की अध्यक्षता में सात सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी की बैठक हुई थी। बैठक में सर्वसम्मति से तय हुआ कि तीनों को बर्खास्त कर दिया जाए।
जज बताने पर नेपाल पुलिस ने इन्हें छोड़ दिया था
नेपाल के विराटनगर में मौज़ मस्ती करने के मामले में बर्खास्त जज हरिनिवास गुप्ता व अन्य दो जजों के कारनामे बहुत आसानी से लोगों के सामने नहीं आए। दरअसल, ये सभी नेपाल की पुलिस की छापेमारी में लड़कियों के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिए गए थे। लेकिन, जैसे ही पता चला कि ये भारत से हैं और वहां जज हैं। इसके बाद उन्हें छोड़ भी दिया गया था। इस तरह से देखा जाए तो पूरे मामले पर पर्दा डाल ही दिया गया था। लेकिन, वहां के स्थानीय अखबार के किसी संवाददाता को इसकी भनक लग गई। इसके बाद जैसे ही यह खबर वहां प्रकाशित हुई, पूरी घटना इंटरनेट मीडिया पर आ गई।
नेपाली अखबार ने पूरे मामले से उठाया था पर्दा
तीनों मादरणीय नेपाल के विराटनगर चले गए। वहां बस स्टैंड के निकट मेट्रो गेस्ट हाउस में मौज मस्ती करने लगे। नेपाली पुलिस की छापेमारी में लड़कियों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में तीनों पकड़े गए थे। न्यायिक अधिकारी होने के कारण नेपाली पुलिस ने तीनों को छोड़ दिया था। नेपाल के एक अखबार ने इसका भंडाफोड़़ करते हुए खबर प्रकाशित कर दी। इसके बाद यह मामला गरमाया। हाईकोर्ट ने पूर्णिया के तत्कालीन जिला जज संजय कुमार से मामले की जांच कराई। जांच रिपोर्ट में मामला सत्य पाए जाने के बाद हाईकोर्ट की स्टैंडिंग कमेटी ने तीनों को बर्खास्त करने की सिफारिश की थी। हाईकोर्ट की सिफारिश के आधार पर राज्य सरकार की कैबिनेट ने तीनों की बर्खास्तगी पर मुहर लगा दी। बाद में हाईकोर्ट की भी इसको स्वीकृति मिल गई।
