समय होत बलवान… एक झटके से हार गया घमंड और जीत गया ‘संगठन’

  • बीजेपी के अलावा किसी पार्टी में नहीं दिख सकता इस तरह का नजारा
  • हाथ बांधे खड़े दिखे पार्टी के वरिष्ठतम नेता और देरी से पहुंचे कार्यकारी अध्यक्ष

रंजन कुमार सिंह

इंडिगो की एक फ्लाइट का कुछ देर से पहुँचना यह अपने आप में कोई खबर नहीं थी। देश में रोज़ सैकड़ों उड़ानें देर से उतरती हैं। लेकिन उस दिन दृश्य असाधारण था। असाधारण था वह क्षण, जब भाजपा कार्यालय के मुख्य द्वार पर देश के गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी नड्डा, केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और संगठन के वरिष्ठ नेता अरुण सिंह सभी हाथ बाँधे, शांत मुद्रा में, किसी की प्रतीक्षा करते खड़े थे। वे प्रतीक्षा कर रहे थे भाजपा के नवनियुक्त कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की। राजनीति के रंगमंच पर यह दृश्य केवल एक स्वागत नहीं था, यह एक संदेश था। ऐसा संदेश, जिसे समझने के लिए शब्दों से अधिक संस्कारों को पढ़ना पड़ता है। कल तक वही नितिन नबीन थे, जो बिहार दौरे पर आए इन दिग्गज नेताओं के स्वागत में हवाई अड्डे पर एक पुष्प लिए कतार में खड़े रहते थे। आज तस्वीर उलट चुकी थी। पद बदला था, भूमिका बदली थी, लेकिन भावना वही थी।

यह अहंकार की हार और संगठन की जीत का दृश्य था। यही वह बिंदु है, जहाँ भाजपा और संघ की कार्यशैली शेष राजनीतिक दलों से अलग दिखाई देती है। यहाँ निर्णय किसी एक कमरे में, किसी एक चेहरे की इच्छा से नहीं होते। यहाँ हर फैसले से पहले लंबा मंथन होता है, बहस होती है, सवाल उठते हैं, असहमति दर्ज होती है, कभी-कभी तीखे मतभेद भी सामने आते हैं। लेकिन जैसे ही निर्णय हो जाता है, उसके बाद व्यक्तिगत राय का कोई स्थान नहीं रहता। फिर केवल संगठन बोलता है और सभी उसी स्वर में खड़े हो जाते हैं। इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि संघ और भाजपा के भीतर मतभेद हुए हैं, टकराव हुए हैं, परंतु संगठन कभी टूटा नहीं। कल्याण सिंह हों या उमा भारती नेतृत्व से मतभेद जरूर हुए, रास्ते अलग जरूर हुए, लेकिन कैडर साथ नहीं गया।

एक चुटकुला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उस जोक्स में संघ के लोग नितिन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने को कहते हैं। उनके नितिन का मतलब नितिन गडकरी से था, लेकिन कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन बन जाते हैं। जवाब में यही कहा जाता है कि आपने नितिन को कहा था, मैंने नितिन को बना दिया। गलती आप की है, आप पूरा नाम बताते कि मुझे नितिन गडकरी को बनाना है। अब नितिन नवीन अध्यक्ष बन गए, आप भी स्वागत करिए।

भले ही जोक्स में ये बातें हो लेकिन संगठन की जड़ें इतनी गहरी रहीं कि अधिकतम निष्क्रियता आई विद्रोह नहीं। और समय के साथ जैसे समुद्र के ऊपर उड़ता पक्षी थककर फिर उसी जहाज पर लौट आता है, वैसे ही ये राजनीतिक यात्राएँ भी अंततः अपने मूल में लौट आईं। इसका कारण किसी व्यक्ति विशेष का करिश्मा नहीं, बल्कि वह अनुशासन है, जो संघ की शाखाओं में बचपन से संस्कार बनकर रच-बस जाता है। वहाँ पद कोई ढाल नहीं बनता और प्रसिद्धि कोई विशेषाधिकार नहीं देती। वहाँ यदि दस साल का कोई मुख्य शिक्षक खड़े होकर ‘संघ दक्ष’ बोल देता है, तो सामने खड़ा व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो, उसे भी खड़ा होकर सावधान की मुद्रा में आना ही होता है।

क्योंकि वहाँ व्यक्ति से ऊपर व्यवस्था होती है, और व्यवस्था से ऊपर केवल राष्ट्र अमित शाह, जेपी नड्डा जैसे कद्दावर नेताओं का नितिन नबीन के स्वागत में खड़ा होना, दरअसल उसी संस्कृति का प्रतिबिंब था। यह न तो औपचारिकता थी, न ही राजनीतिक मजबूरी। यह उस संगठनात्मक चेतना का स्वाभाविक विस्तार था, जहाँ पद मिलने पर सम्मान बढ़ता है, अहंकार नहीं। आज की राजनीति में, जहाँ कुर्सी मिलते ही लोग जमीन भूल जाते हैं, वहाँ ऐसे दृश्य चौंकाते हैं। यही कारण है कि यह घटना केवल एक फोटो या वीडियो तक सीमित नहीं रहती, यह एक विचार बन जाती है। एक उदाहरण बन जाती है। और शायद इसी वजह से भाजपा केवल चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं, बल्कि एक जीवंत संगठन बनी हुई है। यही परम्परा, यही अनुशासन और यही संस्कार ऐसे क्षणों को जन्म देते हैं, जो राजनीति में साधारण नहीं माने जाते और जो बिना शोर किए बहुत कुछ कह जाते हैं।

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