बहुजन मंच की पुरानी विरासत पर चंद्रशेखर की नई बुनियाद

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संजय सक्सेना

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर नई करवट लेती नजर आ रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी दो साल दूर हों, लेकिन सियासी सरगर्मियां अभी से तेज़ होती जा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी जहां अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, वहीं समाजवादी पार्टी सामाजिक समीकरणों के सहारे वापसी की राह तलाश रही है। कांग्रेस भी खोई हुई जमीन की तलाश में सक्रिय हो चुकी है। लेकिन इन तमाम प्रमुख दलों के बीच बहुजन राजनीति में हलचल तब तेज़ हो गई जब आज़ाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को सीधे चुनौती दे डाली।झांसी में हाल ही में आयोजित ‘प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन’ में चंद्रशेखर ने न सिर्फ बसपा की नीतियों को निशाने पर लिया, बल्कि मायावती के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर दिए। उनका साफ कहना था कि बहुजन समाज अब बदलाव चाहता है, और यह बदलाव नेतृत्व से शुरू होगा। चंद्रशेखर ने कहा कि मायावती बहुजन समाज का भरोसा खो चुकी हैं और अब समाज एक नई सोच, नया नेतृत्व और नई दिशा की तलाश में है।

यह पहला अवसर नहीं है जब चंद्रशेखर ने बसपा के खिलाफ मुखर रुख अपनाया हो, लेकिन इस बार उनका लहजा अधिक आक्रामक और स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि बसपा का लगातार कमजोर होना इस बात का प्रमाण है कि पार्टी अब जमीनी मुद्दों से कट चुकी है। “बहुजन समाज को नारे नहीं, भागीदारी चाहिए,” चंद्रशेखर ने यह कहकर अपने इरादे और दृष्टिकोण को स्पष्ट कर दिया।इस सम्मेलन में उमड़ी भीड़, खासकर युवा वर्ग की सक्रिय भागीदारी ने यह साफ कर दिया कि चंद्रशेखर की लोकप्रियता अब सोशल मीडिया से निकलकर गांव-कस्बों तक पहुंच रही है। मंच पर उनके साथ कई ऐसे चेहरे दिखे, जो कभी बसपा का हिस्सा रह चुके थे। ऐसे में राजनीतिक पंडित इस भीड़ को महज एक सभा की सफलता नहीं मानते, बल्कि इसे बहुजन राजनीति के भविष्य की आहट के तौर पर देख रहे हैं।

चंद्रशेखर ने अपने भाषण में भाजपा पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की नीतियां वंचितों के उत्थान के विरुद्ध रही हैं। “वे नहीं चाहते कि दलित, पिछड़ा और आदिवासी समाज मुख्यधारा में आए। बहुजन अगर संगठित हो गया तो सत्ता उनके हाथ से निकल जाएगी,” उन्होंने दो टूक कहा। उन्होंने बहुजन युवाओं से आवाहन किया कि वे खुद को किसी राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल न होने दें और अपने भविष्य की बागडोर खुद संभालें।बसपा की तरफ से चंद्रशेखर के इन बयानों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन हाल ही में मायावती ने एक बयान में चंद्रशेखर को “बरसाती मेंढक” बताते हुए कहा था कि ऐसे लोग समाज की एकता को तोड़ने का काम कर रहे हैं। मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ नेता विपक्षी पार्टियों के इशारे पर बहुजन आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश में लगे हैं।

इसे कहते हैं दबंगई: मामूली कहासुनी पर उठा ली बंदूक

इस आरोप का चंद्रशेखर ने भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वह किसी राजनीतिक दल के मोहरे नहीं हैं और ना ही किसी के इशारे पर राजनीति करते हैं। “हम बहुजन हित की राजनीति करते हैं, न कि किसी की कृपा पर खड़े रहते हैं,” उन्होंने स्पष्ट किया।चंद्रशेखर की यह सियासी सक्रियता ऐसे समय में तेज हुई है जब बहुजन समाज पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। 2012 में 80 सीटें जीतने वाली पार्टी 2022 में सिर्फ एक सीट पर सिमट गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। यही वजह है कि दलित समाज का एक बड़ा तबका नेतृत्व को लेकर असमंजस में है, और इसी शून्य को चंद्रशेखर भरने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि चंद्रशेखर के लिए राह आसान नहीं है। हाल ही में उन पर एक निजी विवाद भी सामने आया, जब स्विट्ज़रलैंड की शोधकर्ता डॉ. रोहिणी घावरी ने उन पर भावनात्मक धोखाधड़ी, मानसिक शोषण और धोखे से पैसे ऐंठने के आरोप लगाए। रोहिणी ने यह भी कहा कि वह पिछले कई वर्षों से चंद्रशेखर से जुड़ी थीं और उन्होंने शादी का वादा कर रखा था, लेकिन अंततः उन्होंने साथ छोड़ दिया।इस मामले में ASP ने सफाई देते हुए इसे राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया और कहा कि जैसे-जैसे चंद्रशेखर की लोकप्रियता बढ़ रही है, उन्हें बदनाम करने की साजिशें भी तेज हो रही हैं। खुद चंद्रशेखर ने भी कहा कि वह जांच के लिए तैयार हैं, लेकिन उनके सामाजिक आंदोलन को किसी विवाद के जरिए कमजोर नहीं किया जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर चंद्रशेखर इन विवादों से खुद को सफलतापूर्वक निकाल पाते हैं और जमीनी संगठन को मजबूत करते हुए दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग को साथ ला पाते हैं, तो वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।चंद्रशेखर ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि उनकी पार्टी 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी और किसी भी बड़े दल से गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंने कहा, “गठबंधन की राजनीति ने बहुजन समाज को ठगने का काम किया है। हम खुद अपनी ताकत पर चुनाव लड़ेंगे, पंचायत से लेकर विधानसभा तक।” उन्होंने आगे कहा कि उनका लक्ष्य सिर्फ सीटें जीतना नहीं, बल्कि बहुजन समाज को सत्ता में निर्णायक भागीदारी दिलाना है।

झांसी सम्मेलन के बाद जिस तरह ASP के झंडे गांवों-कस्बों में लहराते दिखने लगे हैं, उससे यह तो तय है कि चंद्रशेखर अब किसी प्रयोग के दौर में नहीं हैं, बल्कि एक रणनीतिक सियासी सफर की ओर बढ़ चले हैं। चाहे वह युवाओं के बीच अपनी बात रखने की शैली हो या दलित समाज के मुद्दों को उठाने का आक्रामक अंदाज, चंद्रशेखर एक नई पीढ़ी के बहुजन नेता के रूप में उभरते नजर आ रहे हैं। फिलहाल, उत्तर प्रदेश की सियासत में चंद्रशेखर आज़ाद एक ऐसा नाम बनकर उभरे हैं जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वह न केवल बहुजन राजनीति में एक वैकल्पिक नेतृत्व की संभावना पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह संकेत भी दे रहे हैं कि 2027 का चुनाव पुराने समीकरणों पर नहीं, बल्कि नई चेतना और संघर्ष की जमीन पर लड़ा जाएगा। अब देखना यह है कि यह उभार कितनी दूर तक जाता है सिर्फ नारे बनकर रह जाएगा या सत्ता के सिंहासन तक पहुंचेगा।

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