भीष्म द्वादशी आज है, जानिए पूजा मुहूर्त व पूजा विधि और कथा

अजमेर से राजेन्द्र गुप्ता

भीष्म द्वादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष को मनाई जाती है। इस दिन भीष्म पितामह की याद में व्रत रखा जाता है। इस दिन महाभारत के भीष्म पर्व अध्याय का पाठ किया जाता है। भगवान कृष्ण की भी पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भीष्म पितामह ने भीष्म अष्टमी के दिन ही अष्टमी तिथि को अपना शरीर त्यागा था, लेकिन उनके लिए सभी अनुष्ठान और धार्मिक क्रियाकलाप करने के लिए द्वादशी तिथि का चयन किया गया था। इसलिए उनका निर्वाण दिवस द्वादशी को मनाया जाता है।

भीष्म द्वादशी पूजा मुहूर्त

इस वर्ष भीष्म द्वादशी 09 फरवरी 2025 रविवार को मनाई जाएगी।
द्वादशी तिथि आरंभ- 08 फरवरी 2025, 20:15 से.
द्वादशी तिथि समाप्त – 09 फरवरी 2025, 07:25 तक.

भीष्म द्वादशी पूजा विधि

इस दिन सुबह जल्दी उठकर सभी काम निपटाकर स्नान करना चाहिए और फिर भगवान विष्णु और सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए।
भीष्म पितामह के लिए तिल, जल और कुशा से तर्पण करना चाहिए।
तर्पण का अनुष्ठान किसी योग्य ब्राह्मण द्वारा भी किया जा सकता है।
ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा देनी चाहिए।
परंपरागत रूप से इस दिन पूर्वजों की भी पूजा की जाती है।
इस दिन भीष्म कथा का श्रवण करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन पूजा-पाठ आदि करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं तथा पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
यह पूजा पितृ दोष से मुक्ति दिलाने में भी सहायक होती है।

भीष्म द्वादशी पर तिल का दान करें

भीष्म द्वादशी के दिन तिल दान का भी महत्व बताया गया है। इस दिन हवन किया जाता है और उसमें तिल का इस्तेमाल किया जाता है। तिल से भरे पानी से स्नान करना और तिल का दान करना दोनों ही बहुत शुभ माना जाता है। तिल का दान करने से जीवन में खुशियाँ आती हैं। सफलता के द्वार खुलते हैं। हिंदू धर्म में इस दिन को लेकर अलग-अलग मान्यताएँ हैं, लेकिन एक बात पक्की है कि इस दिन तिल का बहुत महत्व माना जाता है।
तिल से जुड़ी हर चीज, तिल के दान से लेकर भीष्म द्वादशी के दिन तिल के सेवन तक, शुभ मानी जाती है। हिंदू धर्म में तिल को पवित्र, नाशवान और पुण्यदायी माना जाता है। व्यक्ति को शुद्ध तिल एकत्रित करके अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों को दान करना चाहिए। तिल दान करने का फल अग्नि यज्ञ के समान होता है। तिल दान करने वाले को उसका उचित फल मिलता है।

भीष्म ने अष्टमी को त्यागे थे प्राण, लेकिन द्वादशी को हुई थी पूजा

भीष्म द्वादशी यानी माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का समय तर्पण और पूजा के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन स्नान करने से भी बहुत शुभ फल प्राप्त होते हैं। इस दिन को तिल द्वादशी भी कहा जाता है। इसलिए इस दिन तिल का दान और सेवन दोनों ही शुभ होते हैं। मान्यता है कि इसी दिन पांडवों ने पितामह भीष्म का अंतिम संस्कार किया था। इसलिए इस दिन पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को बहुत शांति मिलती है।

मान्यता है कि भीष्म द्वादशी के दिन व्रत रखने से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जीवन में सुख-समृद्धि आती है। द्वादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा भी की जाती है। व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए। इससे सुख में वृद्धि होती है। द्वादशी के दिन स्नान और दान करने से सुख, सौभाग्य और धन की प्राप्ति होती है। इस दिन गरीबों को भोजन भी कराया जाता है। इस व्रत से सभी पापों का नाश होता है। इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भीष्म द्वादशी का व्रत करने से संतोष की प्राप्ति होती है।

भीष्म द्वादशी कथा

महाभारत में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से युद्ध लड़ रहे थे। पांडवों के लिए भीष्म को हराना असंभव था। ऐसा इसलिए क्योंकि भीष्म को यह वरदान प्राप्त था कि वे तभी मरेंगे जब वे ऐसा करने का निर्णय लेंगे। युद्ध में भीष्म पितामह की कुशलता के कारण कौरव पराजित नहीं हो सकते थे। भीष्म को हराने के लिए एक योजना बनाई गई। इस योजना का केंद्र बिंदु शिखंडी था। पितामह ने प्रतिज्ञा की थी कि वे कभी किसी स्त्री के सामने हथियार नहीं उठाएंगे। इसलिए जब पांडवों को इस प्रतिज्ञा के बारे में पता चलता है तो वे भीष्म के साथ छल करते हैं। युद्ध के दौरान वे शिखंडी को भीष्म पितामह के ठीक सामने खड़ा कर देते हैं। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वे हथियार नहीं उठाते। इस अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन भीष्म पर बाणों की वर्षा करना शुरू कर देते हैं। अंत में पितामह गिर जाते हैं और बाणों की शय्या पर लेट जाते हैं। लेकिन उस समय सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागे नहीं थे। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपने शरीर का त्याग किया था। भीष्म पितामह ने अष्टमी तिथि को अपने प्राण त्यागे थे। हालांकि, उनकी पूजा के लिए माघ महीने की द्वादशी तिथि तय की गई थी। इसी वजह से माघ महीने की शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी कहा जाता है।

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