संतकबीरनगर लोकसभा: कबीर की कर्भभूमि पर 10 साल से भाजपा का कब्जा, इस बार काँटे की लड़ाई

  • स्थानीय मुद्दे से गायब ‘मिस्टर इंडिया’ को सजातीय पप्पू दे रहे हैं कड़ी टक्कर, किसी के सर सज सकता है ताज
  • रेल लाइन, बांसी-पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे फोरलेन से लेकर कई मुद्दों पर जनता प्रवीण निषाद से नाराज
  • मोदी के नाम पर बीजेपी को पड़े वोट, प्रवीण को कितना होगा फायदा, ठीक-ठाक अनुमान नहीं

लखनऊ से विजय पांडेय

कभी इस सरज़मीं को नेताओं की जन्मस्थली कहा जाता था। यहाँ से निकलकर नेता आसपास के ज़िलों पर क़ाबिज़ हो जाया करते थे। अब स्थितियाँ बदल चुकी हैं। बाहरी नेताओं ने संतकबीर नगर पर ऐसा क़ब्ज़ा जमाया कि यहाँ के लोग अब पिछलग्गू बनकर घूमने को मजबूर हैं। कभी हैसर विधायक रहे श्रीराम चौहान और लालमणि प्रसाद बस्ती से लोकसभा सांसद बने। स्थानीय शंखलाल माँझी अम्बेडकरनगर से विधानसभा, लोकसभा तक पहुँचे। यहाँ से निकलकर राघवराम मिश्र पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के क़रीबियों में शुमार रहे और MLC बने। लेकिन अब गोरखपुर के लोगों का संतकबीनगर पर क़ब्ज़ा है। यहाँ से गोरखपुरिया प्रवीण निषाद सांसद हैं तो भीष्मशंकर तिवारी उर्फ़ ‘कुशल’ भी यहाँ से दो बार लोकसभा तक की यात्रा कर चुके हैं। क़द्दावर नेता भालचंद्र के बाद यहाँ से स्थानीय नेताओं का बड़ा टोंटा है। ये कमी कब ख़त्म होगी, ये तो वक़्त बताएगा, लेकिन इस बार भीतरी-बाहरी की लड़ाई में निषाद पार्टी के प्रवीण को कड़े मुक़ाबले का सामना करना पड़ रहा है। इनके मूल वोटर निषाद इस बार छिटककर अपने दूसरे सजातीय और स्थानीय पप्पू निषाद को भरपूर समर्थन देते दिख रहे हैं। ख़ासकर मेंहदावल क्षेत्र में इन्हें अपनी बिरादरी का साथ नहीं मिला। ग़ौरतलब है कि कुछ दिनों पहले निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद की भगवान रूप में आरती हुई थी। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। लेकिन इस बार वही निषाद साथ छोड़कर दूर खड़े हो गए।

संत कबीर के नाम पर बने जिला और लोकसभा का चुनाव कभी कबीरपंथी नहीं रहा। जिस कबीर ने ताउम्र जात-पात, धर्म और मजहब का विरोध किया, उन्हीं के नाम पर बने लोकसभा क्षेत्र में जीत-हार का गुणा-भाग जाति को आधार बनाकर किया जाता है। संत कबीर की निर्वाण स्थली ‘मगहर’ इसी क्षेत्र में स्थित है। इसके साथ ही महादेव मंदिर, कांसे के बर्तन और बड़ी सी झील के लिए मशहूर बखिरा और तामेश्वरनाथ मंदिर यहां के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। कभी बुनकरों और जूट उद्योग के लिए प्रसिद्ध संतकबीरनगर की औद्योगिक स्थिति खस्ताहाल है। यहाँ का इंडस्ट्रियल एरिया आसपास के अमीरों के रहने की ‘पॉश’ जगह बन चुका है। वरिष्ठ पत्रकार जेपी ओझा कहते हैं कि एक बाहरी सांसद ने इंडस्ट्रियल एरिया पर ग्रहण लगाया। बाक़ी की रही-सही कसर नए बने ज़िले के दफ़्तरों ने पूरी कर दी। देखते-देखते इंडस्ट्रियल एरिया वीरान हो गया और रहने वाले लोग यहाँ पसर गए। अब यहाँ अच्छी-खासी कॉलोनी दिख रही है और औद्योगिक गतिविधियाँ तड़प-तड़पकर दम तोड़ रही हैं।

भाजपा ज्वाइन करने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ इस तरह दिखे थे संतकबीरनगर के सांसद इं. प्रवीण निषाद

बात संतकबीर नगर की राजनीति की करें तो यहां BJP लगातार दो बार से जीत दर्ज कर चुकी है। वर्तमान में इंजीनियर प्रवीण कुमार निषाद BJP के सांसद हैं। जिन्हें क्षेत्र के लोग मुक़द्दर का सिकंदर (सांसद) और मिस्टर इंडिया जैसे नामों से नवाज़ रहे हैं। ग़ौरतलब है कि संतकबीरनगर से जीतने के बाद इं. प्रवीण निषाद या तो दिल्ली रहे या फिर अपने गृह ज़िले गोरखपुर में दिखे। संतकबीरनगर लोकसभा इनके सिपहसालार लोग ‘खड़ाऊं’ रखकर पाँच साल तक चलाते रहे। कुछ खासमखास लोगों के वहाँ ही इनका आना-जाना हुआ, बाक़ी का काम इनके कारखासों ने अंजाम दिया। इससे पहले साल 2014 में शरद त्रिपाठी ने BJP के टिकट पर चुनाव जीता था। लेकिन जूता कांड के बाद वर्ष 2019 में BJP ने उनका टिकट काट कर प्रवीण निषाद को मैदान में उतार दिया था। तब प्रवीण निषाद ने जीत दर्ज की थी। ग़ौरतलब है कि इं. प्रवीण निषाद ने गोरखपुर उपचुनाव में सपा के साइकिल चुनाव निशान पर BJP के तगड़े उम्मीदवार और भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष उपेंद्र शुक्ला को हराया था।

टिकट निषाद का, निशान भाजपा का और ‘अध्यक्ष’ का बड़ा बेटा मैदान में…

साल 2019 में BJP ने सांसद शरद त्रिपाठी का टिकट काटकर प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा था। बताते चलें कि शरद कुमार त्रिपाठी BJP विधायक को ही जूता मारने के बाद चर्चा में थे। इससे उनकी छवि खराब हुई थी साथ ही BJP पर भी सवाल उठ रहे थे। इसके बाद BJP ने यह सीट सहयोगी दल (निषाद पार्टी) को सौंप दी। साल 2019 में जब निषाद पार्टी BJP के साथ आ गई तो BJP ने संजय निषाद के बेटे को अपने चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतारा। प्रवीण निषाद ने तब बसपा के भीष्म शंकर तिवारी उर्फ़ कुशल तिवारी को 35,749 वोटों से हराया था। BJP उम्मीदवार को 467,543 तो वहीं बसपा को 4,31,794 वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर रहे कांग्रेस पार्टी के भाल चन्द्र यादव थे, जिन्हें 1,28,506 वोट मिला था। इससे पहले वर्ष 2014 में यहां शरद त्रिपाठी ने करीब एक लाख वोट (97,978 ) से जीत दर्ज की थी। शरद त्रिपाठी को 3,48,892 जबकि बसपा के भीष्म शंकर (कुशल तिवारी) को 2,50,914 वोट मिले थे।

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संतकबीर नगर का राजनीतिक इतिहास

यह जिला बस्ती से अलग होकर सितंबर 1997 में अस्तित्व में आया। तब बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी और मायावती सूबे की वजीर-ए-आला थीं। क्योंकि यह महान संत कबीर दास की गतिविधियों का क्षेत्र था इसीलिए इसका नाम ‘संत कबीर नगर’ रखा गया गया। साल 2008 में हुए परिसीमन के बाद खलीलाबाद लोकसभा सीट का नाम बदलकर संतकबीरनगर कर दिया गया। इसके पहले यह बस्ती और गोरखपुर लोकसभा का हिस्सा हुआ करता था। साल 2009 में हुए पहले चुनाव में यहां बसपा के भीष्म शंकर तिवारी ने जीत दर्ज की थी। तब भीष्म शंकर तिवारी ने समाजवादी पार्टी के तात्कालीन उम्मीदवार भाल चन्द्र यादव को 35,749 वोटों से हराया था। जिले की कुल आबादी में से 95.14 प्रतिशत ग्रामीण आबादी है, जबकि 4.86 फीसदी हिस्सा शहरी आबादी का है। यह प्रदेश के उन 34 जिलों में शुमार है, जिसे बैकवर्ड रीजन ग्रांट फंड प्रोग्राम (BRGFP) के तहत अनुदान दिया जाता है।

संतकबीरनगर लोकसभा का क्षेत्र तीन जिलों में समाहित है। इस लोकसभा के अंतर्गत पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें खलीलाबाद, मेंहदावल, धनघटा, खजनी और आलापुर शामिल हैं। इसमें से खजनी सीट गोरखपुर जिले में तथा आलापुर सीट अम्बेडकरनगर जिले का हिस्सा है। इन पांचों सीटों पर फिलहाल BJP का ही परचम लहरा रहा है, जो कि BJP के लिए प्लस पॉइंट साबित हो सकता है। संतकबीरनगर में दलित और मुस्लिम वोटर्स काफी महत्वपूर्ण फैक्टर हैं। यहां दलित आबादी 23 फीसदी, जबकि मुस्लिम आबादी 24 फीसदी है। इसके अलावा सवर्ण वोटर्स भी बड़ी तादाद में हैं, जिनमें राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार आबादी भी डिसाइडिग फैक्टर साबित होती है।

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क्या है यहाँ की राजनीतिक गणित

साल 2014 की मोदी लहर में यहां से दिग्गज नेता रमापति राम त्रिपाठी के बेटे शरद त्रिपाठी BJP के टिकट पर चुनाव जीते थे। वर्ष 2019 में प्रवीण निषाद ने जीत दर्ज की। प्रवीण के यहां आने के बाद केवट-मल्लाह यानी निषाद जाति का वोट BJP के खाते में आया, इसके बाद भी सपा-बसपा गठबंधन ने अच्छी फाइट दी थी। बताते चलें कि इस लोकसभा क्षेत्र में करीब साढ़े 19 लाख वोटर हैं। इसमें दलित करीब साढ़े चार लाख, ब्राह्मण तीन लाख, क्षत्रिय एक लाख, भूमिहार 50 हजार, कुर्मी वोटर करीब एक लाख हैं। यहां यादव वोटर भी एक लाख से ज्यादा हैं, जबकि मुस्लिम वोटर करीब छह लाख हैं।

एक नजर पिछले चुनावों पर डालें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर शरद त्रिपाठी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने बीएसपी के प्रत्याशी भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी को करीब 98 हजार वोटों के अंतर से मात दी। शरद त्रिपाठी को जहां 3 लाख 48 हजार 892 वोट हासिल हुए, तो वहीं कुशल तिवारी को 2 लाख 50 हजार 914 वोट मिले। तीसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के भालचंद्र यादव रहे, जिन्हें 2 लाख 40 हजार 169 वोट मिले। बात वोट शेयरिग की करें तो 2014 के चुनाव में BJP को 34.49%, बीएसपी को 24.8%, कांग्रेस को 2.18% और समाजवादी पार्टी को 23.74% वोट मिला। वहीं 2009 में BJP को 22.67%, बीएसपी को 26.35%, कांग्रेस को 4.23% और समाजवादी पार्टी को 21.36% वोट मिले थे। साल 2014 के चुनाव में जहां कुल मतदाताओं में से 53.15 प्रतिशत ने वोट दिया तो वहीं 2009 में 47.29 प्रतिशत वोटर्स ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। साल 2024 के रण में इस बार 52.63 फ़ीसदी लोगों ने वोट किया है।

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BJP ने मौजूदा सासंद पर जताया भरोसा

यूपी की राजनीति को जानने वालों का कहना है कि अगर यहां कांग्रेस बसपा और सपा एक साथ मिलकर चुनाव लड़ती तो BJP को वो लोग हरा ले जाते। लेकिन BSP ने अपना उम्मीदवार देकर प्रवीण की अड़चनों को कम किया है। BJP की पहली सूची में संत कबीर नगर से पार्टी ने मौजूदा सांसद प्रवीण निषाद पर ही भरोसा जताया। वहीं सपा ने मेंहदावल के पूर्व विधायक लक्ष्मीकांत निषाद उर्फ़ पप्पू निषाद तो बसपा ने मोहम्मद आलम पर दांव लगाया है।

BJP के गले की फांस बने ‘जूताकांड’ से विपक्ष को मिलेगी संजीवनी?

‘बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोई।
जो घर देखा आपना मुझसे बुरा ना कोय?’
गोरखपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर लखनऊ हाइवे के ठीक किनारे मगहर नामक स्थान पर इस दोहे के रचयिता कबीरदास ने अंतिम सांसें ली थीं। आमी नदी के किनारे ही कबीरदास ने दम तोड़ा था, जहां उनकी समाधि और मजार दोनों बने हुए हैं। इस जगह को विश्व के नक्शे में भले ही कबीर ने पहचान दिलाई हो, लेकिन फिलहाल सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद और विधायक के बीच हुई ‘जूत्तमपैजार’ की घटना की वजह से ही कबीर के नाम पर बसे जिले की देश-दुनिया में चर्चा है। यह जिला है संतकबीरनगर और किस्सा है BJP सांसद शरद त्रिपाठी और विधायक राकेश सिह बघेल के बीच हुए ‘जूताकांड’ का। तारीख़ थी 6 मार्च, 2019 की। संतकबीरनगर में जिला कार्य योजना समिति की बैठक चल रही थी। कलेक्ट्रेट में चल रही इस बैठक में प्रदेश कैबिनेट मंत्री आशुतोष टंडन भी मौजूद थे। उसी दौरान एक सड़क निर्माण के शिलापट्ट में सांसद का नाम नहीं होने की बात पर सांसद शरद त्रिपाठी और मेंहदावल के विधायक राकेश सिह बघेल में कहासुनी शुरू हो गई। कहासुनी में विधायक ने सांसद को मारने का इशारा किया। ये देखकर सांसद ने अपना आपा खो दिया और जूता निकालकर सरेआम विधायक की पिटाई कर दी। इस पूरी घटना का विडियो देखते ही देखते वायरल हो गया और BJP को इस वजह से काफी किरकिरी का सामना करना पड़ा। इस एक घटना ने प्रदेश के पिछड़े जिलों में शुमार संतकबीरनगर को देश-दुनिया में सुर्खियों में ला दिया।

संतकबीरनगर की इसी घटना ने पूरे जिले को किया था राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम। चित्र में मेंहदावल विधायक को जूते से मारते तत्कालीन सांसद शरद त्रिपाठी

संसद में संतकबीरनगर का प्रतिनिधित्व शरद त्रिपाठी कर रहे थे, जिन्हें प्रादेशिक तथा केंद्रीय नेतृत्व का करीबी माना जाता था। बड़े राजनीतिक परिवार से संबंध रखने वाले शरद त्रिपाठी के पिता रमापति राम त्रिपाठी की गिनती BJP के बड़े नेताओं में होती है। वह यूपी BJP के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं, लेकिन ‘जूता कांड’ के बाद BJP ने उनके बेटे का टिकट काट दिया और उन्हें देवरिया से लोकसभा का सिम्बल ले दिया। ग़ौरतलब है कि बतौर सांसद शरद त्रिपाठी का रिकॉर्ड काफी बेहतर था। लोकसभा में उनकी उपस्थिति 98 प्रतिशत थी। साथ ही वह विदेशी मामलों के लिए गठित कमिटी के सदस्य भी थे। आख़िरकार टिकट न मिलने से आहत शरद की लिवर की बीमारी के चलते 30 जून 2021 को निधन हो गया। वहीं तत्कालीन मेंहदावल विधायक राकेश बघेल का भी टिकट कट गया। उनकी सीट पर निषाद पार्टी के ही अनिल त्रिपाठी विधायक हैं। लेकिन आज भी विपक्षी इस मुद्दे को तूल देते रहते हैं, जिससे ब्राह्मण-ठाकुर बिरादरी की टशन बार-बार सतह पर आ जाती है और विपक्षियों को इसका लाभ मिलता रहता है। इस बार भी विपक्षियों ने यह दांव क़रीने से खेला है और निषाद पार्टी को तगड़ा झटका दिया है।

कभी पूरे संतकबीर नगर में हुआ करता था भालचंद्र यादव का दबदबा

स्थानीय मुद्दे

ग्रामीण आबादी अधिक होने की वजह से यहां की प्रमुख समस्याएं खेती-किसानी को प्रोत्साहन नहीं मिल पाना है। इसके अलावा रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, उद्योग धंधे भी मुख्य मुद्दे हैं। खलीलाबाद में हाथ से कपड़ा बनाने का भी उद्योग है और छोटे व्यापारी भी हैं, जो जीएसटी से खासे प्रभावित हुए हैं। सत्तारूढ़ दल को इससे भी दो-चार होना पड़ेगा। इन सबके अलावा सुर्खियों में रही रेल लाइन परियोजना पर इं. प्रवीण निषाद ने कोई ध्यान नहीं दिया और सिद्धार्थनगर के बांसी से चलकर पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे को जोड़ने वाला इकलौता मार्ग भी टू-लेन से फ़ोर लेन नहीं बन पाया। नाथनगर निवासी विजय कुमार शुक्ल कहते हैं कि यदि स्थानीय सांसद ध्यान देते तो पक्का यह सड़क फ़ोर-लेन बन जाता। उन्होंने ध्यान नहीं दिया, उम्मीद है इस बार वो ये गलती नहीं दोहराएँगे और ज़िले के विकास की ओर ध्यान देंगे। वहीं रामसूरत आज़ाद कहते हैं कि अगर सांसद एक्टिव होते तो संतकबीर नगर जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिल जाता, लेकिन उनकी नीरसता ने ज़िले को विकास से मरहूम कर दिया।

बखिरा निवासी मोहन गुप्त कहते हैं कि मैं मध्यप्रदेश के मांडूप गया। उत्तराखंड के टेहरी डैम पर गया। वहाँ जेटस्की, पैराशूट ग्लाइडिंग जैसे क्रियाकलाप छोटे से वाटर बॉडी पर हो रही है, हमारे शहर के पास पड़ी इतनी बड़ी वॉटर बॉडी पर किसी प्रतिनिधि ने ध्यान नहीं दिया। ये ज़िले का एक बड़ा पर्यटन स्थल बन सकता है, लेकिन अच्छे नेता न चुनने की गलती का ख़ामियाज़ा सभी भुगत रहे हैं। सांथा के रामसजीवन कहते हैं कि मोदी सरकार के होने के बावजूद प्रवीण निषाद जिले में कोई बड़ी योजना, कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज कुछ नहीं ला पाए। कोई और होता तो जिले को चमका देता, मुझे तो लगता है स्थानीय सांसद का होना निहायत जरूरी होता है।

मिस्टर इंडिया बने इं. प्रवीण निषाद

साल 2019 की मोदी लहर में संतकबीर नगर से लोकसभा पहुँचे प्रवीण निषाद को स्थानीय लोगों ने शायद ही किसी कार्यक्रम में देखा हो। इसी बहस के चलते निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से कार्यकर्ताओं की हाथापाई भी कुछ दिनों पहले हुई थी। सूत्रों का कहना है कि सांसद निधि से लेकर सभी निर्णय पार्टी के अध्यक्ष और पिता संजय निषाद ही करते हैं, इसलिए प्रवीण क्षेत्र में कुछ न कर पाने के कारण नहीं आते। वरिष्ठ पत्रकार जेपी ओझा कहते हैं कि संतकबीनगर की जनता अपनी समस्या लेकर गोरखपुर नहीं जा सकती। यहाँ उनके सिपहसालार सुनते नहीं है, इसलिए वाक़ई में जनता में आक्रोश है। लड़ाई यहाँ काँटे की है। दो निषाद आपस में गुत्थमगुत्था है, इस विकट लड़ाई में जीत किसी की भी हो सकती है। पिछली बार की तरह पक्की मोहर नहीं लग सकती।

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