राज्यसभा में सपा के दो पत्ते खुले, तीसरी सीट ने बढ़ाई बेचैनी

Lucknow
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

Lucknow: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई बार बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसके पास कितने विधायक हैं, बल्कि यह होता है कि उन विधायकों के बीच आखिरी समय तक कौन अपनी रणनीति कितनी मजबूती से निभा पाता है। राज्यसभा की 10 सीटों के चुनाव ने एक बार फिर यही सवाल सामने खड़ा कर दिया है। समाजवादी पार्टी ने 30 सितंबर को रामगोपाल यादव के साथ धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले में नया कोण जोड़ दिया है। नथवानी का नाम इसलिए चर्चा में है क्योंकि उनकी पहचान पारंपरिक समाजवादी राजनीति से नहीं, बल्कि उद्योग और खेल प्रशासन से जुड़ी रही है।

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रामगोपाल यादव

अब चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, अतिरिक्त वोटों की तलाश और राजनीतिक संदेश का भी बन गया है। सबसे पहले गणित समझना जरूरी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 397 है। राज्यसभा की एक सीट के लिए प्रथम वरीयता के 37 वोट चाहिए। सपा के 101 विधायक हैं और कांग्रेस के दो विधायकों को जोड़ने पर संख्या 103 हो जाती है। दो उम्मीदवारों के लिए 74 वोट चाहिए। यानी सपा-कांग्रेस के पास 29 वोट अतिरिक्त बचते हैं। लेकिन तीसरे उम्मीदवार की जीत के लिए 37 वोट चाहिए होंगे। मतलब साफ है तीसरी सीट के लिए कम से कम आठ और वोट जुटाने होंगे। यही आठ वोट इस पूरे चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण संख्या बन चुके हैं।

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दूसरी तरफ भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के पास 289 विधायकों का संख्या बल बताया गया है। इस आधार पर सात सीटें सुरक्षित करने के बाद भी उसके पास अतिरिक्त वोटों का बड़ा आधार बचता है। इसलिए मौजूदा गणित में आठ सीटें भाजपा के लिए और दो सीटें सपा के लिए मजबूत स्थिति में दिखाई देती हैं। दसवीं सीट तभी संघर्ष का मैदान बनती है जब कोई पक्ष अपने तय हिस्से से आगे जाने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने की कोशिश करे। यही वजह है कि अब हर विधायक की राजनीतिक स्थिति और हर सहयोगी दल का रुख चर्चा का विषय बन गया है।

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धनराज परिमल नथवानी

सपा ने नथवानी को मैदान में उतारकर इसी गणित के बीच अपना संदेश दिया है। धनराज परिमल नथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े रहे हैं और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके पिता परिमल नथवानी भी रिलायंस से जुड़े रहे हैं और झारखंड से राज्यसभा सदस्य हैं। धनराज नथवानी की सार्वजनिक पहचान कॉरपोरेट क्षेत्र, क्रिकेट और अन्य सार्वजनिक गतिविधियों से बनी है। इसलिए उनका उत्तर प्रदेश से सपा उम्मीदवार बनना सामान्य राजनीतिक टिकट वितरण से अलग जरूर दिखाई देता है। लेकिन इसके पीछे पार्टी की अंतिम रणनीति क्या है, इसका आकलन केवल उनकी पेशेवर पृष्ठभूमि के आधार पर करना जल्दबाजी होगा।

यहां सपा के पुराने फैसलों को भी याद करना जरूरी है। पार्टी ने पहले भी उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सीटों पर ऐसे लोगों को भेजा है जिनकी पहचान राज्य की जमीनी राजनीति से अलग रही। जया बच्चन इसका प्रमुख उदाहरण हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़े किरणमय नंदा और मध्य प्रदेश के विदिशा से जुड़े मुन्नवर सलीम भी सपा के जरिए उत्तर प्रदेश से राज्यसभा पहुंचे। इसलिए नथवानी का चयन पार्टी के इतिहास में पूरी तरह नया प्रयोग नहीं कहा जा सकता। नया जरूर यह है कि इस बार कॉरपोरेट और खेल प्रशासन की पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को चुनावी मैदान में उतारने का फैसला ऐसे समय हुआ है, जब 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन तैयार हो रही है।यहीं से PDA की राजनीति का सवाल भी उठता है।

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सपा ने पिछले वर्षों में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को अपनी राजनीतिक रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया है। ऐसे में नथवानी की उम्मीदवारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि पार्टी अपने सामाजिक समीकरण के साथ कॉरपोरेट पृष्ठभूमि के इस चेहरे को किस तरह जोड़ती है। लेकिन राज्यसभा की राजनीति केवल जातीय प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं होती। उम्मीदवार का संसदीय उपयोग, सार्वजनिक संपर्क, पेशेवर अनुभव और राजनीतिक पहुंच भी दलों के फैसलों में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए इस चयन का अंतिम राजनीतिक अर्थ पार्टी के अगले कदमों से ही स्पष्ट होगा।

अब असली कहानी तीसरे उम्मीदवार की है। सपा ने तीसरे नाम को लेकर अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन पार्टी के भीतर इसे लेकर चर्चा लगातार चल रही है। पिछले दिनों दलित चेहरे को तीसरे उम्मीदवार के रूप में उतारने की संभावनाओं की खबरें सामने आई थीं। यदि ऐसा होता है तो सपा एक साथ संख्या और सामाजिक संदेश, दोनों को साधने की कोशिश करेगी। लेकिन 29 अतिरिक्त वोटों से 37 तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। आठ वोटों की कमी छोटी दिखाई देती है, पर राज्यसभा चुनाव में यही अंतर निर्णायक हो सकता है।भाजपा के लिए भी चुनौती अलग नहीं है। यदि आठवीं सीट के बाद अतिरिक्त मुकाबला बनता है तो उसे भी अपने अतिरिक्त वोटों को एकजुट रखना होगा। छोटे सहयोगी दलों और गठबंधन से बाहर के विधायकों की भूमिका बढ़ेगी। ऐसे चुनावों में क्रॉस वोटिंग की चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन चर्चा और वास्तविक मतदान के बीच बड़ा अंतर होता है।

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2024 के राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ने दिखाया था कि अतिरिक्त सीट के लिए संख्या बल से अधिक महत्वपूर्ण अंतिम समय का प्रबंधन हो सकता है। इस बार भी किसी संभावित क्रॉस वोटिंग को पहले से तय मान लेना राजनीतिक गणित को अटकल में बदल देगा इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक महत्व यही है कि यह 2027 से पहले दोनों प्रमुख खेमों के संगठनात्मक प्रबंधन की परीक्षा बन गया है। राज्यसभा का परिणाम विधानसभा चुनाव का भविष्य तय नहीं करेगा, लेकिन यह जरूर दिखाएगा कि कौन अपने विधायकों और सहयोगियों को कितनी मजबूती से साथ रख पाता है।

रामगोपाल यादव सपा की स्थापित संसदीय राजनीति का चेहरा हैं और धनराज नथवानी एक बिल्कुल अलग पेशेवर दुनिया से आते हैं। इन दोनों नामों का साथ आना अपने आप में सपा की रणनीति में विविधता दिखाता है। अब तीसरा नाम इस तस्वीर को और स्पष्ट करेगा। छह अक्टूबर को नामांकन की अंतिम तारीख है और 16 अक्टूबर को मतदान। तब 103 बनाम 37 का कागजी गणित वास्तविक मतपत्र पर उतरेगा। फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों की लड़ाई में असली कहानी सीटों की संख्या से ज्यादा उन अतिरिक्त वोटों की है, जिनके लिए दोनों खेमे अंतिम दिन तक राजनीतिक गणित साधेंगे।

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