
संजय सक्सेना
Akash Anand: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों बहुजन समाज पार्टी (BSP) के भीतर मचे घमासान से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर पार्टी का परंपरागत दलित वोट बैंक अब किस दिशा में जाएगा। मायावती ने तीन सितंबर 2026 को अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और अपने उत्तराधिकारी के पद से हटाया था, और महज एक हफ्ते बाद 10 सितंबर को उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी पूरी तरह मुक्त कर दिया।
आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ ने भी इसी दौरान सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी, जिससे BSP के भीतर पारिवारिक विवाद खुलकर सामने आ गया। हाल ही में लखनऊ में मीडिया से बातचीत में मायावती ने अपनी सेहत को लेकर उड़ी अफवाहों और आकाश आनंद के एक फोन कॉल का जिक्र करते हुए कड़ी नाराजगी भी जताई। इस पूरे प्रकरण ने 2027 के UP विधानसभा चुनाव से ठीक पहले BSP की संगठनात्मक स्थिति को कमजोर कर दिया है, और यही कमजोरी अब दूसरे दलों के लिए मौका बन गई है।
मायावती के फैसले के फौरन बाद नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने आकाश आनंद के लिए अपनी पार्टी का दरवाजा खोल दिया। चंद्रशेखर ने आकाश को छोटा भाई बताते हुए कहा कि दोनों मिलकर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के मिशन को आगे बढ़ा सकते हैं।
अब मुरादाबाद पहुंचे केंद्रीय राज्यमंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के प्रमुख रामदास आठवले ने भी यही कोशिश दोहराई है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से UP में BSP से अपना हक वापस लेने का आह्वान किया और याद दिलाया कि सत्तर के दशक में जो चुनाव चिह्न RPI के पास था, वही अब BSP इस्तेमाल कर रही है।
आठवले ने साफ कहा कि अगर आकाश आनंद बाबा साहेब के मिशन को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें RPI से जुड़ना चाहिए, इससे UP में संगठन मजबूत होगा। इससे पहले समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी एक पत्रकार के सवाल पर कह चुके हैं कि अगर कोई पत्रकार आकाश आनंद को उनके पास लेकर आए तो वे उन्हें SP में शामिल कर लेंगे। इन तीनों दलों की दिलचस्पी में एक साझा गणित छिपा है।
आकाश आनंद भले ही संगठनात्मक तौर पर अभी अनुभवहीन माने जाते रहे हों, लेकिन BSP के युवा और शहरी दलित समर्थकों में, खासकर सोशल मीडिया पर, उनकी पकड़ काफी मजबूत रही है। मायावती लंबे समय से खुद को बाबा साहेब के मिशन और कांशीराम की विरासत का इकलौता वाहक बताती रही हैं, और आकाश को उन्होंने ही इस विरासत का अगला चेहरा बनाकर पेश किया था।
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ऐसे में अगर आकाश किसी और दल से जुड़ते हैं तो वे उस दल को BSP की वैचारिक विरासत और उसके जनाधार, दोनों से जोड़ने वाली एक कड़ी बन सकते हैं। यही वजह है कि चंद्रशेखर आजाद और रामदास आठवले जैसे नेता, जो खुद अंबेडकरवादी राजनीति की जमीन पर खड़े हैं, आकाश को अपने पाले में लाकर BSP के कमजोर पड़ते जनाधार का सीधा फायदा उठाना चाहते हैं।BSP का दलित वोट बैंक, खासकर जाटव समुदाय के बीच, उत्तर प्रदेश की सियासत में दशकों से एक निर्णायक ताकत रहा है।
यह वोट बैंक भले ही पिछले कुछ चुनावों में सिकुड़ता दिखा हो, फिर भी यह इतना बड़ा जरूर है कि जिस भी गठबंधन या दल के साथ यह जुड़ जाए, चुनावी नतीजों की दिशा बदल सकता है। मौजूदा उथल-पुथल के बीच कांग्रेस ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है और आरोप लगाया है कि मायावती खुद अपनी पार्टी को कमजोर करने पर तुली हैं, जबकि SP प्रवक्ताओं की ओर से भी BSP पर परोक्ष रूप से BJP की नीतियों का साथ देने के आरोप लगाए गए हैं।
यानी विपक्षी खेमे के लगभग सभी बड़े दल इस मौके को BSP के परंपरागत मतदाताओं में सेंध लगाने के अवसर के तौर पर देख रहे हैं। दरअसल हर दल की रणनीति अलग है। चंद्रशेखर आजाद खुद दलित राजनीति की जमीन पर खड़े हैं और सीधे तौर पर BSP के वोट बैंक के प्रतिद्वंद्वी दावेदार हैं, इसलिए उनके लिए आकाश आनंद जैसा चेहरा मिलना वैचारिक तालमेल के साथ-साथ संगठनात्मक विस्तार का भी मौका है।
रामदास आठवले और RPI के लिए यह मौका उत्तर प्रदेश में लगभग खत्म हो चुकी अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से खड़ा करने का है, भले ही RPI फिलहाल NDA का हिस्सा है। वहीं SP और कांग्रेस के लिए यह मौका अपने मौजूदा सामाजिक समीकरण, यानी पिछड़ा-मुस्लिम या सामान्य-दलित गठजोड़ में दलित वोटों की और ज्यादा हिस्सेदारी जोड़ने का है।
दलितों के सामने कौन सा विकल्प, यह अभी तय नहीं
यह कहना जल्दबाजी होगी कि अगर BSP कमजोर होती है तो उसका दलित वोट बैंक स्वाभाविक रूप से किसी एक दल की तरफ खिसक जाएगा। राजनीतिक विश्लेषक इसे अलग-अलग नजरिए से देखते हैं। एक तबके का मानना है कि कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक न्याय और आरक्षण जैसे मुद्दों पर मुखर रुख और राहुल गांधी की सक्रियता के चलते दलित मतदाताओं को लुभाने की गुंजाइश है, लेकिन राज्य में संगठन की कमजोरी उसकी सबसे बड़ी बाधा है।
दूसरी तरफ SP के पास UP में पहले से मजबूत जमीनी ढांचा और पिछड़ा-मुस्लिम आधार मौजूद है, जिसमें दलित वोटों को जोड़ने से एक बड़ा सामाजिक गठजोड़ बन सकता है, हालांकि गैर-जाटव दलितों में SP को लेकर कुछ हिचक भी देखी जाती रही है। BJP की रणनीति अलग रही है; उसने पिछले कुछ चुनाव चक्रों में गैर-जाटव दलित उपजातियों में सेंध लगाकर और सरकारी योजनाओं के जरिए एक हिस्सा अपने पक्ष में किया है, लेकिन जाटव मतदाताओं में उसकी पैठ अब भी सीमित मानी जाती है।
कुल मिलाकर BSP का जनाधार बिखरा तो जरूर रहा है, पर यह एकतरफा किसी एक दल की झोली में जाने के बजाय कई दलों में बंटने की संभावना ज्यादा है। यही अनिश्चितता है जिसके चलते चंद्रशेखर आजाद से लेकर रामदास आठवले और अखिलेश यादव तक, हर कोई आकाश आनंद जैसे प्रतीकात्मक चेहरे को अपने साथ जोड़कर इस बिखरते जनाधार पर सबसे पहला दावा ठोकना चाहता है। 2027 के विधानसभा चुनाव तक यह तय होगा कि बाबा साहेब के नाम पर बंटी यह राजनीतिक लड़ाई आखिरकार किस दल को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाती है।
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One thought on “BSP में उथल-पुथल, आकाश आनंद और दलित वोटरों पर सबकी नजर”
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