आकाश से ईशान तक: मायावती के भरोसे की नई परीक्षा

Mayawati's successor

प्रणय विक्रम सिंह

राजनीति में विरासत सौंपना आसान है, विरासत संभालने वाला खोजना कठिन

Mayawati’s successor: बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती शायद इन दिनों इसी कठिन सवाल से गुजर रही हैं। जिस आकाश आनंद को कभी उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत का संभावित वाहक माना, उन्हें अवसर दिया, जिम्मेदारियां दीं और नाराजगी के बाद भी बार-बार भरोसा लौटाया, वही भरोसा बार-बार परीक्षा में पड़ा। बसपा पाताल की ओर थी, मायावती ने उसे ‘आकाश’ सौंप दिया। मगर ‘आकाश’ उम्मीदों की ऊंचाई नहीं छू सका। भरोसा मिला, दरका, फिर जुड़ा और आखिर फिर टूट गया। अब मायावती की उम्मीदों का सूरज ‘ईशान’ से उगता दिखाई दे रहा है।

ईशान आनंद को करीब 15 राज्यों के संगठन की जिम्मेदारी मिली है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि ईशान को कितना बड़ा दायित्व मिला। असली सवाल यह है कि आकाश में मायावती जिस राजनीतिक परिपक्वता की तलाश करती रहीं, क्या उसकी नई उम्मीद अब ईशान हैं? कहानी दिलचस्प है क्योंकि बसपा में इस समय केवल चेहरे नहीं बदल रहे, भरोसे का पता भी बदलता दिखाई दे रहा है। दिसंबर 2023 में आकाश आनंद को मायावती ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। युवा चेहरा था। परिवार की विरासत थी। पार्टी का मंच था और मायावती का भरोसा सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी। लेकिन राजनीति में ऊंचाई केवल नाम से नहीं मिलती।

उसके बाद आकाश की राजनीति लगातार उतार-चढ़ाव से गुजरी। जिम्मेदारी मिली, गई, फिर मिली। पार्टी से बाहर हुए, लौटे और अब एक बार फिर बाहर हैं। आकाश की राजनीति ऊपर कम उठी, ऊपर-नीचे अधिक होती रही। लेकिन इस पूरी कहानी में एक पक्ष ऐसा है, जिसे केवल चुनावी आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता।

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वह है बसपा का मतदाता

कांशीराम ने बसपा को केवल एक राजनीतिक दल के रूप में खड़ा नहीं किया था। वह एक मूवमेंट था। समाज के उस बड़े हिस्से के लिए राजनीतिक आवाज बनने का मूवमेंट, जिसे लंबे समय तक लगता रहा कि सत्ता के गलियारों में उसकी संख्या तो गिनी जाती है, आवाज नहीं। मायावती का सत्ता के शिखर तक पहुंचना इसलिए उनके समर्थकों के लिए केवल एक नेता का मुख्यमंत्री बनना नहीं था। वह हाशिये से सत्ता के केंद्र तक पहुंचने का अहसास था। इसीलिए बसपा का लगातार कमजोर होना केवल पार्टी मुख्यालय की चिंता नहीं है। उसके पुराने दलित मतदाता के भीतर इसकी एक अलग पीड़ा है। जिस आंदोलन में उसने अपना स्वाभिमान देखा, जिस हाथी की चाल में अपनी राजनीतिक ताकत महसूस की, आज उसी को लगातार सिकुड़ते देखना उसके लिए महज चुनावी हार नहीं है।

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पार्टी हारती है तो सीटें जाती हैं। मूवमेंट कमजोर होता है तो उम्मीदें टूटती हैं। यही बसपा के वर्तमान संकट की सबसे गहरी परत है। कभी उत्तर प्रदेश की सत्ता बसपा के इर्द-गिर्द घूमती थी। 2007 में उसने अपने बूते पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 2022 में पार्टी एक विधान सभा सीट पर सिमट गई और 2024 के लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुला। जिस ‘हाथी’ की चाल कभी सत्ता का रास्ता तय करती थी, आज उसी के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती है। इसीलिए मायावती को केवल उत्तराधिकारी नहीं चाहिए। उन्हें ‘उत्तर’ भी चाहिए और ‘अधिकारी’ भी।

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ऐसा चेहरा जो विरासत संभाले भी और उस कार्यकर्ता तथा मतदाता के भीतर बुझती उम्मीद को फिर जगा भी सके, जिसने बसपा को पार्टी से पहले आंदोलन माना था। यहीं ईशान आनंद की परीक्षा शुरू होती है। उन्हें करीब 15 राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। इसे पद से अधिक परीक्षा की तरह पढ़ना चाहिए। शायद आकाश के अनुभव के बाद मायावती ने क्रम बदल दिया है। आकाश को पहले विरासत का संकेत मिला, परीक्षा बाद में हुई। ईशान को पहले परीक्षा मिली है, विरासत का निर्णय शायद बाद में होगा।

ईशान के सामने केवल संगठन खड़ा करने की चुनौती नहीं है। उन्हें उस पुराने दलित मतदाताओं से भी संवाद करना होगा, जिसकी बसपा से शिकायत हो सकती है, लेकिन जिसकी स्मृतियों में कांशीराम और मायावती के दौर की राजनीतिक चेतना अभी बाकी है। उस मतदाता को नया नेता नहीं, अपनी पुरानी उम्मीद का नया कारण चाहिए। यही ईशान की सबसे कठिन कसौटी होगी। परिवार उन्हें परिचय दे सकता है। मायावती पद दे सकती हैं। बसपा मंच दे सकती है। लेकिन राजनीतिक कद उधार नहीं मिलता। उसे जमीन पर अर्जित करना पड़ता है। आकाश की कहानी ईशान के सामने उदाहरण भी है और चेतावनी भी। आकाश को मायावती का भरोसा कई बार मिला। लेकिन राजनीति में भरोसा मिलना जितना महत्वपूर्ण है, भरोसेमंद बने रहना उससे कहीं अधिक कठिन। ईशान को यही कठिन काम करना है। बल्कि उसी भी आगे कार्यकर्ता और मतदाता का भरोसा।

बसपा पाताल की ओर थी तो मायावती ने ‘आकाश’ की ओर देखा। ‘आकाश’ उम्मीदों की ऊंचाई नहीं छू पाया। अब नजर ‘ईशान’ पर है। लेकिन ईशान की परीक्षा केवल मायावती की उम्मीदों पर खरा उतरने की नहीं होगी। उनके सामने उस आंदोलन की बुझती लौ भी है, जिसने कभी लाखों दलितों की आंखों में यह सपना जगाया था कि सत्ता में उनकी भी आवाज होगी, हिस्सेदारी होगी और अपना राजनीतिक आसमान होगा।

अब देखना है…

‘ईशान’ केवल मायावती के भरोसे की नई दिशा बनते हैं या उस पुराने बसपा मतदाता के लिए नया सवेरा भी, जो आज भी अपने आंदोलन के लौटने की राह देख रहा है।

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