
The Heritage of Jammu and Kashmir : जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A हटाने का फैसला साल 2019 में देश के सबसे बड़े संवैधानिक बदलावों में शामिल रहा। इस फैसले के बाद राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर उसे केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया गया। हालांकि, इसी बदलाव के बीच एक ऐसा कानून भी था जिसे केंद्र सरकार ने छुआ तक नहीं। यह कानून था जम्मू-कश्मीर के ऐतिहासिक चिनार पेड़ों की सुरक्षा से जुड़ा नियम।
चिनार: कश्मीर की पहचान और सदियों पुरानी विरासत
कश्मीर की खूबसूरती में चिनार के पेड़ों की खास भूमिका रही है। पतझड़ के मौसम में जब इनकी हरी पत्तियां लाल, पीली और सुनहरे रंग में बदल जाती हैं, तो पूरी घाटी एक अद्भुत नजारा पेश करती है। इसी खूबसूरती को देखकर एक पुरानी कहानी प्रचलित है कि मुगल बादशाह जहांगीर ने चिनार के लाल पत्तों को देखकर कहा था, “चे-नार अस्त?” यानी “यह कैसी आग है?”
हालांकि इतिहासकार इस कहानी की पूरी तरह पुष्टि नहीं करते, लेकिन कश्मीर की लोक परंपराओं में यह किस्सा आज भी प्रसिद्ध है। चिनार सदियों से कवियों, कलाकारों, सूफियों और प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।
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सदियों का गवाह रहा है चिनार का पेड़
कश्मीर के चिनार पेड़ों ने कई ऐतिहासिक दौर देखे हैं। मुगल शासन से लेकर अफगान, सिख, डोगरा शासन और फिर आजाद भारत तक, इन पेड़ों ने समय के बदलाव को अपनी आंखों के सामने देखा है। जम्मू-कश्मीर में मौजूद कुछ चिनार के पेड़ 500 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। बड़गाम के चत्तरगाम में स्थित एक चिनार को बेहद प्राचीन माना जाता है। ये पेड़ सिर्फ प्राकृतिक संपदा नहीं बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
अनुच्छेद 370 हटा, लेकिन चिनार संरक्षण कानून क्यों नहीं बदला?
पाँच अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35A को समाप्त किया। इसके बाद राज्य की संवैधानिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया। लेकिन जम्मू-कश्मीर प्रिजर्वेशन ऑफ स्पेसिफाइड ट्रीज एक्ट, 1969 को जारी रखा गया।
इस कानून का उद्देश्य चिनार जैसे महत्वपूर्ण पेड़ों को अवैध कटाई और नुकसान से बचाना है। इसके तहत बिना सरकारी अनुमति चिनार के पेड़ को काटना, उसकी शाखाओं को नुकसान पहुंचाना या उसे नष्ट करना अपराध माना जाता है। सरकार ने इस कानून में बदलाव इसलिए नहीं किया क्योंकि इसका संबंध जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से नहीं, बल्कि पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा से है।
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चिनार संरक्षण के पीछे है पर्यावरण और संस्कृति की वजह
अनुच्छेद 370 मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति, भूमि अधिकार और नागरिकता जैसे मुद्दों से जुड़ा था। वहीं चिनार संरक्षण कानून एक पर्यावरणीय कानून है, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखना है। जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद भी ऐसे कई स्थानीय कानूनों को जारी रखा गया जो पर्यावरण, वन और स्थानीय प्रशासन से जुड़े थे। चिनार की सुरक्षा भी इसी श्रेणी में आती है।
बदलते रंगों से बनाता है कश्मीर को खास
चिनार की सबसे बड़ी खासियत इसकी पत्तियों का बदलता रंग है। गर्मियों में इसकी पत्तियां हरी रहती हैं, लेकिन पतझड़ आते ही ये लाल, पीले और एम्बर रंग में बदल जाती हैं। यही दृश्य कश्मीर की पहचान बन चुका है। चिनार को अंग्रेजी में ओरिएंटल प्लेन कहा जाता है और इसका वैज्ञानिक नाम प्लाटेनस ओरिएंटलिस है। स्थानीय भाषा में इसे बूयन या बुएन भी कहा जाता है।
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