गुलिस्तान-ए-इरम कहीं किसी कोठी की दीवारों ने शाही हंसी सुनी है, तो उन्हीं दीवारों ने साजि़शों की फुसफुसाहटें भी

गुलिस्तान-ए-इरम

गुलिस्तान-ए-इरमः लखनऊ के दिल में छिपी एक ‘जन्नत’ की कहानी

  • यहां के खंडहर भी खामोश नहीं होते, वे बस बोलने का इंतज़ार करते हैं
  • कभी लखनऊ की विरासत छुपाकर रखती थी यह कोठी, आज है वीरा

लखनऊ। गुलिस्तान-ए-इरम कभी सिर्फ एक कोठी नहीं थी। यह लखनऊ की बौद्धिक आत्मा, उसकी शाही महत्वाकांक्षाओं और उसकी नाज़ुक सच्चाइयों की साक्षी थी। आज वह भले ही थकी और खामोश दिखाई दे, लेकिन उसकी हर दरार, हर टूटी सीढ़ी और हर बंद दरवाज़ा अब भी बीते दौर की कहानी सुनाने को बेताब है। बस किसी ऐसे कान की ज़रूरत है, जो सुन सके। यही वजह है कि लखनऊ में इतिहास कभी मरा नहीं, बस वक्त की परतों में ढंक गया। लखनऊ की विरासत की कड़ी को और आगे बढ़ाती ‘नया लुक’ की रिपोर्ट…

लखनऊ सिर्फ एक शहर नहीं है, एक जि़ंदा अहसास है। ऐसा खुशनुमा इल्म, जो समय के साथ और गहराता जाता है। यहां की गलियों में सिर्फ आवाज़ें नहीं गूंजतीं, बल्कि तहज़ीब बोलती है। पुराने मकानों की बालकनियों से झांकती जालियां, दरवाज़ों पर उकेरी गई नक्काशियां और शाम ढलते ही हवाओं में घुलती इत्र और मिट्टी की मिली-जुली खुशबू। सब मिलाकर लखनऊ को एक अलग पहचान देती हैं। इस शहर का इतिहास, किताबों तक सीमित नहीं रहा। बल्कि पत्थरों, दीवारों और खामोश आंगनों में सांस लेता रहा है। यहां की इमारतें सिर्फ ईंट और चूने से बनी संरचनाएं नहीं हैं, वे अपने भीतर सदियों की यादें समेटे हुए हैं। कहीं किसी कोठी की दीवारों ने शाही हंसी सुनी है, तो कहीं उन्हीं दीवारों ने साजि़शों की फुसफुसाहटें भी। यहां के खंडहर भी खामोश नहीं होते, वे बस बोलने का इंतज़ार करते हैं।

कभी हुआ करती थी लखनऊ की खूबसूरत पहचान…

आज जब हम तेज़ रफ्तार जि़ंदगी में, भागती सड़कों, ट्रैफिक के शोर और सरकारी दफ्तरों की औपचारिकता के बीच से गुजरते हुए इस इमारत पर सरसरी नज़र डालते हैं, तो शायद ही अंदाज़ा होता है कि कभी यही स्थान लखनऊ की सबसे खूबसूरत पहचान हुआ करती थी। यही वह जगह थी, जहां ज्ञान, कला और सत्ता एक-दूसरे से टकराते थे। यहां दिन में किताबों की दुनिया बसती थी और रात में राजनीति व साजि़शों की परछाइयां दीवारों पर उतर आती थीं। इन्हीं परतों के बीच कैसरबाग के दिल में एक ऐसा नाम दर्ज है, जो आज भले ही आम नज़र से ओझल हो गया हो, लेकिन कभी इसे स्वर्ग का पर्याय माना जाता था। नाम है- गुलिस्तान-ए-इरम।

यह नाम सुनते ही आंखों के सामने एक ऐसा बगीचा उभरता है, जहां हरियाली सुकून देती है। फव्वारों की हल्की-सी आवाज़ मन को ठहराव देती है और किताबों की खामोशी इंसान को खुद से जोड़ देती है। ‘गुलिस्तान-ए-इरम’ एक ऐसा नाम, जो अपने आप में एक पूरी कल्पना है। ऐसा अहसास, जो आंखें बंद करते ही हरियाली, पानी की ठंडक और फूलों की खुशबू से भर जाती है। यह नाम सुनते ही मन किसी ऐसी जगह की ओर चला जाता है, जहां शोर नहीं, सुकून हो। जहां समय ठहर जाता हो और आत्मा को आराम मिल जाए। गुलिस्तान फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- फूलों का बगीचा। ‘गुल’ यानी फूल और ‘स्तान’ यानी स्थान। इरम, कुरान और बाइबिल में वर्णित उस उद्यान का नाम है, जिसे जन्नत कहा गया। ऐसी जगह, जहां कभी पतझड़ नहीं आता। जहां न दर्द है और न थकान। जहां हर चीज़ पूर्णता में मौजूद है।

शाही चमक-दमक था इस शहर को पसंद

19वीं सदी के शुरुआती बरसों में, जब अवध की फिज़ाओं में शाही ठहराव और तहज़ीब की खुशबू थी, तब गद्दी पर बैठे एक नवाब नासिर-उद-दीन हैदर। महज़ 25 साल की वय में सत्ता उनके हाथ आई। वे ऐसे शासक थे, जिन्हें समझना आसान नहीं था। कभी बेहद संजीदा, तो कभी विलास में डूबा हुआ। कभी खामोश तो कभी अपनी ही सोच में खोया हुआ। वे विलास प्रिय थे। शाही जीवन की चमक-दमक पसंद थी। इसी चमक के पीछे एक ऐसा आदमी भी था, जो रात के सन्नाटे में आसमान की ओर देखता और सितारों में अपने भविष्य के संकेत ढूंढता। ज्योतिष और खगोल विज्ञान में हैदर की गहरी आस्था थी। किसी भी बड़े फैसले से पहले वे ग्रह-नक्षत्रों की चाल ज़रूर देखवाते थे। तमाम उलझनों से दूर, गुलिस्तान-ए-इरम नवाब की सबसे प्रिय दुनिया थी। यहां न दरबार की औपचारिकता थी, न सत्ता का बोझ। जहां हज़ारों दुर्लभ किताबें सजी रहती थीं। इतिहास, दर्शन, धर्म, विज्ञान और साहित्य। हर विषय पर मौजूद ये किताबें नवाब की बेचैन आत्मा को सुकून देती थीं।

लखनऊ के विकीपीडिया के नाम से मशहूर दिवंगत लालजी टंडन कहते थे- ‘जब नवाब इस कोठी में होते, तो समय मानो थम-सा जाता। वे घंटों किताबों के बीच बैठे रहते, कभी पढ़ते, कभी सोच में डूब जाते। सत्ता उनके लिए ज़रूरी थी, लेकिन यह जगह उनकी सांस थी। गुलिस्तान-ए-इरम में उनकी जान बसती थी। यहां वे नवाब नहीं, बस एक अकेले इंसान थे, जो अपने सवालों के जवाब ढूँढ रहा था। शायद इसी वजह से गुलिस्तान-ए-इरम की दीवारों में आज भी उनकी मौजूदगी महसूस की जाती है। जैसे कहीं कोई पन्ना पलट रहा हो, या कोई खामोश आवाज़ अब भी सुकून की तलाश में भटक रही हो।

कभी किताबों की खुशबू और सुकून की सांसों से भरा रहता था यह इलाका

नवाब नासिर-उद-दीन हैदर की सबसे बड़ी कमज़ोरी उनकी वही दीवानगी थी, जिसे वे आधुनिकता समझ बैठे थे। अंग्रेज़ों के प्रति उनका आकर्षण धीरे-धीरे सम्मान से आगे बढ़कर अंधी आसक्ति में बदल गया। शाही पोशाकों की जगह यूरोपीय कपड़े आए, दरबार की तहज़ीब में अंग्रेज़ी रंग घुलने लगा। यहां तक कि उन्होंने एक ईसाई महिला से निकाह भी कर लिया। इतिहासकार बताते हैं कि जब नवाब अंग्रेज़ों के किसी काम के नहीं रहे तो उन्हें रास्ते से हटाने की साजि़श खुले मैदान की बजाय भरोसे की छाया में पली-बढ़ी। नवाब के सबसे करीबी और भरोसेमंद दारोगा धनिया महरी को इसका ज़रिया बनाया गया, जिस पर नवाब आंख मूंदकर भरोसा करते थे। सात जुलाई 1837, कैसरबाग के सन्नाटे में डूबा गुलिस्तान-ए-इरम। जो कभी किताबों की खुशबू और सुकून की सांसों से भरा रहता था। उस दिन एक दर्दनाक अंत का गवाह बना। कहा जाता है कि नवाब को ज़हर दिया गया। वे तड़पते रहे, मदद के लिए तरसते रहे। सत्ता की दुनिया में उस वक्त कोई अपना नहीं था। उसी कोठी में, जहां उन्होंने सबसे ज़्यादा सुकून पाया था, वहीं उन्होंने आखिरी सांस ली। न कोई शाही ऐलान, न कोई सम्मानजनक विदाई, बस एक खामोश मौत। उस दिन ‘गुलिस्तान-ए-इरम’ सत्ता की बेवफाई, भरोसे की हत्या और एक शासक की तन्हा त्रासदी का स्मारक बन गया। आज भी उसकी दीवारें मानो यही कहती हैं- ‘जब दीवानगी समझदारी पर भारी पड़ जाए, तो ताज भी इंसान को बचा नहीं पाता।‘

तीन कमरे और सबसे काला खेल

नवाब नासिर-उद-दीन हैदर की मौत के बाद गुलिस्तान-ए-इरम में जो मंजर बना, वह शायद सत्ता के इतिहास का सबसे बेरहम दृश्य था। एक ही इमारत के तीन कमरे, तीन अलग-अलग सच्चाइयों के गवाह बने। एक कमरे में नवाब की लाश पड़ी थी। दूसरे में बादशाह की बेगम थीं। जो अपने दुख को भीतर दबाए, वे अपने पोते मुन्ना जान की ताजपोशी की तैयारियों में जुटी थीं। उनके लिए यह सिर्फ रस्म नहीं थी, यह नवाबी सल्तनत को बचाने की आखिरी कोशिश थी। उन्हें यकीन था कि खून की विरासत अब भी गद्दी पर बैठेगी। वहीं तीसरे कमरे में अंग्रेज़ों द्वारा बुलाए गए मोहम्मद अली शाह थे। खामोश, न कोई मातम, न कोई खुशी। कुछ ही देर में अंग्रेज़ी अफसर गुलिस्तान-ए-इरम पहुंचे। नवाबी परम्पराओं का कोई लिहाज़ नहीं रखा गया। न शोक का सम्मान, न रिश्तों की कद्र। मुन्ना और बेगम को गिरफ्तार कर लिया गया और मोहम्मद अली शाह को गद्दी पर बिठा दिया गया। उस दिन वह सिर्फ एक कोठी नहीं रही। वह सत्ता के सबसे काले खेल का गवाह भी बनी। जहां लाश, ताज और साजि़श, तीनों एक ही छत के नीचे मौजूद थे।

…तब अंग्रेज मिटाना चाहते थे नवाबी सत्ता

यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों ने तय कर लिया कि नवाबी सत्ता के इस प्रतीक को मिटा देना है। गुलिस्तान-ए-इरम, जो कभी जन्नत का एहसास देता था, उस बेरहमी का शिकार बना। बगीचे उजाड़ दिए गए। फव्वारे खत्म कर दिए गए और सबसे बड़ा जख्म, मुख्य प्रांगण के बीचों-बीच एक सड़क निकाल दी गई। यही सड़क आगे चलकर ‘ठंडी सड़क’ कहलाई। जिस गुलिस्तान को स्वर्ग की ज़मीन पर उतरी हुई झलक कहा जाता था। उसे अंग्रेज़ों ने इस तरह उजाड़ दिया, जैसे यादें, तहज़ीब और आत्मा, सब मिटा देना चाहते हों। आज भी जब कोई उस सड़क से गुजरता है तो शायद उसे पता नहीं होता कि वह एक उजड़ी हुई जन्नत के सीनेपर चल रहा है। जब गुलिस्तान-ए-इरम के जीर्णोद्धार का काम शुरू हुआ तो दीवारों की मरम्मत और फर्श की खुदाई के दौरान एक चौंकाने वाला सच सामने आया।

इस कोठी के नीचे सुरंगों का पूरा जाल मौजूद था। ये सुरंगें महज़ रास्ते नहीं थीं, बल्कि कैसरबाग की अदृश्य नसें थीं। कहा जाता है कि ये सुरंगें छत्तर मंजि़ल, लाल बारादरी, दर्शन विलास और आसपास की दूसरी शाही कोठियों को आपस में जोड़ती थीं। ऊपर से देखने पर सब कुछ शांत और सधा हुआ लगता था, लेकिन नीचे एक पूरी दुनिया चलती थी। गर्मियों की तपिश से बचने के लिए नवाबी परिवार इन्हीं रास्तों से गुजरता था। संकट के समय गुप्त आवाजाही इन्हीं सुरंगों से होती थी, ताकि किसी को भनक तक न लगे। और सबसे अहम, सत्ता से जुड़े ज़रूरी दस्तावेज़, ख़त, और फैसले इन्हीं अंधेरी गलियारों से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाए जाते थे।

आज का गुलिस्तान-ए-इरम

वक्त ने गुलिस्तान-ए-इरम को बदला ज़रूर है, लेकिन उसे पूरी तरह तोड़ नहीं पाया। आज यह कोठी बाहर से देखने में अब भी भव्य लगती है। ऊंचे दरवाज़े, नक्काशीदार दीवारें और शाही अनुपात। मगर जैसे ही भीतर कदम रखते हैं, उसकी थकान साफ महसूस होती है।अंदर की दीवारें जर्जर हैं। छतें बोझ उठाए खामोशी से खड़ी हैं। शाम ढलते ही यहां सन्नाटा गहराने लगता है। स्थानीय लोग कहते हैं- ‘रात में यहां आने से डर लगता है। कुछ का मानना है कि यह डर भूतों का नहीं, बल्कि दबा हुआ इतिहास है, जो अब भी सांस ले रहा है।‘ यहां सन्नाटा खामोश नहीं होता, वह बोलता है। साल 2013 में शुरू हुआ जीर्णोद्धार एक नई उम्मीद लेकर आया। उम्मीद इस बात की कि गुलिस्तान-ए-इरम फिर से वही बन सके, जो कभी था। सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि ज्ञान और संवाद का केंद्र। जहां किताबें हों, साहित्यिक गोष्ठियां हों, बहसें हों और लखनऊ एक बार फिर अपनी उसी रूह से जुड़ सके, जिसे वक्त ने धुंधला तो किया है, लेकिन मिटाया नहीं।

Spread the love

श्रीराम मंदिर दान प्रबंधन
Uttar Pradesh

राम मंदिर के चढ़ावे पर उठे सवाल: आस्था जवाबदेही और नृपेंद्र मिश्रा का संदेश

श्रीराम मंदिर में श्रद्धालुओं के योगदान के उपयोग और प्रबंधन को लेकर चर्चा और विवाद गहराया शाश्वत तिवारी अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। इस मंदिर के निर्माण के लिए देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालुओं ने अपना धन, […]

Spread the love
Read More
राजाजीपुरम सड़क निर्माण
Uttar Pradesh

राजाजीपुरम में 13 वर्षों से जर्जर सड़क के निर्माण का संकल्प, विधायक मुकेश शर्मा ने किया भूमि पूजन

राजाजीपुरम में वर्षों से जर्जर पड़ी सड़क के पुनर्निर्माण की मांग को लेकर स्थानीय लोगों ने उठाई आवाज Lucknow, Rajajipuram: लंबे समय से बदहाल और जर्जर स्थिति में पड़ी सड़क के निर्माण की मांग को लेकर राजाजीपुरम क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। क्षेत्र के निवासियों की वर्षों पुरानी मांग को ध्यान […]

Spread the love
Read More
homeslider National

मर्चेंट नेवी कैडेट आदित्य शर्मा की मौत से गांव में शोक, मां-बाप का रो-रोकर बुरा हाल

Aditya Sharma death news : हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के भालू गांव में उस समय भावुक दृश्य देखने को मिला जब 23 वर्षीय मर्चेंट नेवी कैडेट आदित्य शर्मा का पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचा। जैसे ही एंबुलेंस गांव में दाखिल हुई, मां अपने इकलौते बेटे को देखकर बेसुध हो गईं। वह बार-बार उसे आखिरी […]

Spread the love
Read More