ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को सभी ग्रहों का सेनापति कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति अच्छी हो तो वह व्यक्ति को पराक्रम, शौर्य, साहस, हिम्मत, ऊर्जा तथा भूमि प्रदान करता है। जन्म कुंडली में मंगल की स्थिति अच्छी न होने पर व्यक्ति को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मंगल के कमजोर होने की स्थिति में व्यक्ति के जीवन में दुर्घटना की संभावना, जमीन जायदाद से संबंधित झगड़ा, कोर्ट कचहरी, कर्ज, विवाह में परेशानी या वैवाहिक जीवन में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मांगलिक योग कुंडली का मिलान
जब वर या कन्या की कुंडली में मंगल लग्न, लग्न से चतुर्थ, लग्न से सप्तम, लग्न से अष्टम या लग्न से द्वादश भाव में हो तो मांगलिक दोष कहलाता है। इसके अतरिक्त यदि मंगल चंद्र राशि मे , चंद्र से चतुर्थ, चंद्र से सप्तम, चंद्र से अष्टम या चंद्र से द्वादश भाव में हो तो चंद्र मांगलिक दोष कहलाता है।
लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे।
स्त्री भर्तुर्विनाशच भर्त्ता च स्त्री विनाशनम् ।।
इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत में मांगलिक दोष का विचार शुक्र से तथा द्वितीय भाव के मंगल होने से भी व्यक्ति को मांगलिक माना जाता है। मंगल ग्रह भी विवाह से पहले वर और कन्या की जन्म कुंडली के मिलन के समय अत्यंत आवश्यक है। एक व्यक्ति की कुंडली में मंगल दूसरे को कष्ट पहुंचा सकता है। अतः मांगलिक मिलान भी आवश्यक होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि कन्या या वर में से कोई भी मांगलिक व्यक्ति हो, तो उसके लिए उसका जीवन साथी भी मांगलिक ही होना चाहिए। कई ज्योतिषी मानते है कि लड़के की कुंडली में बारहवें भाव में मंगल स्थित है तो लड़की की कुंडली में भी बारहवें भाव में ही मंगल स्थित होना चाहिए तभी ये उचित मिलान कहा जाएगा। नहीं तो उन दोनों वर तथा कन्या का विवाह करना उचित नहीं होगा। परंतु अधिकाशतः ज्योतिषी ऐसा विचार नहीं मानते। यदि कोई व्यक्ति मांगलिक है और उसकी कुंडली में जिस भाव में मंगल स्थित है ठीक उसी भाव में उसके साथी की कुंडली में कोई पाप ग्रह जैसे राहु, शनि, केतु अथवा सूर्य स्थित है तब भी विवाह किया जा सकता है क्योंकि पाप ग्रह से मंगल की ऊर्जा कम हो जाती है।
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सूर्य को पाप ग्रह नहीं कहा जाता लेकिन इसे उग्र ग्रह की श्रेणी में रखा जाता। है। उदाहरण के लिए यदि लड़की की कुंडली में सातवें भाव में मंगल स्थित है और लड़के की कुंडली के उसी सातवें भाव में कोई पाप ग्रह (शनि, राहु केतु अथवा उग्र ग्रह सूर्य) स्थित है तब विवाह किया जा सकता है। मांगलिक मिलान में आजकल एक और शब्द भी विशेष रूप से सुनने में आ रहा है – आंशिक मांगलिक। यह शब्द ज्योतिष के ग्रंथों में तो नहीं है लेकिन यह बखूबी ऐसी कुंडलियों को दर्शाता है जो मांगलिक तो हैं लेकिन किसी न किसी कारण से मांगलिक दोष का परिहार हो रहा हो, जैसे मंगल उच्च या स्वगृही हो या गुरु से दृष्ट हो आदि। आंशिक मांगलिक का विवाह मांगलिक से तो कर ही सकते हैं क्योंकि वह भी मांगलिक तो है ही, लेकिन उसका सादा कुंडली से भी मिलान सही मान सकते हैं क्योंकि उसमें मांगलिक दोष का निवारण हो रहा है। ज्योतिषानुसार भी यह सही है क्योंकि मंगल दोष के अनेकों परिहार हैं एवं मांगलिक दोष केवल कुछ विशेष कुंडलियों में ही अनिष्टकारी होता है।
मंगल दोष के लक्षण
- मांगलिक जातकों के विवाह के समय कई प्रकार के विघ्न आते हैं।
- जातक का विवाह संबंध आसानी से तय नहीं हो पाता या फिर विवाह संबंध तय होकर छूट जाता है।
- अधिक उम्र गुजरने पर भी विवाह नहीं हो पाता।
- विवाह पश्चात् जीवन साथी से प्रायः विवाद के कारण पति-पत्नी के संबंधों में कटुता की स्थिति बनी रहती है।
लग्न भाव में मंगल
लग्न में बैठा मंगल अपनी स्थिति द्वारा जातक के शरीर में एवं सप्तम भाव को दृष्टि द्वारा प्रभावित करके, मंगल, जातक के वैवाहिक जीवन में अतिरिक्त उत्तेजना एव क्रूरता भर देता है और जातक को अतिभोगी बनाता है। यदि जातक के जीवनसाथी में उसके इन गुणों या अवगुणों को सहने की क्षमता नहीं होती है तो उसके वैवाहिक जीवन में विष घुल जाता है।
लग्न मे मांगलिक दोष का प्रभाव
वैवाहिक जीवन में आवेश और क्रोधवश गलत निर्णय लिए जाते हैं, जिसके कारण जातक की सामाजिक छवि और प्रतिष्ठा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- जातक का सुख मैं कमी आती है और आयु भी घटती है।
- मंगल की यह स्थिति उसकी पत्नी के लिए मारक का काम भी करती है।
- पति-पत्नी में अलगाव होने की संभावनाए प्रबल होती है।
प्रथम भाव में यदि मंगल हो एवं अशुभ ग्रहों (शनि, राहु क्षीण चंद्रमा) के साथ हो व शत्रु राशि में हो तो मंगल दोष होता है। ऐसी स्थिति से पत्नी का स्वास्थ्य व आयु प्रभावित होता है, जातक का विवाह अधिक उम्र में होता है तथा विवाह में विलंब की स्थिति उत्पन्न होती है।
चतुर्थ भाव में मंगल
जन्मपत्रिका का चतुर्थ भाव जातक के सुख का भाव है और मंगल यहां दिशाबल से हीन होता है। यहां से मंगल सप्तम, दशम और एकादश भाव को प्रभावित करता है अर्थात इन भावों में अतिरिक्त ऊर्जा को प्रभावित करता है। दशम भाव, अष्टम अर्थात तीसरे भाव से अष्टम भाव भी है जो जातक की आयु का सूक्ष्म भाव है और सप्तम से चतुर्थ भाव अर्थात भार्या के सुख का भाव होता है। दूसरे शब्दों में चतुर्थस्थ मंगल इस स्थिति में जातक के विवाह एवं वैवाहिक जीवन, उसके सुख को और आयु को प्रभावित करता है।
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चतुर्थ मे मांगलिक दोष का प्रभाव
चतुर्थ भाव में यदि अशुभ मंगल हो तो ऐसे जातक का विवाह शीघ्र होता है परंतु विवाह पश्चात वैवाहिक जीवन में सुख का अभाव हो जाता है। घर गृहस्थी में क्लेश की संभावना प्रबल होती है। घर के बड़े बुजुर्ग से अनबन होना तथा भूमि भवन से संबंधित मामलों में उलझनें पैदा होने लगती है।
सप्तम भाव में मंगल
यह स्थिति अधिक प्रबल होती है जो जातक के जीवन में सप्तम भाव संबंधित सभी क्षेत्रों में पूर्ण प्रभाव डालती है। विवाह के लिए सप्तम भाव मुख्य भाव है इसलिए जातक के विवाह और वैवाहिक जीवन में इसका मंगल दृष्टि द्वारा दशम, लग्न और द्वितीय भाव को प्रभावित करके जातक को आवेशी, क्रोधी और कामुक बनाता है। जो उचित मिलान द्वारा परिहार न होने की स्थिति में जातक के वैवाहिक जीवन में विघ्न डालने और अलगाव करने में पूर्ण सक्षम होता है। यह योग जीवनसाथी की आयु को भी प्रभावित करता है। ऐसे जातक का अपने परिवार से विरोध बना रहता है और भार्या की अल्पायु उसके वैवाहिक जीवन में अधिक कष्ट लाती है। सप्तम भावस्थ अशुभ मंगल जातक के विवाह संबंध में बाधा कारक होता है। यदि सप्तम भाव में मंगल अशुभ ग्रहों के साथ हो तो जातक का विवाह होने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विवाह पश्चात भी वर वधू में अनबन बनी रहती है।
अष्टम भाव में मंगल
जन्मपत्रिका में अष्टम भाव, जातक की आयु का भाव और सप्तम से द्वितीय भाव होने से उसके जीवनसाथी का मारक भाव होता है। सप्तम विवाह का भाव है तो लग्न से द्वितीय भाव जातक के लिए मारक भाव के साथ-साथ सप्तम से अष्टम भाव होने के कारण विवाह की आयु का भाव होता है। जिसको अष्टमस्थ मंगल अपनी दृष्टि द्वारा प्रभावित करके इस स्थिति में भी जातक के विवाह और वैवाहिक जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करता है। अष्टमस्थ मंगल वैवाहिक जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित कराता है। अष्टमस्थ मंगल अपनी दृष्टि द्वारा सप्तम से पंचम अर्थात लग्न से एकादश एवं सप्तम से नवम अर्थात् चतुर्थ भाव जो वैवाहिक जीवन के पूर्वपुण्य और इस जन्म के सौभाग्य के भाव है दोनों की नैसर्गिक श्रेष्ठता को कठोरता में बदल देता है। साथ ही साथ सप्तम से पंचम अर्थात एकादश भाव को अपनी दृष्टि से प्रभावित करके जातक की आय प्राप्ति के मार्ग एवं वंश वृद्धि में रुकावट डालता है अपनी अष्टम दृष्टि से तीसरे भाव को प्रभावित करके वह जातक के भाई-बहनों के लिए असहनीय बनाता है। तीसरा भाव सूक्ष्म आयु स्थान भी होता है। अतः मंगल अपनी दृष्टि द्वारा जातक की आयु को भी प्रभावित करता है। इन विपरीत परिस्थितियों से जातक का वैवाहिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पढ़ने की संभावना होती है। अष्टम भावस्थ अशुभ मंगल जातक के कुसंगति में पड़ने के योग बनाता है। यदि अष्टम भाव में अशुभ मंगल पर मारक ग्रहों का प्रभाव हो तो जातक को अथवा जीवन साथी को मृत्यु तुल्य कष्ट प्राप्त होता है।
