क्या युद्ध और घृणा पर टिका होगा नया विश्व? ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष ने खड़े किए बड़े सवाल

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  •  ईरान संघर्ष ने खड़े किए गंभीर सवाल

नया लुक डेस्क

नई दिल्ली। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष अब सिर्फ भू-राजनीतिक टकराव नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक प्रतीकों और पहचान की राजनीति से जुड़कर एक नए तरह के वैश्विक संकट का संकेत दे रहा है। रमज़ान जैसे पवित्र महीने के दौरान हमले और यहूदी पर्व पुरिम के समय जश्न के बीच यह युद्ध एक गहरे प्रतीकात्मक अर्थ ग्रहण करता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि इस संघर्ष में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक हस्तियां निशाने पर आईं। इससे पहले भी नागरिक ठिकानों और स्कूलों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिसने इस युद्ध की क्रूरता को और बढ़ा दिया है।

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यह संघर्ष केवल आधुनिक हथियारों-मिसाइलों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें नस्ल, धर्म और इतिहास में भी गहराई तक जाती दिख रही हैं। पुरिम, जो यहूदियों का एक प्रमुख उत्सव है, इतिहास में उत्पीड़न से मुक्ति का प्रतीक रहा है। वहीं रमज़ान आत्मसंयम और आध्यात्मिकता का महीना माना जाता है। ऐसे समय में युद्ध का होना इसे “सभ्यतामूलक टकराव” का रूप देने की आशंका पैदा करता है। अमेरिका का दावा है कि कूटनीतिक वार्ताएं विफल होने के कारण उसे सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। लेकिन आलोचकों का मानना है कि वार्ता अब केवल औपचारिकता बन गई है और वास्तविक लक्ष्य सत्ता परिवर्तन तथा भू-राजनीतिक वर्चस्व है। ईरान में पहले हुए विरोध प्रदर्शनों और उनके दमन ने भी हालात को और जटिल बनाया है। इन घटनाओं में बाहरी खुफिया एजेंसियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

ईरान को अक्सर एक कठोर शासन प्रणाली के रूप में देखा जाता है, लेकिन वहां एक विशिष्ट राजनीतिक ढांचा भी मौजूद है, जो पश्चिमी लोकतंत्र से अलग होते हुए भी चुनावी प्रक्रिया को शामिल करता है। विश्लेषकों का मानना है कि बाहरी हस्तक्षेप के बिना ईरान क्षेत्र के अन्य राजतंत्रों की तुलना में अधिक स्वतंत्र और संप्रभु व्यवस्था बनाए रख सकता है। हालांकि, मौजूदा संघर्ष के बाद वहां स्थिरता बनी रहेगी या नहीं, यह बड़ा प्रश्न है। इजराइल में भले ही पुरिम का त्योहार था, लेकिन जमीनी हालात भय और असुरक्षा से भरे रहे। Tel Aviv में सन्नाटा और उड़ानों का रद्द होना इस बात का संकेत है कि युद्ध का असर आम जीवन पर गहरा पड़ा है। इसी तरह दुबई जैसे वैश्विक व्यापार और पर्यटन केंद्र में भी अस्थिरता देखी जा रही है।

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भारत की भूमिका पर उठते सवाल

भारत की विदेश नीति को लेकर भी बहस तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा और रक्षा सहयोग के संकेतों को कुछ लोग रणनीतिक मानते हैं, जबकि आलोचक इसे एक पक्ष विशेष के करीब जाने के रूप में देख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की कूटनीति संतुलन पर आधारित रही है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम में यह संतुलन चुनौती के दौर से गुजर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है क्या दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां युद्ध, घृणा और पहचान की राजनीति ही नए वैश्विक नियम बन जाएंगे? आज संवाद, शांति और कूटनीति अपवाद बनते जा रहे हैं, जबकि हिंसा और टकराव सामान्य होते जा रहे हैं। यही स्थिति आने वाले समय में वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।

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