राजेन्द्र गुप्ता
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली शिव दमनक चतुर्दशी (दमनकोत्सव) आज श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह पर्व भगवान शिव (और कुछ परंपराओं में विष्णु) को समर्पित है, जिसमें ‘दमनक’ (दौना) नामक सुगंधित पौधे के पत्ते और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। यह उत्सव प्रकृति और आध्यात्मिकता के अद्भुत संगम का प्रतीक माना जाता है।
शिव दमनक चतुर्दशी के मुख्य बिंदु
तिथि: यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है।
महत्व: दमनक के पत्तों से भगवान का श्रृंगार किया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, शिवजी ने कामदेव को भस्म करने के बाद अपनी इंद्रियों को शांत करने के लिए इन सुगंधित फूलों का उपयोग किया था।
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पूजा विधि: इस दिन शिव मंदिर में दमनक के पौधे की पूजा की जाती है और उन्हें समर्पित किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से कर्मों का बोझ कम होता है और आध्यात्मिक प्रगति होती है।
अन्य नाम: इसे दमनक पर्व या दमनकोत्सव के रूप में जाना जाता है।
यह त्योहार प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और भगवान शिव से सुरक्षा की प्रार्थना करने का अवसर है।
शिव दमनकोत्सव का महात्मय
राजा युधिष्ठिर ने पूछा- भगवन्! इस संसार में बहुत-से सुगन्धित पुष्प हैं, परंतु उनको छोड़कर दमनक (दौना) नामक पुष्प देवताओं को क्यों बढ़ाया जाता है तथा दोलोत्सव और रथयात्रोत्सव मनाने की क्या विधि है, इसका वर्णन करने की आप कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- पार्थ! मन्दराचल पर्वत पर दमनक नाम का एक श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुगन्धित वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके दिव्य गन्ध के प्रभाव से देवाङ्गनाएँ विमुग्ध हो गयीं और ऋषि मुनि भी जप, तप वेदाध्ययन आदि से च्युत हो गये। इस प्रकार उसके गन्ध से सब लोग उन्मत्त हो गये। सभी शुभ कार्यों एवं मङ्गल-कार्यों में विघ्र उपस्थित हो गया। यह देखकर ब्रह्माजी को बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे दमनक से बोले – ‘दमनक! मैंने तुम्हें संसार (के दोषों) के दमन (शान्त) करने के लिये उत्पन्न किया है, किंतु तुमने सम्पूर्ण संसार को उद्वेलित कर दिया है, तुम्हारा यह काम ठीक नहीं है। सज्जनों का कहना है कि अतिशय सर्वत्र वर्ज्य है। इसलिये ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगों में उद्वेग न पैदा हो एक का अपकार करने वाला व्यक्ति अधम कहा जाता है, परंतु जो अनेकों का अपकार करने में प्रवृत्त हो गया हो, उसके लिये क्या कहा जाय ? तुमने बहुत से लोगों को दुःख दिया है, इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि कोई भी व्यक्ति तुम्हारे पुष्प को देवकार्य तथा पितृकार्य में आज से ग्रहण नहीं करेगा।
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ब्रह्माजी द्वारा दिये गये शाप को सुनकर दमनक ने कहा—’महाराज! मैंने द्वेषवश अथवा क्रोधवश किसी का अपकार नहीं किया है। आपने ही मुझे इतना सुगन्ध दिया है कि उसके प्रभाव सभी लोग स्वयं उन्मत्त हो जाते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है। आपने ही मेरा ऐसा स्वभाव बनाया है। जिसकी जो प्रकृति होती है, उसे वह त्याग नहीं सकता; क्योंकि प्रकृति त्यागने में वह असमर्थ होता है। निरपराध होते हुए भी आपने मुझे शाप दिया है।’ दमनक की इस तर्कसंगत बात को सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- ‘दमनक! तुम्हारा कथन ठीक है। मैंने तुम्हें शाप दिया है। उसका मुझे हार्दिक दुःख है। उसकी निवृत्ति के लिये मैं तुझे वरदान देता हूँ कि वसन्त ऋतु में तुम सभी देवताओं के मस्तक पर चढ़ोगे। जो व्यक्ति भक्तिभाव से दमनक पुष्प देवताओं पर चढ़ायेगा, उसे सदा सुख प्राप्त होगा। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी शिव दमनक चतुर्दशी के नाम से विख्यात होगी और उस दिन व्रत-नियम के पालन करने से व्रती के सभी पाप नष्ट हो जायँगे। इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और दमनक भी अपने गन्ध से त्रिभुवन को वासित करता हुआ शिवजीके निवास स्थान मन्दराचल पर रहने लगा। उसी दिन से लोक में शिव दमनक- पूजा प्रसिद्ध हुई।
