भागवत कथा: श्रवण से पापों का नाश, जीवन में जागृत होता है भक्ति और वैराग्य

आशीष द्विवेदी की रिपोर्ट
आशीष द्विवेदी

  • सेखुआनी बाज़ार में श्रीमदभागवत कथा हुई पूर्ण, 10 दिनों तक बही ज्ञान की गंगा

महराजगंज। जिले के सेखुआनी बाज़ार में लगातार 10 दिनों तक श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा हुई। कथा वाचक पं. आनंद भारद्वाज के सुमधुर कंठ से निकली ज्ञान गंगा में भक्तों ने जमकर डुबकी लगाई और भगवदकथा का आनंद लिया। पं. गंगाराम दुबे के घर हुई इस संगीतमयी कथा में भारी संख्या में लोगों ने कथा का श्रवण किया। आचार्य आनंद ने कथा में कहा कि सनातन परम्परा में श्रीमद्भागवत महापुराण का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि भागवत कथा का केवल श्रवण मात्र ही मनुष्य को पापों से मुक्ति दिला सकता है। जिस स्थान पर कथा होती है, वहां स्वयं भगवान का वास माना जाता है। भगवान के नाम का जाप करने से जीवन की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं। इस संसार में ईश्वर की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सद्कर्मों को अपनाना चाहिए।

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आनंद भारद्वाज के मुताबिक़ भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कर्म को प्रधान बताया है। भगवान का संदेश स्पष्ट है कि बिना कर्म के कुछ भी संभव नहीं है। जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, उसे शुभ फल मिलता है, जबकि बुरे कर्म करने वाले को उसके अनुरूप दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं। मनुष्य को हमेशा अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित होना चाहिए। जीवन में दो मार्ग बताए गए हैं। एक दमन का और दूसरा उदारता का। लेकिन दोनों ही मार्गों में अधोगामी प्रवृत्तियों का त्याग आवश्यक है। वह कहते हैं कि गोकर्ण और धुंधकारी की कथा इसका जीवंत उदाहरण है। गोकर्ण ने अपने दुराचारी भाई धुंधकारी को भागवत कथा सुनाई। धुंधकारी ने पूरे मनोयोग से कथा का श्रवण किया, जिसके फलस्वरूप उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई। यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे व्यक्ति कितना भी पापी क्यों न हो, यदि वह श्रद्धा और एकाग्रता से भागवत कथा का श्रवण करे, तो उसे भी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। भागवत कथा अमृत के समान है, जिसका जितना भी रसपान किया जाए, आत्मा की तृप्ति नहीं होती। इसके श्रवण से मन में ज्ञान और वैराग्य का उदय होता है तथा जीवन में भक्ति और प्रेम का संचार होता है।वह कहते हैं संसार में आशा करके ही लोग दुख भोगते हैं। आशा यदि श्रीहरि भगवान विष्णु के चरणों में लगा दें तो शायद दुख न आए। वह कहते हैं कि जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है। वह अपने गुरुदेव भगवान की कुछ लाइनों से समझाने का प्रयास करते हैं।

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कर्ज भी न रहे, मर्ज भी रहे, फर्ज निभता रहे ऐसा वर दीजिए। यानी भगवान उतना ही दीजिए इस समाज में कोई परेशानी न आए। वह कहते हैं साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाज…। भगवान की कृपा बनी रहे तो जीवन में कोई कमी नहीं होगी। वह कहते हैं कि बेइमानी का धन, वंश परम्परा तक नष्ट कर देता है। कौरवों की बेईमानी से इसे समझा जा सकता है। उन्होंने उनका हक छीना, तो उनके वंश में कोई शेष नहीं बचा। वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के ‘रश्मिरथी’ की कविता के माध्यम से दुर्योधन के लालच और महाभारत युद्ध को समझाते हैं। वह कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध से पहले शांति संधि के लिए हस्तिनापुर गए थे। वह चाहते थे कि युद्ध रुके। उनका पहला सुझाव था कि हस्तिनापुर को उचित सम्मान के साथ पांडवों को लौटा दिया जाए। हालांकि धृतराष्ट्र, भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य और दुर्योधन ने इसके लिए साफ मना कर दिया था। दूसरा सुझाव यह था कि दुर्योधन और उसके भाई पांचाली और द्रौपदी के पैर छूकर क्षमा मांगेंगे, जिससे दुर्योधन और भी क्रोधित हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की ओर से शांति के लिए समझौता करने का लाख प्रयास किया। तब उन्होंने पांडवों के लिए केवल पांच गांवों की मांग की, ताकि बिना युद्ध के समझौता हो सके और विनाश से बचा जा सके। लेकिन दुर्योधन ने उनकी वह बात भी नहीं मानी।

तब रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं-

दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो,

तो दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।

हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,

उलटे हरि को बांधने चला, जो था असाध्य साधने चला।

जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।

आचार्य आनंद भारद्वाज कहते हैं कि संतोष व्यक्ति दूसरों की सफलता देखकर जलता नहीं, बल्कि उनसे वह प्रेरणा लेता है। उसका जीवन सरल, संतुलित और तनाव मुक्त होता है। यही कारण है कि संतोष मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है और मनुष्य मन को शांति भी देता है। इसीलिए संस्कृत में कहा गया -“न कश्चित् कस्यचिद् मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपुः।व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥’ संतोष मनुष्य को नैतिक और ईमानदार भी बनाता है। असंतोष ही वह कारण है, जिसके कारण व्यक्ति लालच में पड़कर गलत रास्ता अपनाता है। वह अपने गुरुदेव भगवान के एक उद्धरण से कथा की समाप्ति करते हैं। खुले घरों के दीये कब के बुझ जाते, अगर कोई खामोशी से पहरा न दे रहा होता…ज़रूर कोई है- जिसने अब तक हवाओं का दामन थाम रखा है।

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इस कार्यक्रम में आचार्य आनंद भारद्वाज के साथ आलोक दुबे, मिथिलेश पांडेय और दयानंद सागर थे। यजमान पंडित गंगाराम दुबे के साथ उनके परिजन, रामचंद्र दुबे, शिवाकांत दुबे, प्रमेंद्र दुबे, मृगेंद्र दुबे, धर्मेंद्र दुबे, पवन दुबे, दिलीप दुबे, राजन दुबे, महेंद्र नाथ दुबे, अनमोल रत्न, आदित्य दुबे, अनुराग रंजन, अतुल पांडे, आदर्श दुबे, अनूप पांडे और दिनेश पांडेय  संजय चतुर्वेदी, विनोद चतुर्वेदी, लल्लू उपाध्याय, रामानंद पांडेय  आदि उपस्थित रहे।

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