
नवरात्रि का प्रथम दिन मां शैलपुत्री की उपासना का दिन है वह शक्ति, जिसके हृदय से करुणा की धाराएं फूटती हैं। जिन्होंने जगज्जननी को पुत्री रूप में स्नेह दिया और भगवान शिव को कन्यादान कर शक्ति को शिवत्व, अर्थात कल्याण से जोड़ने का दिव्य कार्य किया। यह संदेश स्पष्ट है कि यदि शक्ति है, सामर्थ्य है, तो उसे सृजन और कल्याण में लगाना चाहिए, न कि विध्वंस में। अन्यथा ऐसा जीवन धरती पर बोझ समान है। मां शैलपुत्री हमें सिखाती हैं कि शक्ति का सही मार्ग साधना, संयम और समर्पण है।
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मां शैलपुत्री ने कठोर तप कर शिवत्व को प्राप्त किया। उनका जीवन बताता है कि सच्चे लक्ष्य के लिए धैर्य, तपस्या और उच्च भावनाओं का होना आवश्यक है। जब साधक अपनी भावनाओं को उच्चतम शिखर तक पहुंचाता है, तभी उसे कैलाशवासी शिव का सान्निध्य प्राप्त होता है। इतिहास और धर्मग्रंथों में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं सीता ने तप और समर्पण से राम को पाया, रुक्मिणी ने कृष्ण को प्राप्त किया, और राधा तो प्रेम और समर्पण की प्रतीक बनकर सदैव श्रीकृष्ण के साथ जुड़ी रहीं। नवरात्रि का यह प्रथम दिन हमें प्रेरणा देता है कि हम आत्मशक्ति को जागृत करें, उसे संयमित करें और उसे जगत के कल्याण हेतु शिवत्व से जोड़ें। यही सच्ची साधना है, यही जीवन का उद्देश्य।
तं नमामि गुरुम् परम्।।
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