कारागार विभाग के बकाया बजट में होगा करोड़ों का गोलमाल!

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  कारागार विभाग: बीते 25 दिन में विभाग ने प्राप्त की 1600 करोड़ की वित्तीय स्वीकृत

  • वित्तीय वर्ष 2025-26 में मिले 2700 करोड़ में अब तक खर्च हुए सिर्फ 1600 करोड़

नया लुक संवाददाता

लखनऊ। प्रदेश के कारागार विभाग के बकाया बजट में करोड़ों के कमीशन का खेल अंतिम चरण में है। विभाग वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए विभाग को 2700 करोड़ का बजट आवंटित किया गया था। 11 महीने में विभाग सिर्फ 900 करोड़ ही खर्च कर पाया लेकिन पिछले करीब 25 दिनों में विभाग के अधिकारियों ने 700 करोड़ के बजट की वित्तीय स्वीकृतियां प्राप्त करके अब तक 1600 करोड़ रुपए खर्च कर दिया है। बीते 25 दिनों में 700 करोड़ की वित्तीय स्वीकृतियों में कमीशन के करोड़ों रुपए का खेल होने को लेकर विभागीय अधिकारियों और कर्मियों में तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे है। चर्चा है कि मोटा कमीशन हासिल करने के लिए अधिकारियों ने 1800 करोड़ के बजट को रोक रखा थी। विभाग में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा इससे पूर्व में भी वित्तीय वर्ष के अंतिम दिन तक मोटा कमिशन लेकर फर्मों और कंपनियों को कार्यों का आवंटन किया जाता रहा है। उधर विभाग के उच्चाधिकारी इस मसले पर कुछ भी बोलने से बचते नजर आ रहे है।

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विभागीय अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेश के कारागार विभाग को जेलों के संचालन, बंदियों के भोजन, सुरक्षा उपकरणों समेत अन्य मद के लिए वित्तीय वर्ष 2025- 26 के लिए करीब 2700 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की गई थी। इसमें जेलों में अत्याधुनिक उपकरण लगाने और उनके मेंटिनेंस के लिए 65 करोड़ रुपए, प्रदेश की जेलों में चल रहे उद्योगों में उत्पादन का रॉ मैटेरियल और मसालों की खरीद के लिए करीब 15 करोड़ रुपए, जेलों के निर्माण और मेंटिनेंस के लिए करीब 1300 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की गई।

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सूत्रों का कहना है वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 10 माह 13 दिन पहले आवंटित 2700 करोड़ की धनराशि में विभाग सिर्फ 900 करोड़ रुपए ही खर्च कर पाया है। शेष बचे 1800 करोड़ रुपए खर्च करने के लिए विभाग के पास सिर्फ एक माह का समय बचा था। मोटी धनराशि को खर्च करना शेष बचा है। सूत्रों का कहना है विभाग के एआईजी जेल प्रशासन की अगुवाई में बीते 25 दिनों में शासन को 700 करोड़ रुपए के प्रस्ताव भेजकर वित्तीय स्वीकृति भी प्राप्त कर ली है। इसी प्रकार निर्माण अनुभाग के बकाया 1200 करोड़ के बजट में 1000 करोड़ रुपए की वित्तीय स्वीकृति प्राप्त कर ली गई है। सूत्रों की माने तो जेल अधिकारी मेंटिनेंस और आधुनिकीकरण के लिए पांच प्रतिशत देकर बजट आवंटित कराते है। इसके साथ ही बकाया धनराशि से होने वाली खरीद फरोख्त, निर्माण कार्य, मेंटिनेंस और अन्य मद में होने वाले खर्चों में करोड़ों के कमीशन की बंदरबांट होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही कि इतना मोटा बकाया बजट की धनराशि को बंदरबांट और कमीशनखोरी के लिए ही 1800 करोड़ रुपए खर्च नहीं किए गए। पूर्व में बुलंदशहर, केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ आदि जेलों में बिना कोई कार्य कराए ही पूरा भुगतान कर बजट खपत कर देने की शिकायत भी कारागार मुख्यालय को प्राप्त हुई थी, परंतु कारागार मुख्यालय द्वारा अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई। बल्कि उन जेलों को और अतिरिक्त बजट पुनः दे दिया गया। उधर इस संबंध में जब प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से बात करने का प्रयास किया गया तो उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

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फाइनेंस कंट्रोलर को नहीं बजट सरेंडर की कोई जानकारी!

कारागार मुख्यालय के आवंटित बजट को सरेंडर करने से बचते है। यही वजह है आवंटित बजट में बंदरबांट के लिए पूरे बजट को रोके रहते है और वित्तीय वर्ष के अंतिम माह (मार्च) में पहले प्रस्ताव भेजकर वित्तीय स्वीकृत प्राप्त करते है। इसके कार्यदाई संस्था से मोटा कमीशन लेकर धनराशि का आवंटन करते है। कार्यदाई संस्था अपने मुताबिक अगले वित्तीय वर्ष में आपूर्ति और कार्य को कराती है। विगत तीन वर्षों में विभाग की ओर से सरेंडर किए गए बजट के संबंध में जब विभाग के फाइनेंस कंट्रोलर आबिद अंसारी से बात करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि उसकी इन्हें कोई जानकारी नहीं है।

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