- बालेन शाह में संपूर्ण नेपाल के लोगों की जीवन शैली सुधारने की सनक थी
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
काठमांडू। नेपाल का चुनाव परिणाम केवल एक नन्हें देश का परिणाम नहीं है। यह दुनिया के उन तमाम देशों के शासकों को एक सबक है जो राष्ट्र को अपनी जागीर समझ कर शासन चलाने की भूल कर रहे हैं। भारत के पड़ोसी इस नन्हें राष्ट्र का चुनाव परिणाम युवा शक्ति के बदलाव की दृढ़ इच्छाशक्ति का नतीजा है जहां उनमें पलायन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रभावशाली लोगों के बच्चों तक ही सीमित सुख और अय्याशी पूर्ण जीवन शैली की आग धधक रही थी। देखा जाए तो चुनावी लहर इसे ही कहते हैं जहां किसी के पक्ष में सहानुभूति की जगह बदले की आग थी जिसकी लपटों में नेपाल की एक से एक पुरानी पार्टियां जलकर राख हो गई। यहां नेपाली कांग्रेस भी भस्म हुई तो कम्युनिस्ट पार्टियां भी स्वाहा हो गई। नेपाल से कम्युनिस्ट पार्टियों का खात्मा भारत के लिए अच्छा संकेत माना जा रहा है। चुनाव प्रारंभ होने के कुछ दिन बाद सत्ता में आ रही राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को शहरी प्रभाव वाली पार्टी कहकर इसके सीमित क्षेत्रों तक सिमटने का कयास लगाया जा रहा था और चार बार के प्रधानमंत्री ओली को धूल चटाते हुए एतिहासिक मतों के अंतर से जीते काठमांडू के पूर्व मेयर और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा रहे बालेन शाह को कड़े मुकाबले में फंसना बताया जा रहा था। राजनीतिक विश्लेषकों के सारे के सारे अनुमान धरे के धरे रह गए।
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चुनाव नतीजों में हर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को मिल रही शानदार बढ़त से यह साफ हो गया है कि राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल को पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार नसीब होने जा रहा है। इस चुनाव परिणाम से सर्वाधिक खुश नेपाल के वे 70 प्रतिशत युवा हैं जिन्होंने एतिहासिक बदलाव की इबारत लिखी। सरकार बालेन शाह के नेतृत्व में बनना तय है। पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने ने बालेन शाह को पार्टी में शामिल होते ही प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया था। नेपाल की राजनीति में पत्रकार से राजनेता बने रवि लामिछाने की इस चुनावी बिसात की तारीफ हर ओर हो रही है। नई सरकार में रवि लामि छाने गृहमंत्री होंगे, यह भी तय है। सरकार गठन के पूर्व उन्होंने राजनीतिक दलों से 40 साल का हिसाब लेने का बयान देकर पुरानी राजनीतिक दलों में खलबली मचा दी है। उनका यह बयान भ्रष्टाचार के विरुद्ध खुली जंग के ऐलान के रूप में देखा जा रहा है। बता दें कि नेपाली कांग्रेस हो या एमाले, घूम फिर कर सरकार इन्हीं के नेतृत्व में बनती रही है। देखा जाए तो 2008 के बाद नेपाल में सरकार का खेल ऐसा चला कि ये जनता की ताकत को ही भूल गए। ये लोग केवल अपने और अपने परिवार के विकास तक ही सीमित रहे। एमाले और नेपाली कांग्रेस के एक से एक बड़े नेताओं के हाथ भ्रष्टाचार से सने हुए हैं। जैसा कि रवि लामिछाने ने कहा, यदि वे इस पर अमल कर ले गए तो यकीन मानिए, एमाले और नेपाली कांग्रेस के ढेर सारे बड़े नेता सलाखों के पीछे होंगे।
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मुमकिन यह भी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में इस बार नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी आरजू राणा देउबा भी न बच पाएं। इन दोनों पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप है। ओली सरकार में बहुत कम दिनों तक गृहमंत्री रहे रवि लामिछाने की छवि एक सख्त गृहमंत्री की उभर कर जनता के सामने आई थी। उन्होंने एक से एक राजनीतिक भ्रष्टाचार को उजागर कर जनता में अपनी छवि ईमानदार नेता की बना ली थी। अमरीकी पृष्ठभूमि के रवि लामिछाने का रुख भारत के प्रति कैसा होता है यह देखना दिलचस्प होगा। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता अमरेश सिंह ने चुनाव परिणाम में पार्टी की बढ़त के बीच काठमांडू में मीडिया के सवालों के जवाब में साफ कहा कि भारत से मधुर संबंध को लेकर कोई कन्फ्यूजन नहीं है। उसे साथ लेकर नेपाल को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन बालेन शाह तो चीन के खिलाफ हैं लेकिन भारत के प्रति उनके रुख को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है क्योंकि बतौर मेयर उनका अपने कक्ष में ग्रेटर नेपाल का लगाया मानचित्र भारत को खटकता रहा क्योंकि इस नक्शे में भारत के कई इलाकों को नेपाली भू-क्षेत्र दर्शाया गया है। खैर तब वे मेयर थे अब वे एक ऐसे राष्ट्र के प्रधानमंत्री होने जा रहे हैं जिसका संबंध भारत से केवल खानापूर्ति जैसा नहीं है, दोनों के बीच रोटी-बेटी का सदियों पुराना नाता है ही, दोनों देश भौगोलिक, रीत रिवाज और सांस्कृतिक सभ्यता की दृष्टिकोण से भी एक दूसरे से जुड़े हैं।
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भारत नेपाल के संबंधों को नजदीक से जानने वालों द्वारा दोनों देशों के बीच दशकों पुरानी संधियों और समझौते की पुनर्समीक्षा की आशंका जताई जा रही है। फिलहाल नेपाल की संभावित बालेन सरकार इसे लेकर शायद ही कोई जल्दबाजी दिखाएं। माना कि वे राजनीति के मजे मजाए खिलाड़ी न हों लेकिन एक उच्च शिक्षित शख्सियत तो हैं ही। वेशक वे नेपाल के अबतक के इतिहास में सबसे कम उम्र (35 वर्ष) के प्रधानमंत्री होने जा रहे हैं लेकिन यह उनके सरकार चलाने में आड़े आए, ऐसी सोच ठीक नहीं है।
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बालेन शाह से नेपाल के युवाओं और महिलाओं को काफी उम्मीदें हैं। वे जेन-जी आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे। आज उनकी इस बात को लेकर तारीफ हो रही है कि जो शख्स नेपाल के दुश्वारियों को भांप कर सरकार अपदस्थ करने का माद्दा रखता हो, उसके सरकार चलाने में किसी संशय की गुंजाइश नहीं है। ऐसे चुनाव परिणाम की आशा विपक्षी दलों को नहीं थी। पुरानी कोई भी पार्टी विपक्ष के लायक भी सीटें जीतने की स्थिति में नहीं आ पाई। इसी चुनाव में नेपाली कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष गगन थापा की भी परीक्षा हो गई। आज सबसे बुरे दौर में नेपाली कांग्रेस आ खड़ी हुई है। दुर्गति की बात करें इस चुनाव में कोई ऐसी पार्टी नहीं बची जो बालेन शाह और रवि लामिछाने की सुनामी में तिनके की तरह न बही हो। बालेन शाह के नेतृत्व में बनने जा रही नेपाल की पूर्ण बहुमत की सरकार के काम काज के तरीकों पर दुनिया की नजर रहना स्वाभाविक है। इस पार्टी के दो प्रमुख चेहरे बालेन शाह और रवि लामिछाने की कोई लंबी राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। बालेन शाह इंजीनियर और रैपर रहे हैं जबकि रवि लामि छाने की शिनाख्त एक पत्रकार की रही है। 2022 के चुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का गठन किया, चुनाव लड़ें और 20 सीटों पर धमाकेदार जीत दर्ज की। बालेन शाह काठमांडू के युवाओं में खासा लोकप्रिय थे, निर्दल मेयर का चुनाव लड़े और काठमांडू का मेयर बन गए। एक मेयर से नेपाल का प्रधानमंत्री बनने जा रहे बालेन शाह का जन्म एक साधरण शिक्षक परिवार में हुआ था। पढ़ाई इस स्तर की थी कि वे दो चार लाख रुपए महीने की नौकरी कर अच्छा जीवन बिता सकते थे लेकिन उन्हें सनक थी संपूर्ण नेपाल के जीवन शैली सुधारने की। नेपाली जनता ने उन्हें यह मौका दे दिया है। अब नेपाल को तरक्की की ओर ले जाने की जिम्मेदारी उनकी है।
