पंडित ध्रुव चंद्र त्रिपाठी
नाथनगर। अरे जनाब, वक्त-वक्त की बात है। एक जमाना था जब पाकिस्तान राष्ट्रीय क्रिकेट टीम मैदान में उतरती थी तो बल्लेबाजों के हेलमेट के स्क्रू अपने-आप कसने लगते थे। वसीम अकरम की सुई की नोक वाली स्विंग, वकार यूनुस की उंगलियां चटकाने वाली यॉर्कर और शोएब अख्तर… भाई साहब! वो तो रावलपिंडी एक्सप्रेस नहीं, साक्षात यमराज की बुलेट ट्रेन थे। बल्लेबाज क्रीज पर गार्ड लेने से पहले वसीयत लिखने की मानसिक तैयारी करते थे। जहाँ दुनिया रफ्तार की दीवानी है, वहाँ पाकिस्तान इश्क-ए-स्पिन लड़ा रहा है।
अब बस डर ये है कि कहीं अगले मैच में विकेटकीपर दस्ताने उतारकर खुद ही अंडर-आर्म गेंद न फेंकने लगे और अंपायर चाय का कप पकड़कर कहे: “खेल भावना बनाए रखें, स्नैक्स ब्रेक के बाद मैच जारी रहेगा। तब का नजारा सोच के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गेंद हवा चीरती थी, स्टंप हवा में उड़ते थे और कमेंटेटर की आवाज़ में डर और रोमांच का मिला जुला राष्ट्र सम्मेलन चल रहा होता था। पर आज का दौर देखिए! लगता है पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने ग्रीन रिवॉल्यूशन को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है। जो टीम कभी 150 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से गिल्लियां उड़ाती थी, वही अब मैदान में कछुआ-चाल वाली स्पिन लेकर उतर रही है।
बल्लेबाज सोचता है कि सामने से आग उगलता हुआ गोला आएगा। पर आता है कोई चाचा-भतीजा टाइप गेंदबाज और गेंद को लड्डू की तरह हवा में उछाल देता है। ऐसा लगता है मानो गेंदबाज कह रहा हो, “भाई जान, पेस-वेस में क्या रखा है? थोड़ा रुकिए, थोड़ा ठहरिए… गेंद को टप्पा खाने दीजिए… फिर आराम से चाय-बिस्किट के साथ खेलिए। लगता है शोएब अख्तर के फेंटा-युग से निकलकर टीम अब फिरकी-योग में प्रवेश कर चुकी है। शायद बोर्ड ने सोचा होगा। पेट्रोल महंगा हो गया है, तेज गेंदबाजों के रन-अप में ज्यादा फ्यूल लगता है। स्पिनर तो खड़े-खड़े गेंद डाल देते हैं, माइलेज भी बढ़िया और पर्यावरण भी सुरक्षित।
