ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले से आई यह खबर सिर्फ एक प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक आईना है। एक छोटी सी आंगनवाड़ी, जहां बच्चों की किलकारियां गूंजनी चाहिए थीं, वहां पिछले तीन महीनों से सन्नाटा पसरा है। वजह है एक युवती की नियुक्ति, जिसे कुछ लोगों ने जातिगत आधार पर स्वीकार नहीं किया। इस फैसले का असर सबसे ज्यादा उन मासूम बच्चों पर पड़ा है, जिनकी पढ़ाई और पोषण दोनों रुक गए हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक भेदभाव की कीमत मासूम भविष्य चुकाते रहेंगे?
ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले से एक चिंताजनक मामला सामने आया है, जिसने सामाजिक समानता और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनगर ब्लॉक की घड़ियामाला ग्राम पंचायत स्थित नुआगांव आंगनवाड़ी केंद्र पिछले करीब तीन महीनों से ठप पड़ा है।
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बताया जा रहा है कि चार महीने पहले प्रशासन ने ग्रेजुएट सरमिस्ता सेठी को आंगनवाड़ी हेल्पर के रूप में नियुक्त किया था। उनकी नियुक्ति के बाद गांव की एक कमेटी ने इसका विरोध शुरू कर दिया। आरोप है कि कमेटी के कुछ सदस्यों ने जातिगत आधार पर आपत्ति जताई और अभिभावकों से बच्चों को केंद्र न भेजने की अपील की। इसके बाद कई माता-पिता ने अपने बच्चों को आंगनवाड़ी भेजना बंद कर दिया, जिससे केंद्र की गतिविधियां रुक गईं। इस केंद्र से जुड़े लगभग 60 बच्चों की पढ़ाई और पोषण सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।
जिला प्रशासन का कहना है कि मामले को सुलझाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन अब तक स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है। यह घटना सामाजिक भेदभाव और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी को उजागर करती है।
