यौन इच्छा और पुरुष चरित्र: स्टीफन हॉकिंग के जीवन से एक गहरा विश्लेषण

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  • सौ परसेंट पैरालाइज्ड हो जाने के बाद भी यौन इच्छा जीवित रहती है,
  • स्टीफन हॉकिंग की यह तस्वीर पुरुष मनोविज्ञान का एक अकाट्य प्रमाण है,

रंजन कुमार सिंह

यह स्टीफन हॉकिंग हैं, जिनका जन्म 8 जनवरी 1942 को ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में हुआ था। उन्हें आधुनिक दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक माना जाता है। वे एक अंग्रेज़ सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी, ब्रह्मांड विज्ञानी, लेखक और विचारक थे, जिन्होंने ब्रह्मांड की उत्पत्ति, ब्लैक होल और समय की प्रकृति पर क्रांतिकारी काम किया। उन्होंने ईश्वर के पारंपरिक रूप को नकारा और स्पष्ट कहा कि वे ईश्वर में विश्वास नहीं करते। अपनी पुस्तक ‘The Grand Design’ (2010) में उन्होंने लिखा कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के लिए ईश्वर की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण और प्राकृतिक नियमों के कारण ब्रह्मांड स्वतः बन सकता है। उन्होंने ‘हॉकिंग रेडिएशन’ की खोज की और ‘A Brief History of Time’ लिखी, जो दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में बिकी।

बीमारी और शारीरिक अक्षमता का संघर्ष

स्टीफन हॉकिंग जब मात्र 21 वर्ष के थे, तभी उन्हें ‘मोटर न्यूरॉन डिजीज’ (ALS) नामक गंभीर बीमारी हो गई, जो धीरे-धीरे शरीर को लकवाग्रस्त कर देती है। इस बीमारी ने उनकी सभी स्वैच्छिक मांसपेशियों (Voluntary Muscles) को प्रभावित किया और 1980 के बाद वे लगभग 100% पैरालाइज्ड हो गए थे। उनके केवल एक हाथ की कुछ उंगलियाँ काम करती थीं, और बाद में जब उन्होंने भी काम करना बंद कर दिया, तब वे चेहरे की मांसपेशियों और आँखों की हल्की हरकत से कंप्यूटर नियंत्रित करते थे। उनकी आवाज़ एक स्पीच सिंथेसाइजर से आती थी और अंततः वे पूरी तरह एक अत्याधुनिक व्हीलचेयर पर ही जीवन व्यतीत करते थे।

मस्तिष्क का विज्ञान: जहाँ इच्छाएं कभी नहीं मरतीं

कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्णतः (100%) पैरालाइज होने के बाद, जब केवल आँखों की पुतलियाँ और चेहरे की कुछ नसें ही हिल पा रही हों, ऐसी स्थिति में आने के 26 वर्ष बाद भी उनकी यौन इच्छा जीवित थी। यही मर्द का असली जैविक चरित्र है। आधुनिक न्यूरोसाइंस के अनुसार, यौन इच्छा का मुख्य केंद्र जननांग नहीं, बल्कि मस्तिष्क का ‘हाइपोथैलेमस’ (Hypothalamus) हिस्सा होता है। हॉकिंग का उदाहरण यह सिद्ध करता है कि भले ही बीमारी ने शरीर का संपर्क मस्तिष्क से काट दिया था, लेकिन उनके मस्तिष्क के ‘प्लेजर सेंटर्स’ (Pleasure Centers) पूरी तरह सक्रिय थे। यह स्पष्ट करता है कि पुरुष का आकर्षण शारीरिक क्षमता पर नहीं, बल्कि उसकी मानसिक चेतना और दृश्य संवेदना (Visual Stimulation) पर निर्भर करता है। पुरुष मस्तिष्क ‘देखकर’ उत्तेजित होने के प्रति जैविक रूप से अधिक संवेदनशील होता है। यह चित्र मार्च 2006 का है, जो जेफरी एपस्टीन के प्राइवेट कैरिबियन आइलैंड पर लिया गया था, जब स्टीफन हॉकिंग वहां एक साइंस कॉन्फ्रेंस के लिए गए थे। यौन विकृत मानसिकता इंसान के मस्तिष्क में होती है। उसका कोई भी अंग भले ही काम न करे, यदि मस्तिष्क स्वस्थ है, तो उसके भीतर यौन इच्छा जीवित रहती है, जिसे वह आँखों से देखकर, कल्पना करके और किसी स्त्री को अपने समीप महसूस करके संतुष्ट करता है।

धार्मिक व्यवस्था: एक अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा कवच

इसी व्यापक पुरुष चरित्र को समझकर हर धर्म में महिलाओं के पहनावे और समाज में व्यवहार की व्यवस्था बनाई गई है। एथिस्ट (नास्तिक) लोगों की धर्म से समस्या इन्हीं निर्धारित व्यवस्थाओं के कारण है। जैसे इस्लाम में शराब पीना हराम है, तो जावेद अख्तर ने इस्लाम को नकार दिया; वैसे ही हिंदू–नास्तिक उस धर्म की व्यवस्था से असहज हुए तो उसे नकार दिया। लेकिन ये नियम केवल पाबंदियां नहीं, बल्कि पुरुष की उस ‘दृश्य-उत्तेजना’ को नियंत्रित करने के वैज्ञानिक तरीके थे। हिंदू धर्म में भी गैर-पुरुषों से दूरी की बात कही गई है। ऋग्वेद (8.33.19) के एक मंत्र में भी लज्जाशीलता और वस्त्र से शरीर ढकने का स्पष्ट उल्लेख है: अ॒धः प॑श्यस्व॒ मोपरि॑ संत॒रां पा॒दकौ॑ ह॑र। मा ते॑ कशप्ल॒कौ दृ॑श॒न्त्स्त्री हि ब्र॒ह्मा ब॒भूवि॑थ। अर्थात: “नीचे देखो, ऊपर मत देखो। लज्जाशील रहो और आँखें न उठाओ। पैरों को निकट रखो और चाल-ढाल संयत रखो। तुम्हारे शरीर का निचला भाग किसी को न दिखे।” यह उपदेश स्त्री की गरिमा और पुरुष की विचलित होने वाली दृष्टि, दोनों को नियंत्रित करने के लिए है। आज भी कोई कितना भी आधुनिक क्यों न हो, महिलाएँ गैर-पुरुषों के साथ अकेले जाने से बचती हैं, जो इसी प्राचीन सुरक्षा बोध का प्रमाण है।

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इस्लाम और मनोवैज्ञानिक मर्यादा

पैगंबर हज़रत मुहम्मद ने फरमाया है: “जब कोई औरत और मर्द अकेले होते हैं, तो वहां तीसरा शैतान होता है” (सहीह बुखारी)। यहाँ ‘शैतान’ का अर्थ उस अनियंत्रित जैविक उत्तेजना से है जो एकांत में सक्रिय हो जाती है। पुरुष की इसी मानसिकता के कारण इस्लाम में ‘गैर-महरम’ से दूरी और हिजाब की सख्त व्यवस्था है। कुरान (सूरह नूर 24:30-31) में मोमिन मर्दों और औरतों, दोनों को अपनी निगाहें नीची रखने का हुक्म दिया गया है। गैर-महरम पुरुष के साथ हंसी-मजाक, फ्लर्टिंग या एकांत (जैसे घर, कमरा या कार) में रहना वर्जित है, क्योंकि पुरुष का मस्तिष्क अपनी इंद्रियों से कहीं न कहीं यौन ऊर्जा प्राप्त करता रहता है। नोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि स्त्री के जिस्म की सुगंध या उसकी आवाज़ का उतार-चढ़ाव भी पुरुष के अवचेतन मन में उत्तेजना पैदा करने के लिए पर्याप्त होता है। इसीलिए आवाज़ को लुभावना बनाने के बजाय सामान्य रखने का निर्देश दिया गया है।

निष्कर्ष: आधुनिकता बनाम जैविक वास्तविकता

आज का तथाकथित ‘प्रगतिशील’ समाज इन नियमों को ‘दकियानूसी’ कह सकता है, लेकिन स्टीफन हॉकिंग का यह चित्र सिद्ध करता है कि पुरुष का मूल जैविक चरित्र कभी नहीं बदलता। जब तक मस्तिष्क सक्रिय है, यौन इच्छा जीवित रहती है। जिसे लोग पाबंदी समझते हैं, वह असल में समाज को ‘मानसिक विकृति’ और ‘नैतिक पतन’ से बचाने का एक सुरक्षा तंत्र (Safety Mechanism) है। इतिहास गवाह है कि जिन सभ्यताओं ने इन सीमाओं को तोड़ा, वहां यौन अपराधों और सामाजिक बिखराव की दर सबसे अधिक रही। विज्ञान हमें यह बताता है कि हम ‘क्या’ हैं (Biological creatures), लेकिन धर्म और परंपराएं हमें यह सिखाती हैं कि उस वास्तविकता को मर्यादित कर एक सभ्य समाज ‘कैसे’ बनाया जाए। हॉकिंग की व्हीलचेयर पर बैठी वह तस्वीर किसी की व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं, बल्कि पूरे पुरुष मनोविज्ञान का एक अकाट्य प्रमाण है। गैर-महरम अर्थात सगा बाप, भाई, दादा-नाना, बेटा, चाचा और मामा के अतिरिक्त सभी पुरुष। उपरोक्त लेख का उद्देश्य किसी भी महापुरुष या वैज्ञानिक की उपलब्धियों को कमतर दिखाना या उनका अपमान करना कतई नहीं है। स्टीफन हॉकिंग आधुनिक विज्ञान के शिखर पुरुष हैं और उनका योगदान अतुलनीय है। यहाँ उनके जीवन के एक विशेष संदर्भ का उपयोग केवल मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) और जैविक प्रवृत्तियों (Biological Instincts) के विश्लेषण के लिए किया गया है। यह विश्लेषण इस बात पर केंद्रित है कि मानवीय स्वभाव और इंद्रियों की इच्छाएं बौद्धिक स्तर या शारीरिक स्थिति से परे कैसे कार्य करती हैं। लेख का उद्देश्य सामाजिक मर्यादाओं के वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व को तार्किक रूप से स्पष्ट करना है।”

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