जब मां को बेटियों ने कंधा दिया, तो समाज ने क्यों फेर लिया मुंह?

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नया लुक डेस्क

मढ़ौरा/सारण। यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता का ऐसा आईना है, जिसमें हर किसी को खुद का चेहरा देखने की जरूरत है। छपरा जिले के मढ़ौरा प्रखंड स्थित जवईनियां गांव में मां की मौत के बाद दो बेटियों को न सिर्फ अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी अकेले उठानी पड़ी, बल्कि अब वे मां के श्राद्ध कर्म के लिए भी समाज से मदद की गुहार लगा रही हैं।

मां के जाने के बाद पूरी तरह अकेला पड़ गया परिवार

गांव निवासी स्वर्गीय रविन्द्र सिंह की पत्नी बबीता देवी का 20 जनवरी को पटना में इलाज के दौरान निधन हो गया। इससे करीब डेढ़ साल पहले परिवार के मुखिया रविन्द्र सिंह का भी देहांत हो चुका था। पिता के जाने के बाद से ही परिवार आर्थिक संकट में डूब गया था, लेकिन किसी तरह जीवन चल रहा था। मां की मौत ने दोनों बेटियों को पूरी तरह बेसहारा कर दिया।

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घंटों दरवाजे पर पड़ा रहा शव, कोई कंधा देने नहीं आया

अंतिम संस्कार का दृश्य गांव की सामूहिक जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया। मां का शव घंटों घर के बाहर रखा रहा, लेकिन अर्थी उठाने के लिए कोई आगे नहीं आया। दोनों बेटियां गांव की गलियों में हाथ जोड़कर लोगों से विनती करती रहीं, मगर अधिकतर ने मुंह फेर लिया। काफी देर बाद दो-तीन लोग पहुंचे, तब कहीं जाकर अंतिम संस्कार संभव हो सका।

इलाज में खत्म हो गई जमा पूंजी, अब श्राद्ध के लिए भी नहीं पैसे

मुखाग्नि देने वाली बेटी मौसम सिंह बताती हैं कि मां के इलाज में परिवार की बची-खुची पूंजी भी खत्म हो चुकी है। अब हालात ऐसे हैं कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि “हम मां को तो विदा कर पाए, लेकिन अब उसका श्राद्ध कैसे करें, यह समझ नहीं आ रहा। न पैसे हैं, न कोई सहारा।

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परंपरा और मजबूरी के बीच फंसी बेटियां

आज भी कई जगहों पर समाज बेटियों द्वारा क्रिया-कर्म और श्राद्ध को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता। ऐसे में दोनों बहनें सामाजिक सोच और आर्थिक तंगी के बीच संघर्ष कर रही हैं। उनकी बस यही अपील है कि कोई आगे बढ़कर श्राद्ध संस्कार में सहयोग कर दे, ताकि मां की आत्मा को शांति मिल सके।

समाज से उठता बड़ा सवाल

यह घटना केवल गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच पर करारा तमाचा है जहां जरूरत के वक्त गरीब को अकेला छोड़ दिया जाता है। जब बेटियां मां को कंधा दे सकती हैं, मुखाग्नि दे सकती हैं, तो क्या समाज उनके दुख में थोड़ा सा साथ नहीं दे सकता।

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