राजधानी में डाक व्यवस्था बेपटरी, लखनऊ GPO बना लापरवाही का प्रतीक

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राजधानी 2000 से अधिक मेल बैग खुले में पड़े, शीर्ष अधिकारी अब भी मौन

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित जनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) इन दिनों डाक व्यवस्था की बदहाली की गंभीर तस्वीर पेश कर रहा है। GPO परिसर में 2000 से अधिक मेल बैग खुले आसमान के नीचे पड़े होने की जानकारी सामने आई है। इन बैगों में लाखों नागरिकों से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़, सरकारी पत्राचार, बैंकिंग काग़ज़ात और न्यायिक नोटिस होने की आशंका जताई जा रही है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि डाक विभाग की विश्वसनीयता पर भी गहरा सवाल खड़ा करती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतने गंभीर मामले पर उत्तर प्रदेश परिमंडल के मुख्य पोस्टमास्टर जनरल प्रणव कुमार और पोस्टमास्टर जनरल सुनील कुमार राय की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न तो कोई जांच के आदेश दिए गए हैं और न ही सुधारात्मक कदमों की घोषणा हुई है।

खुले में पड़ी चिट्ठियाँ, खतरे में नागरिकों का भविष्य
डाक विभाग दशकों से आम जनता के भरोसे का माध्यम रहा है। लेकिन लखनऊ GPO में खुले में रखे मेल बैग इस भरोसे को धूल, बारिश और लापरवाही के हवाले कर रहे हैं। इन बैगों में आधार कार्ड, पहचान पत्र, बैंक और बीमा से जुड़े दस्तावेज़, कोर्ट नोटिस, पेंशन व छात्रवृत्ति से संबंधित पत्र और निजी पत्राचार होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में यदि किसी भी दस्तावेज़ का दुरुपयोग होता है या वह नष्ट होता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा—यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है।

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राजधानी का हाल, तो ज़िलों की कल्पना डरावनी
लखनऊ, जहां से पूरे प्रदेश की प्रशासनिक नीतियाँ संचालित होती हैं, यदि वहीं डाक व्यवस्था इस हाल में है, तो ज़िला और ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल है। यह कोई छोटा उपडाकघर नहीं, बल्कि प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण GPO है। इसके बावजूद न तो मेल स्टोरेज की पर्याप्त व्यवस्था है, न सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम और न ही प्रभावी निगरानी प्रणाली।

डिजिटल इंडिया के दावों पर सवाल
एक ओर देश डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आज भी करोड़ों नागरिक अदालतों, बैंकों और सरकारी कामकाज के लिए डाक व्यवस्था पर निर्भर हैं। ऐसे में डाक सामग्री का खुले में पड़ा होना न्याय व्यवस्था, वित्तीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

जवाबदेही तय होगी या नहीं?
यदि किसी व्यक्ति को कोर्ट का नोटिस समय पर नहीं मिला, किसी बुजुर्ग की पेंशन से जुड़ा पत्र गुम हो गया या किसी छात्र की छात्रवृत्ति अटक गई, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या शीर्ष अधिकारी सामने आकर जवाब देंगे या फिर मामला जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

लखनऊ GPO में खुले में पड़े हजारों मेल बैग केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के फेल होने की चेतावनी हैं। डाक बैग सिर्फ थैलियाँ नहीं होते, उनमें आम नागरिकों का भरोसा बंद होता है। यदि समय रहते जिम्मेदारी तय नहीं हुई और व्यवस्था में ठोस सुधार नहीं किया गया, तो यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जनभावनाओं का बड़ा सवाल बन जाएगा।

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