
राजेश श्रीवास्तव
Ram Mandir 2024 में जब राम मंदिर भक्तों के लिए खुल गया तो लगा कि बस इस अध्याय का अंत हो गया है, लेकिन मौजूदा घटना एक बार फिर राम मंदिर को सुर्खियों में ले आया और चंपत राय इन सुर्खियों के केंद्र में आ गये। करोड़ों की आस्था, लाखों का रोज दान और इस दान पर चोरों की नजर लग गई। राम मंदिर दान में चोरी पहले इनकार की जा रही थी लेकिन अब साबित हो गई, पैसे बरामद हो गए, FIR हो गई, इस्तीफ़े हो गए, लेकिन राम मंदिर दान की कहानी और किरदार अभी भी बहस का मुद्दा बने हुए हैं।
मर्यादा पुरुषोत्तम की सेवा में लगे लोगों पर चोरी का आरोप लगे तो करोड़ों लोगों की आस्था, भरोसा और इत्मिनान को धक्का लगना ही था। बात सिर्फ चोरी की नहीं थी। भगवान के घर चोरी की थी और वो भी तब जब मंदिर बनाने के लिए कुर्बानियां हर स्तर पर दी गईं। अब सवाल भी हर कोने से पूछे जा रहे हैं। सवाल चोरी करने वालों पर उठे। सवाल उन पर भी उठे जो इन चोरों को खजाने तक लाए थे। इन नामों में सबसे बड़ा नाम चंपत राय बंसल का है। राम मंदिर आंदोलन, राम मंदिर निर्माण और राम मंदिर ट्रस्ट के काम से जुड़े चंपत राय के बेहद करीबी लोग ही वो थे जो दान पैसा चुरा रहे थे। उसे छुपा रहे थे, दान को खपा रहे थे, चंपत राय की नाक के नीचे ये काम हो रहा था। सबसे बड़ा और गहरा सवालिया निशान इसी चेहरे पर लगना लाजमी था। चंपत राय पर खुद पैसा चुराने का आरोप नहीं है, लेकिन उनके खास लोगों पर इसका आरोप है। उन्हें गिरफ्तार किया गया है तो उंगलियां उठीं। उंगलियां उठीं तो चंपत राय की बरसों की बनी साख जल कर खाक हो गई।
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सवाल उठे कि चंपत राय की नाक के नीचे चोरी हुई या उनकी रजामंदी से, चंपत राय चालाकी से केस छुपाना चाहते थे या चोरी सामने आने पर उन्होंने लापरवाही की, क्योंकि FIR जब तक हुई, तब तक राम भक्तों के दान में सेंध घर घर की खबर और चिता बन चुका था। राम मंदिर में चोरी की क्रोनोलॉजी को समझिये। 7 जून को सपा नेता पवन पांडेय ने तो 8 जून को अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को उछाला तो मामले ने गर्मी पकड़ी। राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े लोग बार बार कह रहे थे कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। चंपत राय ने भी यही कहा कि कोई भी ऐसी बात इंटरनल ऑडिट में सामने नहीं आई है, जिसे उल्लेखनीय समझा जा सके। बचाव में बीजेपी भी उतरी। लड़ाई सच झूठ से ज्यादा राजनैतिक स्कोर की होती नजर आई। बीजेपी ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव झूठ बोल रहे हैं जिसका खामियाजा 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें उठाना होगा।
जब इस तरह की खबरें आने लगीं कि सब कुछ ठीक नहीं है तो यूपी सरकार ने 14 जून को तीन सदस्यीय विशेष जांच दल यानी एसआईटी बना दी, जो अगले ही दिन अयोध्या पहुंच गई और तीन दिन यानी 18 जून तक जांच करती रही। 23 जून को एसआईटी ने शुरूआती रिपोर्ट दी, जिसकी बुनियाद पर ही 25 जून चढ़ावा चोरी में FIR दर्ज की गई, जिस चोरी को चंपत राय सिरे से नकार रहे थे। उसी चोरी में केस दर्ज हो गया।
इसमें नाम ऐसे लोगों का था जिनसे चंपत घिरे रहते थे। राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू चंपत राय का ड्राइवर था। इसके अलावा अनुकल्प मिश्रा, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, लवकुश मिश्रा, रमा शंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और मनीष यादव हिरासत में हैं। इन सभी को सीधे या परोक्ष चंपत राय की सिफारिश पर ही राम मंदिर में नौकरी मिली थी। ये सब राम भक्तों से मिलने वाला चंदा गिनने का काम करते थे। चोरी यहीं की जाती थी। इसी के चलते चंपत राय विवादों में हैं। राम मंदिर में दान की चोरी, सिर्फ हाथ की सफाई थी या एक संगठित अपराध। जांच और राजनीति इसी बात के इर्द गिर्द है कि कैसे केमिस्ट्री का एक टीचर राम मंदिर केस का रिकॉर्ड कीपर बन गया। बिजनौर के धामपुर में आरएसएम डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री के प्रोफ़ेसर चंपत राय बंसल को 1977 में गिरफ्तार किया गया था लेकिन तब इमरजेंसी के आंदोलन की वजह से। वह दूसरे संघ कार्यकर्ताओं की तरह 18 महीने जेल में रहे। जब चंपत इमरजेंसी के बाद रिहा हुए। विश्व हिदू परिषद में चले गए, जहां वो वीएचपी के अध्यक्ष अशोक सिघल के करीब आ गए।
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चंपत को राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के लिए अवध इलाके में युवाओं को तैयार करने का काम दिया गया। चंपत को अयोध्या की हर गली, हर दलील और तारीख मुंह जबानी याद थी और ये तब और अहम हो गया जब मामला तेज से अदालतों में चलने लगा। वकील तारीखों, और डाटा के लिए चंपत राय की मदद लेने लगे। चंपत को नाम मिल गया, राम लला के रिकॉर्ड कीपर का। बीजेपी ने जब राम मंदिर आंदोलन को अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल कर लिया तो चंपत बीजेपी की एक नहीं कई पीढ़ियों के नेताओं के करीब आ गए। विवादित ढांचा 6 दिसंबर 1992 को गिरा तो चंपत का नाम साजिशकर्ताओं में शामिल किया गया, लेकिन सितंबर 2020 को सीबीआई अदालत ने उनके समेत सभी नेताओं को बरी कर दिया। चंपत अयोध्या के कारसेवक पुरम में ही रह कर ट्रस्ट का काम देख रहे थे। आरोप लगाया गया है कि इस दौरान उन्होंने मनमर्जी से लोगों को नौकरियां दीं, जिनमें से कुछ लोगों ने लोगों के दान पर हाथ साफ कर दिया। चंपत ने शुरुआत में ही इस विवाद को दबाने की कोशिश की।
बीजेपी के विरोधियों को ये केस विधानसभा चुनाव से एक साल पहले किसी सुनहरे मौके जैसा लग रहा है। खासतौर पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को, इन दोनों पार्टियों को राम मंदिर और हिदू राजनीति के मुद्दों पर असहज ही होना पड़ता है, लेकिन अब जैसे उन्हें बीजेपी पर निशाना साधने का मौका मिल गया। बीजेपी के लिए राम मंदिर आजादी के बाद सबसे सफल आंदोलन रहा। बीजेपी के राजनीतिक सफर में इस आंदोलन से ही सत्ता के सफर की बुनियाद पड़ी थी। बार बार सवाल उठना, लांछन लगना, जवाब ना मिलना, उन वोटरों के दिलों को कचोट रहा है, जिन्होंने तन-मन और धन से बीजेपी को जिताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अगर इन वोटरों के दिल में सवाल घर कर गए तो पार्टी को राजनीतिक नुकसान होने की आशंका है। चंपत राय जिस विवाद में पूरी तरह घिर गए हैं। उसकी लपट राष्ट्रीय स्तर पर अखिलेश के सोशल मीडिया पोस्ट से ही शुरू हुई थी। इसी मुद्दे पर फिर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीएसपी भी आगे आए। राजनीतिक रूप से धीरे-धीरे ये एक अनौपचारिक गठबंधन जैसा लग रहा है जिससे सीधे लड़ना बीजेपी के लिए थोड़ा पेचीदा लग रहा है।
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मुद्दा सिर्फ अयोध्या और राम मंदिर प्रशासन नहीं है। इससे जुड़ा है करोड़ों हिदुओं की आस्था का सवाल है, जिसकी अगली कड़ी मानी जा रही थी काशी और मथुरा। काशी और मथुरा दोनों मामले अदालत में हैं। फिर भी इनका भावनात्मक मूल्य है। ये भावनाएं चुनावी माहौल में मुद्रा का काम कर सकती हैं, जो एक पक्ष के लिए सत्ता की सीढ़ी हो सकती हैं तो दूसरे पक्ष के लिए खोटा सिक्का, राम मंदिर में दान चोरी हुआ तो ये सीधा उस राम राज्य की अवधारणा पर भी चोट है, जिसके सपने चुनावी भाषणों में दिखाए जाते हैं, जिसके किस्से दादा-दादी की कहानियों में है। अगर अयोध्या में ही चोरी हो रही है तो क्या इस चोरी के सिरे दूर दूर तक हैं या ये सिर्फ कुछ स्थानीय बेईमानों का काम था। चोरी कुछ लाख की हो या करोड़ों की। सोने की शिलाओं की हो या चांदी के काक भुशुंडी की, चोरी तो चोरी है। राम राज में करोड़ों की आस्था है। राम मंदिर में चोरी अपराध भी है और पाप भी। राम में लोगों की आस्था सदियों से अटूट है। भगवान राम या राम मंदिर पर आस्था ठोस है, लेकिन दान में चोरी का कलंक धोना आसान नहीं होगा। चंपत जिदगी के सारे पड़ावों पर राम भक्त के तौर पर दिखे, लेकिन जीवन के इस मोड़ पर उनके फैसले पुरानी हर मेहनत पर पानी फ़ेर गए।
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