दो टूक: दावोस में यूपी के अधिकारियों ने अपनी ही सरकार को धोखो में रखा

राजेश श्रीवास्तव

ट्रंप की ‘दादागिरी’ और चीन की चालबाजी के बीच भारत ने दावोस में अपना ‘बड़ा दांव’ खेलने का संदेश दिया था। भारत से यूपी-गुजरात समेत 10 राज्य विदेशी निवेशकों को लुभाने स्विट्जरलैंड पहुंचे थें। उन्हें उम्मीद थी कि विदेशी निवेशकों के बहाने भारत दुनिया को एक बड़ा संदेश देगा। मिशन साफ था चीन से मोहभंग कर चुकी ग्लोबल कंपनियों का ‘मोटा पैसा’ और फैक्ट्रियां भारत लाना। लेकिन इस ‘मिशन दावोस’ से आपकी जेब और नौकरी पर क्या असर पड़ा? क्या उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपनी कोशिशों में कामयाब हो सके। क्या यूपी या अन्य राज्यों को विदेशी निवेशक मिल सके, यह इन दिनों बड़ा सवाल है लेकिन सरकार की चकाचौंध में यह सवाल खो सा गया है बल्कि यूं कहें कि तमाम मीडिया हाऊस तो सरकार के गुणगान में लगे हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने वहां हजारों करोड़ रुपये का निवेश कर लिया। कुछ प्रमुख कंपनियों के साथ 9750 करोड़ रुपये का यूपी सरकार के साथ करार किया गया। बात आगे बढ़े इससे पहले यह समझना होगा कि दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में विदेशी निवेशकों को अपने-अपने प्रदेशों या देशों में लाने के लिए राज्य या दुनिया भर के देश जाते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने इसी बीच ऐसा करतब दिखा दिया कि लोग दांतों तले उंगलिया दबाये हैं।

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दावोस में हो रही यह बैठक ऐसे समय में हुई जब पुरानी वैश्विक व्यवस्था चरमरा रही है अब बाजार निष्पक्ष नहीं रहे। व्यापार और तकनीक के फैसले अब सिर्फ मुनाफ़े से नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत से तय हो रहे हैं। चीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सुपरपावर बन रहा है और अमेरिका अपनी मनमर्जी चला रहा है। ऐसे में भारत इस बार दावोस में सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराने नहीं, बल्कि अपनी ताकत दिखाने गया था। भारत का डेलिगेशन अब तक के सबसे बड़े डेलिगेशन में से एक है। केंद्र सरकार के मंत्रियों अश्विनी वैष्णव, प्रह्लाद जोशी और राम मोहन नायडू के साथ-साथ देश के 10 राज्यों के प्रतिनिधि भी वहां मौजूद रहे। आम तौर पर दावोस में देश की बात होती थी, लेकिन इस बार राज्य अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।

कोशिश थी कि उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, केरल, असम, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्य एक ही छत के नीचे ‘इंडिया पवेलियन’ में दुनिया को बताएंगे कि उनके यहां निवेश करना क्यों फायदेमंद है। आंध्र प्रदेश का तो अपना अलग पवेलियन बना था।  हालांकि, तमिलनाडु चुनाव के चलते इस बार नदारद रहा। लेकिन इसी बीच चर्चा यूपी की हो रही कि यूपी में 9750 करोड़ रुपये का एमओयू साइन कर लिया और देश में अपनी क्षमता का डंका बजवा दिया। लेकिन दिलचस्प तो यह है कि उत्तर प्रदेश ने जिन भी कंपनियों के साथ करार किया वह सभी देशी हैं तो आखिर सवाल यह उठता है कि अगर यह कंपनी स्थानीय हैं तो उनको दावोस ले जाकर उनके साथ अनुबंध क्यों किया। उत्तर प्रदेश में संसदीय कार्य एवं वित्त मंत्री सुरेश खन्ना के नेतृत्व में गया प्रतिनिधि ने सील कंपनी यानि कि सुखबीर एग्रो एनर्जी लिमि. के साथ बिजली बनाने का 8000 करोड़è करार किया है। इसके अलावा सिफी टेक लॉजी यानि सत्यम कंप्यूटर जो घोटाले में लंबे समय तक फंसी रही, उसके साथ भी करार किया गया । इसके अलावा नोएडा की एक कंपनी के साथ 1600 करोड़ रुपये का डाटा सेंटर बनाने का करार हुआ। वहीं डिफेंस में यो-माइन के साथ 150 करोड़ का रक्षा करार हुआ। यानि कि इसमें कोई भी कंपनी विदेशी नहीं है। अगर इन सभी के साथ करार करना था तो इन्वेस्टर्स समिट में हो सकता था या फिर वीडियो कांफ्रेंसिंग करके लेकिन फिर उत्तर प्रदेश के अधिकारी कैसे विदेश की सैर सरकारी पैसे से कर पाते, सवाल यह भी तो था।

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उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मंत्री सुरेश खन्ना के साथ आईएएस अधिकारियों में आईडीसी दीपक कुमार, सचिव मुख्यमंत्री अमित सिंह, इन्वेस्ट यूपी के सीईओ विजय किरण आनंद तथा यूपी नेडा के निदेशक इंद्रजीत सिंह भी दावोस गये हैं। कहा गया था कि इस वैश्विक मंच पर उत्तर प्रदेश अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और उद्योग जगत के दिग्गजों के साथ रणनीतिक निवेश अवसरों पर संवाद करेगा और विदेशी कंपनियों के साथ एमओयू करेगा। सवाल यह है कि अगर इन अपने ही अधिकतर जो प्रदेश की ही हैं इनके साथ करार करने जाने के लिए दावोस की क्या जरूरत थी। अगर मुख्यमंत्री और सरकार के दावों पर यकीन करें तो पता लगता है कि उत्तर प्रदेश में बदले माहौल में दुनिया भर के निवेशक आने को तैयार हैं तो फिर दावोस में कोई क्यों नहीं आया। क्यों हम अपने ही प्रदेश की कंपनियों के साथ 9750 करोड़ का करार करके अपनी ही पीठ थपथपा रहे हैं। कहीं यह करार भी इन्वेस्टर्स समिट तो जैसे नहीं हो जायेंगे जो आधो से ज्यादा आज तक शुरू ही नहीं हो सके।

यही कारण है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ भले ही अच्छी दिख रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्राइवेट कंजम्पशन (आम लोगों द्बारा की जाने वाली खरीदारी) अभी भी सुस्त है। निवेश का बड़ा हिस्सा सरकारी खर्च से आ रहा है. अगर बाहर से पैसा और फैक्ट्रियां भारत नहीं आईं, तो रोजगार के नए मौके बनाना मुश्किल होगा। खासकर तब, जब एआई जैसी तकनीकें दुनिया भर में नौकरियों का स्वरूप बदल रही हैं। राज्य सरकारें अगर सीधे विदेशी कंपनियों को अपने यहां फैक्ट्री लगाने और प्रोजेक्ट शुरू करने का न्योता नहीं देंगी, तो इसका सीधा असर स्थानीय रोजगार पर पड़ सकता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट बताती है कि 2026 में सबसे बड़ा खतरा युद्ध या पर्यावरण नहीं, बल्कि ‘जियो-इकोनॉमिक’ टकराव है। यानी देशों के बीच आर्थिक रस्साकशी। ट्रंप की नीतियां और चीन का दबदबा भारत जैसे देशों के लिए चुनौती भी है और मौका भी। चीन ईवी , बैटरी और एआई हार्डवेयर में आगे है, जिससे व्यापार संतुलन बिगड़ रहा है। उस पर अगर अपने देश और प्रदेश के अधिकारी ऐसी बाजीगरी दिखायेंगे तो वह किसको मूर्ख बना रहे हैं, यह समझने की जरूरत है।

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