हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने एक बयान में ‘कालनेमी’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिसके बाद यह नाम चर्चा में आ गया। आम बोलचाल में आज ‘कालनेमी’ शब्द का प्रयोग छल, धोखे और पाखंड के प्रतीक के रूप में किया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कालनेमी कोई काल्पनिक शब्द नहीं, बल्कि रामायण काल का एक प्रसिद्ध मायावी राक्षस था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कालनेमी लंकापति रावण का बेहद चालाक और शक्तिशाली अनुचर था। वह रूप बदलने, भ्रम पैदा करने और लोगों को धोखे में फंसाने की कला में माहिर था। युद्ध के दौरान जब मेघनाद के प्रहार से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब वैद्य सुषेण ने संजीवनी बूटी लाने की सलाह दी। यह जिम्मेदारी हनुमान जी को सौंपी गई।
जब रावण को इस बात का पता चला कि हनुमान जी संजीवनी लेने द्रोणागिरी पर्वत की ओर जा रहे हैं, तो उसने कालनेमी को उनका रास्ता रोकने के लिए भेजा। कालनेमी जानता था कि बल के आधार पर वह हनुमान जी को नहीं रोक सकता, इसलिए उसने छल का सहारा लिया।
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कालनेमी ने रास्ते में अपनी माया से एक सुंदर आश्रम, सरोवर और मंदिर रचा और स्वयं साधु का वेश धारण कर लिया। वह राम-राम का जाप करते हुए बैठ गया, ताकि हनुमान जी को भ्रम हो जाए। जब हनुमान जी वहां पहुंचे तो साधु के रूप में कालनेमी ने उन्हें भोजन और विश्राम का प्रस्ताव दिया, ताकि संजीवनी लाने में देरी हो जाए।
उसने हनुमान जी को सरोवर में स्नान करने के लिए भी कहा। जैसे ही हनुमान जी पानी में उतरे, एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। हनुमान जी ने मगरमच्छ का वध किया, जिसके बाद उसमें से एक सुंदर अप्सरा प्रकट हुई। उसने बताया कि वह श्राप के कारण मगरमच्छ बनी थी और आश्रम में बैठा साधु असल में रावण का भेजा हुआ राक्षस कालनेमी है।
सच्चाई सामने आते ही हनुमान जी ने कालनेमी का वध कर दिया और समय रहते संजीवनी बूटी लेकर लौटे। इसी कथा के कारण कालनेमी को आज भी धोखे, पाखंड और नकली साधुओं का प्रतीक माना जाता है।
