IIT रुड़की ने विकसित की जल साफ करने की नई तकनीक

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नया लुक ब्यूरो

देहरादून। IIT  रुड़की के वैज्ञानिकों ने जल में मौजूद विषैले प्लास्टिक प्रदूषकों को तेज़ी से हटाने के लिए एक अभिनव नैनो-सक्षम तकनीक विकसित की है। यह शोध भारत के सतत विकास लक्ष्यों तथा प्लास्टिक प्रदूषण और जल संदूषण से निपटने के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप है। शोधकर्ताओं ने बहु-पोषक नैनोफॉस्फेट कणों का विकास किया है, जो सूक्ष्म पोषक-भंडार के रूप में कार्य करते हैं। ये कण फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सूक्ष्म धातुओं जैसे आवश्यक तत्वों को धीरे-धीरे और नियंत्रित रूप से उसी स्थान और समय पर मुक्त करते हैं, जब प्रदूषक-विघटन करने वाले जीवाणुओं को उनकी आवश्यकता होती है। एसीएस ईएस एंड टी वॉटर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में यह सिद्ध किया गया है कि ये विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए नैनोफॉस्फेट कण फ़्थेलेट्स जैसे विषैले प्लास्टिक योजकों को कुछ ही घंटों में हटाने में सक्षम हैं। फ़्थेलेट्स प्लास्टिक में लचीलापन और टिकाऊपन बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन ये अंतः स्रावी तंत्र को बाधित करने वाले रसायन हैं, जो नदियों, भूजल और अपशिष्ट जल में आम तौर पर पाए जाते हैं।

यद्यपि कुछ जीवाणु स्वाभाविक रूप से इन रसायनों को विघटित कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में आवश्यक पोषक-तत्वों की कमी के कारण यह प्रक्रिया धीमी या अप्रभावी हो जाती है। पारंपरिक उर्वरकों के प्रयोग से यूट्रोफिकेशन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे जल की गुणवत्ता और अधिक बिगड़ जाती है। इस समस्या के समाधान हेतु विकसित नैनोफॉस्फेट कणों को जब प्रदूषक-विघटन जीवाणु रोडोकोकस जोस्टीआई आरएचए-एक के साथ प्रयोग किया गया, तो साधारण जल में भी बिना किसी अतिरिक्त वृद्धि माध्यम के मात्र तीन घंटों में फ़्थेलेट्स का लगभग पूर्ण निष्कासन संभव हुआ। उल्लेखनीय रूप से, जीवाणु वृद्धि तुरंत प्रारंभ हो गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सूक्ष्मजीव नैनोकणों से पोषक-तत्वों तक सीधे पहुँच बना पा रहे थे।

उन्नत सूक्ष्मदर्शी और स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों से यह भी सामने आया कि जीवाणु नैनोफॉस्फेट कणों पर सक्रिय रूप से उपनिवेश बनाते हैं और पोषक-तत्व ग्रहण करते हुए उन्हें धीरे-धीरे घोलते हैं। इससे पोषक-तत्वों की अचानक अधिकता नहीं होती और सूक्ष्मजीवी चयापचय को निरंतर ऊर्जा मिलती रहती है। यह तकनीक नल जल, नदी जल और कृत्रिम अपशिष्ट जल सहित विभिन्न वास्तविक जल नमूनों में प्रभावी सिद्ध हुई है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह रणनीति जैव-पुनर्स्थापन के क्षेत्र में एक परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकती है, जिससे कम लागत, कम इनपुट और पर्यावरण-अनुकूल समाधान उपलब्ध होंगे। इस शोध के महत्व पर टिप्पणी करते हुए आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने कहा कि यह कार्य वैश्विक सततता चुनौतियों के समाधान हेतु विज्ञान-आधारित नवाचार विकसित करने की आईआईटी रुड़की की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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