ढाका में दिनदहाड़े फायरिंग से दहशत, चुनावी माहौल के बीच छात्र नेता की हत्या

बांग्लादेश में राजनीतिक तनाव एक बार फिर हिंसक रूप में सामने आया है। राजधानी ढाका में अज्ञात हमलावरों ने छात्र राजनीति से जुड़े नेता अजीजुर रहमान मुसब्बिर की गोली मारकर हत्या कर दी। यह घटना उस वक्त हुई है, जब देश में आम चुनाव से पहले आचार संहिता लागू है और सुरक्षा को लेकर सरकार के दावे सवालों के घेरे में हैं।

पुलिस के मुताबिक, यह वारदात ढाका के कारवान बाजार इलाके में हुई, जो एक व्यस्त कमर्शियल ज़ोन माना जाता है। बसुंधरा सिटी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और सुपर स्टार होटल के आसपास अचानक गोलियों की आवाज़ से अफरा-तफरी मच गई। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमलावरों ने बेहद नजदीक से फायरिंग की, जिससे अजीजुर रहमान मुसब्बिर की मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना में एक अन्य व्यक्ति भी गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसकी हालत स्थिर बताई है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले घायलों को बीआरबी अस्पताल ले जाया गया और बाद में एक को ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया।

अजीजुर रहमान मुसब्बिर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्वयंसेवी इकाई से जुड़े रहे थे और ढाका मेट्रोपॉलिटन नॉर्थ स्वेच्छासेवक दल के महासचिव रह चुके थे। उनकी हत्या को चुनाव से पहले राजनीतिक रंजिश और बढ़ती हिंसा से जोड़कर देखा जा रहा है। पुलिस का कहना है कि हमलावरों ने वारदात के बाद कई राउंड फायर किए और फिर फरार हो गए। घटना के तुरंत बाद सुरक्षा एजेंसियों ने इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जुटाए जा रहे हैं। हालांकि, बुधवार सुबह तक किसी भी संदिग्ध की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही आरोपियों को पकड़ लिया जाएगा।

तुर्कमान गेट हिंसा पर सपा नेता एसटी हसन का बयान

 

बांग्लादेश में फरवरी 2026 में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। बीते कुछ महीनों में देश में राजनीतिक हत्याओं और हिंसक घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले जुबो दल के एक नेता और इंकलाब मंच के प्रमुख शरीफ उस्मान हादी की गोली मारकर हत्या की जा चुकी है, जिसके बाद कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन देखने को मिले थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव से पहले इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं। लगातार हो रही राजनीतिक हत्याएं न केवल सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल रही हैं, बल्कि आम नागरिकों के मन में डर और अस्थिरता भी बढ़ा रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और सुरक्षा एजेंसियां हालात पर काबू पाने में कितनी सफल होती हैं।

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