फटे पुराने कंबलों के सहारे रात काट रहे जेलों में कैदी!

आईजी
  • जेलों में कैदियों को ठंड से बचाने के पर्याप्त नहीं इंतजाम
  • बंदियों के अनुपात में जेलों में कंबलों की संख्या काफी कम
  • एनजीओ और घरों से मंगाकर ठंड काट रहे जेलों के बंदी

लखनऊ। इस कड़कड़ाती ठंड से प्रदेश की जेलों में बंद बुजुर्ग व बीमार बंदियों का हाल बेहाल है। जेलों में अलाव और कंबलों के अभाव में कैदियों को एक एक दी और रात काटना मुश्किल हो गया है। शासन और मुख्यालय इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान ही नहीं दे रहा है। हकीकत यह है कि प्रदेश की जेलों में कैदियों के अनुपात के कंबलों की संख्या काफी कम है। जेल प्रशासन के अधिकारी एनजीओ और घरों से कंबल इत्यादि मंगवाकर किसी तरह से काम चलाने को विवश हैं। प्रदेश में वर्तमान समय में करीब 73 कारागार हैं। जिला कारागार में विचाराधीन बन्दीबौर केंद्रीय कारागार में सजायाफ्ता कैदियों को निरुद्ध किया जाता है।

प्रदेश की मुरादाबाद जेल समेत अन्य कई जिलों में मानक से अधिक बंदी निरुद्ध है। सूत्रों के मुताबिक जेल नियमों के अनुसार जेल में निरुद्ध एक विचाराधीन बंदी को तीन से चार कम्बल दिए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा अधिक ठंड पड़ने के स्थिति में आवश्यकतानुसार बुजुर्ग और बीमार बंदियों के लिए इसकी संख्या में बढ़ोत्तरी की जा सकती है। बंदियों को ठंडक से बचाने के लिए कारागार की प्रत्येक बैरेक में अलाव जलाने की व्यवस्था किए जाने का प्रावधान किया गया है। सूत्र बताते है कि जेल प्रशासन के अधिकारी सुरक्षा का हवाला देते हुए जेल की बैरकों में अलाव जलाने की व्यवस्था ही नहीं करते हैं। अधिकारियों का तर्क होता है कि इसकी वजह से जेल में हादसा हो सकता है। जेल अधिकारी अलाव के नाम पर भी गोलमाल करने से बाज नहीं आ रहे हैं। इसकी वजह से कैदियों को शासन की इस व्यवस्था का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। जेल की खुली सलाखों के पीछे बंदी सर्द हवाओं का मुकाबला फटे कंबलों से कर रहे हैं।

जेल प्रशासन केवला अफसरों और मुख्यालय के अधिकारियों का दवा भले ही कुछ हो लेकिन हकीकत यह है कि जेल बंदियों के लिए जेलों के पास पर्याप्त मात्रा में कम्बल उपलब्ध ही नहीं हैं। यही वजह है कि जेल प्रशासन के अधिकारी प्रतिवर्ष बंदियों को घरों से कंबल लाने की अनुमति देकर अपनी कमी को छिपाने का प्रयास करते हैं। प्रदेश की जेलों में बंद करीब एक लाख बंदियों के लिए करीब तीन लाख से अधिक कंबल होने चाहिए। हकीकत यह है कि जेल प्रशासन के पास वर्तमान समय में करीब डेढ़ से दो लाख कंबल ही उपलब्ध हैं। इसमें भी काफी अधिक मात्रा में कम्बल जर्जर हो चुके हैं। कई जेलों पर तो पिछले कई वर्षों से कंबलों को खारिज करने की प्रक्रिया तक पूरी नहीं की गई है।

इससे कई कारागारों में इन पुराने कंबलों को ही इस्तेमाल में लाया जा रहा है। कई जेलों में तो बंदियों को कंबल प्राप्त करने के लिए सुविधा शुल्क तक देने तक के लिए विवश होना पड़ता है। कई बार तो मुख्यालय का उद्योग विभाग कमीशनखोरी के चक्कर में कंबलों की खरीद फरोख्त में इतना विलंब तक कर देता है बंदियों को कड़ाके की ठंड का मुकाबला घर के कंबलों के सहारे ही करना पड़ रहा है। उधर इस संबंध में जब मुख्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने इसे उद्योग का मामला बताते हुए कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया। उद्योग का प्रभार संभाल रहे एआईजी प्रशासन धर्मेंद्र ने तो फोन उठना ही मुनासिब नहीं समझा।

अलाव की लकड़ी बनी जेल अफसरों की कमाई का जरिया

प्रदेश की जेलों में अलाव की लकड़ी की खरीद फरोख्त में भी जमकर गोलमाल किया जा रहा है। जेलों में अलाव की लकड़ी की खरीद पर नौ की लकड़ी नब्बे खर्च वाली कहावत एकदम फिट बैठती है। सूत्रों का कहना है जेल नियमानुसार जेल की प्रत्येक बैरेक में अलाव जलाने की व्यवस्था सुनिश्चित करना जेल अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अलाव की लकड़ी की खरीद फरोख्त में कमिश्नबाजी का बड़ा खेल चल रहा है। साढ़े चार सौ से पांच सौ रुपए प्रति कुंतल खरीदी जाने वाली लकड़ी की आपूर्ति 15 से 16 सौ रुपए कुंतल खरीदी जा रही है। इस खरीद फरोख्त की जांच कराई जाए तो दूध का दूध पानी सामने आ जाएगा।

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